Thursday, 30 November 2017

स्पन्दन

उठते गिरते उन लहरों
के तरह ..
 विचारों का वो स्पन्दन
मन झकझोर कर रख  देता ..
कर देता बैचेन ..
न जाने कौन सी कसक
दिल पर रह रह के चोट
पहुँचाती ..
तुम्हारे अजीबोगरीब बेगानेपन
मेरे जज्बातों को छू जाता .
कभी लगता हम एक दूसरे को
बरसों से जानते पहँचानते ..
कभी लगता अब भी बाकी है
दिल के कई सारे गिरह खुलने को ..
कई सारे पसंद नापसंद अलग
हो सकते हैं ..
पर एक दूसरे के पसंद को
अहमियत देना भी जरूरी होता ..
पर तुम अपनी पसंद को
हमेशा तरजीह देते ..
बेसक हम दोनों एक दूजे में
ऐसे घुल गए हैं ..
जैसे मिश्री और पानी
 घुलकर एक हो जाते ..
हमारे ख्वाब  एक है,
एक दूजे के लिए बेफिक्र भी रहते ..
फिर क्यों नहीं मेरे जज्बातों की
 थोड़ी सी कद्र करते ..
 एक दूसरे के अस्तित्व स्वीकार्य से ही
प्रीत की उचाँईयाँ निर्भर करती ..
प्रेम में एक दूसरे को गिराने में नहीं
 संभालना में है निहीत ...

Wednesday, 29 November 2017

अमूल्य समय

छोड़ कर जाना मायका
जितना है दर्द भरा पल
यादों को दिल से भुलाना
उससे भी अधिक मुश्किल ..

जन्म से लेके विवाह तक
यादों में ताना बाना मायके का
जाहिर है अमूल्य समय बीता तो
चर्चा भी वहीं का निकलता ..
 
वो माँ पापा के मीठे पुकार
सुन सुबह के नींद से जागना ..
या डायनिंग टेबल पर सबके
साथ लन्च और डिनर हो करना
 याद आते ही आँखें जाती है भर ..
 
जब मन में जो आए कर बैठते जिद्द
माँ पापा भी पलकों पे उठाते सारे नखरे
कभी जरा सा कुम्हलाया मुख देखते
तो  उनका मन भी बैचेन हो जाता ..
पीठ पे हौले से प्यार की थपकी देकर
सब तकलीफों से मुक्त करने वाले
मम्मी पापा को कोई कैसे भूलें?
 
 निभाना पड़ता जीवन का दस्तुर
माँ पापा भी चिंताओं से मुक्त होते
 लाड़लियों को विदा कर ..
गर वो गई ऐसे घर जहाँ मिले
उसे इतना प्यार जो आने न दे
मायके की उसे  याद ..
माँ पापा भी खुश रहते लाड़ली की
गृहस्थी देखकर ...

Tuesday, 28 November 2017

स्ट्रीट चिल्ड्रेन

जाड़े की जमा देने वाली
रातों में सड़क के किनारे वो  
बच्चा अपनी पतली कमीज
खींच खींच के कान व
छाती को भींच रहा था ..
बर्फिली हवा के झोंके
अजीब सी कपकपी
तन को ठिठुरा रही थी..
हड्डियों को गलाने वाली
सर्द रातों में वो बच्चा
सड़क के किनारे ही
अपने सोने का जुगाड़ 
 कर रहा था ..
मैं अपने गाड़ी के शीशे को
नीचे सरका कर भींगी पलकों
से अपलक देखने लगी उस
 बच्चे को ..
ये स्ट्रीट चिल्ड्रेन की जिन्दगी
कितने मुसिबत से भरा होता
जहाँ खाने का दो रोटी भी
मुश्किल से ही मिलता
तो और सुख साधन कहाँ
से मिलता होगा उसको ..
ये सोच मन ही मन कोसने
लगी उसके नसीब को  ..
नियति ने कैसा मजाक किया
 जो नाजुक कोमल कपोल का
जड़ ही काट दिया बचपन में ..
मुहताज बन गया वो राहगीरों के
प्यार और स्नेह से संवारने के उम्र में..
ये सब सोच के मेरे कदम अनायास
ही बढ़ गए उसके ओर ..

Monday, 27 November 2017

गाँव का शहरीकरण

अपना वो सुन्दर सा गाँव
जहाँ अपना प्यारा परिवार
रहते थे वहाँ सब मिलकर
 सबका आंगन और दलान
भी एक ही हुआ करता था ..

 कोई आयोजन होता तो सब
 हिल मिलकर कर लिया करते ,
अपने पराये में न कोई विभेद
 बड़े से बड़े काम भी निबट जाता
आंगन और दलान जो खुल्ला था ..

अबकी बार गए जो गाँव तो
  लगा बहुत अजीब वहाँ का
  रूप ही बदला बदला था ..
सबके मन में अब न था वो प्रेम
आंगन और दलान के बीच में
दिवारें जो पड़ गई थी ..

सब अपने में ही सिमट गए थे
पहले जैसी आत्मियता न दिखती
मानों दिलों में धूल सी जम गई हो
सबों के घरों में आना जाना भी
बहुत कम हो गया था ..
शायद गाँव को शहरी हवा लग गई थी ..

Sunday, 26 November 2017

जुत्सजू

तुम्हारे होने का मतलब
घरों में खुशियों की फुहार
दिल में खिल गया हो गुलाब
जैसे बजने लगी है दरों दीवार
फिजां में महक रही हों खुशबू ..

जनाब तेरे बेसबब बेतलबी
का कशिश कुछ ऐसा की
 अब न रब से मेरी कोई आरजू
और न रही अपनी जुत्सजू कोई
खुद को मैं तुझमें ही घोल गई  ..

जिन्दादिली में तुम बेमिसाल
मेरे हर फैसला में तुम हो शामिल
तुमसे ही है मुझमें हौसला ..
मैं कभी लड़खड़ा भी जाऊँ तो
तुम मुझे हर पल लेना संभाल ..

तुम्हारे होने भर से चहूँ ओर
जुगनु सी चमक फैल जाती
तुमसे ही शुरू मेरे दिन रैन
अंधेरे को अब न मुझसे वास्ता
 अमावस की रातें मुझसे रहते दूर ..

Saturday, 25 November 2017

संकीर्ण सोच

उस दिन पड़ोस के घर में
बड़ी उथल पुथल मची थी
ननकी के विवाह पक्की
करके उसके पापा आए थे
लड़का बड़ा संस्कारी है
कभी दुखित न रहेगी ननकी
 सबको उसकी माँ समझा रही थी ..
लड़के वाले ने कुछ भी नहीं मांगा
घर से थोड़ा कमजोर है
करनी पड़ेगी हमें मदद ..
बड़े उत्साह से सम्पन्न हुई शादी
अब ननकी बुझी बुझी सी रहती
किसी से कुछ भी न कहती
ससुराल में रूपयों की दिक्कत थी..
ननकी पढ़ने में होशियार थी
पर विवाह में लड़का खोजना
मुश्किल न हो जाएँ सो
पढ़ाई भी अधिक नहीं कराया ...
शादी के बाद पापा मम्मी ने
भी हाथ खींच लिया अपना
दिल पे ननकी को बहुत ठेस लगी
सोचती वो क्या मैं संतान नहीं
अपने माता पिता की
बेटों को इतना पढ़ाया
फिर संपत्ति भी उन्हीं की
मुझे न इतना पढ़ाया जो
अपने पैरों पे खड़ी हो सकुँ
न ही अच्छे घर में शादी कराई
अगर दहेज न ले लड़के तो
कोई फर्ज नहीं माता पिता का ..
क्या लड़की को जल्दी जल्दी
निबटाकर हाथ पाँव धो ले उससे?
क्या ये संकीर्ण सोच नहीं बेटी के प्रति?
यही बराबरी का हक है बेटे बेटी में ..

Friday, 24 November 2017

अंतरद्वन्द

कभी कभी हालात
मुश्किलों में डाल देते
करें क्या समझ न पाते
परिस्थितियों के आगे
सभी नतमस्तक होते ..
बूढ़ी काकी हो गई इतनी
शरीर से कमजोर पर हिम्मत
अब भी जवानों पे भारी
अपने घरों में अकेले ही रहती
बच्चों के पास जाना न चाहती
मेरा घर बरबाद हो जाएगा
सबसे वो यही कहती ..
लोग बाग बच्चों को कोसते
सब सोचते बूढ़ी काकी
बताना न चाहती ...
बच्चे भी माँ की इच्छा जानकर
छोड़ दिए उनके हालात पर ..
 हाल चाल लेने कभी कभी आ आते
सब ठीक ठाक चल रहा था
एक दिन बूढ़ी काकी को दौरा पड़ा
इतने बड़े घर में बेसूध थी पड़ी
कई घंटे बाद आए कोई पड़ोसी
देखा बूढ़ी काकी को बेहोश
सभी पड़ोसियोंको बुलाया
फिर सबने डॉ को बुलाया
बूढ़ी काकी फोन नम्बर
 रखती डायरी में संभालकर
सबने बुलाया बच्चों को फोन कर
किसी तरह बच गई बूढ़ी काकी
अब फिर वही सवाल वो जाना ना
चाहती किसी के साथ सब परेशान ..
आखिर कौन सी व्यथा थी?
वो कौन सी अंतरद्वन्द थी ?
जो किसी से कहना न चाहती थी?
कौन सी वजह थी ? कैसी परिस्थिति थी?
जो अकेलेपन का दंश सह रही थी?

Thursday, 23 November 2017

सुनहरी यादें जाड़े की

गुलाबी धूप जाड़े की
बरबस खींच के
यादों के पार लेके
ऐसे चली जाती जैसे
 बात हो कल की..

दलान पर कुर्सियों के
भीड़ में सब लीन गप्पों में
मस्त अपने कामों में
चाय की चुस्की के
साथ चर्चा देश दुनियाॅ की ..

पापा मम्मी व संग भाई के
शरारतों और कहकहों के
 बीच माँ के हाथों का
स्वादिष्ट लड्डुओं व संदेश को
आज भी मचल जाता मन पाने को..

वो रजाईयों में साथ दादी के
अपनी अपनी कहानियों को
सुनाने की जिद्द सभी बच्चों की
और बात जिसकी पूरी न होती तो
 फिर सबके बीच धमा चौकड़ी
यादें आज भी भींगो जाते नयनों को ..

गोबर के उपलों को जलाकर
दादा जी के धुनी के चारों ओर
सब का बैठकर जाड़े से ठिठुरे
तन को आग की गर्मी से तपाना
फिर चलता सिलसिला दादाजी के प्रश्नों का
सबों को देना ही पड़ता उत्तर
वो सुनहरी यादें कभी न भूलता मन  ..

जीवन में हम कितने ही कुछ पा ले
भरे हो घरों में खाने के अनेको सामग्री
 छुपा के रखे शीशे में देशी घी के लड्डू
 बचपन में चुपचाप चीजें चुरा कर
 खाने का मजा ही था कुछ और ...
जीवन में वो पल होते न कभी औझल ..

Wednesday, 22 November 2017

मुक्ति

मौत बेहद कष्टदायक
बिलकुल सत्य और अटल
जिससे कोई नहीं बच सकता
जो है यथार्थ सच जीवन का

एक जीते जागते हाड़ मांस
पुतलों का मिट्टी बन जाना
बरसों के संग साथ अपने
भाई बंधुओं व प्रियतम से छूटना
सच में वेदना से भर जाता मन ..

महिनों से पिड़ित बिमारीयों से
हार कर नाता तोड़ गए सब से
आज फिर अपने छोड़ गए जग से
यादों में वो रहेंगे जिवीत हमेशा ..
 
कभी कभी रोग और पीड़ा से
लिपटा तन देख आ जाती दया सी
भगवान दे दे मुक्ति उन्हें जीवन से
जीर्ण शीर्ण काया छूटे मुक्त हो कष्ट से  ..
महा प्राणायाण का मार्ग भरा हो फूलों से
स्वर्ग का द्वार खुला रहे उनके लिए
अब दिल में है यही दुआ रब से ..

Tuesday, 21 November 2017

नागदंश

किसी की मीठी बोली
किसी के सूरत भोले भाले
ऐसा बिछा देता है जाल
जिसमें रह जाते हम उलझ
 शातिराना चलता चाल
 मन को कर देता घायल ..

 प्यारी प्यारी बातें कर पहले
विश्वास को कर लेते हासिल
चिकनी चुपड़ी झांसे में आते
ही वो अपने सारे विष को
 नागदंश कर देते उड़ेल..

किसी के बाण जहरीले
बिंधकर कर देता घायल
असंख्य घाव दे देते दिल पर
छटपटा कर रह जाता पहलू
ऐसों को है पहचानना मुश्किल ..

कहीं न कहीं ऐसे लोग हमें
टकरा ही जाते जीवन में
इंसा गर अच्छे से उसे पहचान ले
तो कीचड़ के छींटे पड़ने से बचा ले
फिर दामन को अपने होने न दे मैला ..

 

 

 

Monday, 20 November 2017

शब्दों की नियती

बचपन में एक खेल
 खेला करती थी
जिसमें जीवन के
 मूल मंत्र छूपा था ..
एक बच्चे के कान में
कुछ शब्द बोलना होता
फिर वही शब्द दूसरे ,
तीसरे ,चौथे व पाँचवें
इस तरह सारे बच्चे तक
वही शब्द कान में
 बोला जाता  ..
अंतिम बच्चे से जब
वही शब्द पूँछा जाता ..
तो बच्चे जो कुछ बोलते
 सुन के सब जोर से हँस देते 
बच्चे को समझ में न आता
आखिर ये क्यों  हँसते ?
दरअसल एक कान से
दूसरे कान तक वो
शब्द ही बदल गए थे ..
कहने का मतलब
कभी किसी के
कानों सुनी बातों
पे करो न यकिन 
औरों तक पहुंचते
बातें हो जाती अर्थहीन ..
इस खेल के पीछे
छूपा था यही सार
एक ही शब्द कई बार
अलग अलग लोगों तक
पहुँचते ही अर्थ और भाव
खो देते ...
कभी कभी बातें पूर्णतः
बदल ही जाती..

Sunday, 19 November 2017

गम के भाई खुशी

दो सगे भाई
खुशी और गम
रहते दोनों ही
साथ हरदम
जब खुशियों की
 पींगे मन में
हिलकोरे लेने लगता  ..
अभिलाषाओं की
उड़ानों में उड़ते हम ..
जाने कहाँ से आते
ये दुख के बादल
  छुप के बैठे रहता
आ जाते रूलाने हमें ..
 गम की बारिश
ऐसी आती की
नयनों के आंसूँ
सैलाब बन खुशियों
को बहा ले जाती ..
लगता न बितेंगें
मुश्किल भरे दिन ..
पर सबके नियति
में होते सुख दुःख
आते हैं जरूर
गम के बाद खुशी ..

Saturday, 18 November 2017

दुःख की बारात

अक्सर दुःख आती
तो बारात लेके आती
निकलने का रास्ता
न मिलता ..
मैंने पहले न देखा
न सुना था कभी
ऐसा भी हो सकता है !!
माँ के साथ पिता
भी छोड़ गए उसका
स्तब्ध रह गई सुनके
मेरे जानने वाले एक
मित्र की पत्नी गुजर गई 
कुछ दिन पहले मैंने
सुना था माँ भी उनकी ,
दो चार महीने पहले ही
साथ छोड़के चली गई
उसलोक ..
बेचारे बहुत दुखी रहते
पुत्र और पुत्री रहते थे
बहुत दूर उनसे
बेटी इन्जिनियर है
बेटा इन्जिनियरिंग करके
सर्विस की खोज में है
पापा बच्चे से मिलने गए
अगले ही दिन चले गए
इस दुनिया को छोड़ के
बेचारे बच्चों की तो
दुनिया ही उजड़ गई ..
हम सभी भी हैं हतप्रभ
एक साल के अंदर
चार चार मौत
भगवान बच्चों को
शक्ति दे इस वेदना से
उबरने की !!

Friday, 17 November 2017

कुल दीपक

👪👪👪
बरसों पहले
मेरे घर आई
मेरी दूसरी परी
 आई थी वो
दस साल बाद
 हम सभी
बहुत खुश हुए
मेरे पति ने सभी को
मिठाईयाँ बाँटने
और रूपये देने
हास्पिटल के
स्टाफ को बुलाया
ये क्या सबके चेहरे
मुरझाया था ..
रहने दो साहब
दूसरी बेटी ही हुई ..
मेरे पति ने डाँट लगाई
मेरे घर आई लक्ष्मी
ऐसी बातें दुबारा न कहना
उन्होंने समझाया

हास्पिटल से
मैं मायका आई
अपनी माँ के साथ
आपरेशन के बाद
बच्ची को इन्फेकशन
हो गया था
बड़ी मुश्किल से
नन्ही मेरी बची थी
मेरे लिए वो
किसी बेटे से
कम नहीं थी ..

पर ससुराल वाले
आहत थे
क्योंकि तीसरी
 पोती हो गई
एक देवर के
और एक मेरी ..
समाज के लोग
बोल रहे थे
सास ससुर को
पोते देखना
नसीब में नहीं
अब आपका

दो महीने बाद
मेरी देवरानी
को पुत्र रत्न
प्राप्त हुआ
बहुत खुश हुए
मेरे ससुराल वाले
जेवर कपड़े मिठाईयाँ
सब लेके गए
देवर के ससुराल ..
बड़े लाड़ से वो
पोते को कुलदीपक
कहके बुला रहे थे
मेरे मन में कुछ
पिघल रहा था
बच्ची की अनदेखी से
मैं पिड़ित थी

खैर हम सक्षम थे
अपनी बच्ची की
सुंदर परवरिश के लिए
आज मेरी परी
 इनजियरिंग
इलेक्ट्रॉनिक स्ट्रीम
से पूर्ण कर
 गेट की तैयारी
 कर रही है
अपने यूनिवर्सिटी में
मेरी बिटिया टाॅपर थी
और कुल दीपक कुछ
बन न पाया
शायद कहीं एडमिशन
दिलाया जाएगा

Thursday, 16 November 2017

परिवर्तन

परिवर्तन मौसम का ,
तकाजा है सृष्टि का ..
 स्वयं पृथ्वी गतिमान
नियत पथ पर चक्कर
लगाती रहती बारंबार ..
यहाँ स्थिर कुछ भी नहीं
सब बंधे अपने परिधि से
सब कुछ चलायमान
जाने किसके इशारे से !
 कठपुतली के तरह
सभी नाच रहे ..
कोई तो है जो इस जग को
चला रहे  ..
दिन के बाद रात का आना
 नियत समय से ऋतुओं का
बदलना ..
एक आश्चर्यजनक पहले ही
तो है ...
सब कुछ पल पल बदल रहे
बचपन धीरे धीरे यौवन में
यौवन से जाने कब ढल जाती उम्र
तनिक भी आभास नहीं होता ..
एक एक सांस के साथ हम जीये
लगता अभी तो है बांकी दिन ..
सचमुच हमने इतने वर्षों तक
एक एक क्षण को आत्मसात कर
पूरे किए हैं जीवन 
हर पल को अपने कर्मों की
भट्टी में जलकर..
साहसा यकिन ही नहीं हो पाता ..
और आ जाता निकट समय
हो जाते पूरे हमारे घंटे मिनट
उस अंतर्यामि के इशारे 
पे चल पड़ते एक
नए गंतव्य की ओर ...

Wednesday, 15 November 2017

आत्मबल

उफान देख नदियों का
मांझी गर दिल थाम ले
छोड़ दे हाथ पाँव चलाना
तो मझधार में ही डूब
जाएँगें उसकी किस्ती ..
हिम्मत वाले तूफानो को
गुजर जाते छू के ..

जो मन से हार मान ले
गर कोई इसां बैठे रहते
हाथ पे हाथ धरके
वो बैठे रहते साहिल पे
 घबरा के ..
साहस को जो साथी बना ले
वो ही पार करते सागर को..

इस जग में है अनेकों झमेले
अनेकों यहाँ होते भेड़ चाल
जीवन के इस माया जाल
से निकलना होता मुश्किल
आत्मबल से मिलता है हल
खुद पे हो बुलंद हौसला
तो इन उलझनों से खुद ही
जाते निकल ..

Tuesday, 14 November 2017

सुहाने बचपन

बचपन के दिन
 सबसे सुहाने 
राग द्वेष से परे
न किसी से वैर
छल कपट से दूर
मन से निश्छल
बच्चे होते सच्चे ...

सबके राज दुलारा
वो सबसे निराला
सभी को लगते प्यारे
कभी वो झूठ न बोले
भेद भाव से रहते दूर
सबको समझे अपना
न कोई गम का फिकर
बच्चे मन के सच्चे ...

याद कर अपने बचपन
खुशियों से भर उठे मन 
दोस्तों के संग मस्तियाँ
छुपन छुपाई की गलियां
सैर सपाटे की पगड़ड़ियाँ
वो सारे खेल खिलौने
कभी भूल न पाता मन
स्मरण कर भींग जाए मन
बच्चे होते सच्चे ...

Monday, 13 November 2017

गहरे रंग प्रीत का

दो युगल प्रेमी
दुनियां से बेखबर
गुम है एक दूजे के
प्रीत में ..

दोनों ही मदहोश
अंजान है खुद से
परवाह न ही किसी की
खोये हैं प्रीत के आगोश..

प्रेम की बारिश में
भींगते जब प्रेमी
दिल के कई परत
घूल जाते एक दूजे में ..

मधुर चाँदनी रातों में
खुल के निखरते
प्रीतम का प्यार ...
उज्ज्वल धवल चाँदनी
ले जाते उन्हें एक
अलौकिक संसार में ..
 
प्रीत का रंग इतना गहरा
एक बार जो चढ़े तो
कभी भी न उतरे
पैसो की खनक न इसे लुभाए
जाति पाति का भेद भाव न करे ..

प्रीत की पाकीजगी
सच्चे प्रेमी रखते बरकरार
कभी न करते नापाक
गर वो न भी मिलते तो
दूसरे जन्म तक करते इन्तजार
मरके भी जिन्दा रहता सच्चा प्रीत ..

 

Sunday, 12 November 2017

स्नेह के दो शब्द

दो शब्द स्नेह के
औषधि जैसा 
अमृत बाण बन
मरहम की तरह
उपचार करते रोग का..

कभी कोई
हिम्मत हार के
मन से टूट गए
तो दो बोल मीठे
करता हौसलाअफजाई ..

सही वक्त पर
दिया किसी का
आत्म बल
जिन्दगी भर के
बन जाते ऋणी ..
 
पैसों से मदद
लौटाया जा सकता
दो शब्द स्नेह के
बदले स्नेह
देकर ही चुका सकते ..

गर सच्चे स्नेहिल हो
तो जीवन के हर मोड़
पर रहते तैयार
हरदम संभालने को ..

 
 

Saturday, 11 November 2017

चेहरे पे चेहरा

प्रीत जल से भी निर्मल
राग द्वेष व अहंकार से परे
दर्पण दिखाता सत्य अविरल 
भाव भंगिमायें हर इक लकीरें 
सच्चे स्नेहिल भेद न खोले
दर्पण कभी झूठ न बोले ...

कुछ दोष कच्ची उम्र की
दिखता न मैल मन का
मूढ़ मन कसूर किसका 
कर लेते विश्वास गैर पे
पड़ जाते प्रपंच के फेर में
सरल मन बाहुपाश के घेर  में    ..

शैतानों की नियत पढ़ न पाती
आँखों पे छाई  रहती है धूल 
 समझ नही आती अपनी भूल  

मासूम अदा के फेर में उड़े दुकूल

 फिर ऐसे समझौते  कर लेती

अपनी वो लुटिया ही डुबो देती
और  मुहब्बत बलि चढ़ जाती ..

मुश्किल है ढूंढना सच्ची प्रीति
पढ़ना असंभव किसी के चेहरे
चेहरों के जाने होते परतें कितने
बह  बयार रही आधुनिकता की 
शायद हो बदलाव नए दौर का
कोई मोल नहीं स्नेहिल रीति....  ।।

Friday, 10 November 2017

तुम बिन जीवन कैसे कटे

तुम्हारे होने का आहट
एक काल्पनिक एहसास
जबकि तुम बहुत दूर हमसे
 लगता हर ओर सन्नाटा
 मन जैसे सिमटा सिमटा
तुम बिन जीवन कैसे कटे ..

याद कर वो मुस्कुराहट
लगता वो लम्हें आए लौट
खामोशी जाती मिट
खुशियाँ आती लौट
मन दुखी सा लगे जब भ्रम टुटे
तुम बिन जीवन कैसे कटे ..

रात्रि कालिमा हमें डराती
आहट किसी के कदमों के लगे
डरावने सपने आते विचित्र
कल्पनाओं में हमेशा विचरती
यादें मन को कर देती द्रवित
तुम बिन जीवन कैसे कटे ..

यादों का पहरा हरवक्त होता
आस पास किसी का न साथ
अकेलापन ही अब मेरे साथी
सूनापन में ऐसे घिरे मन
जैसे चाँद छुपे बदलियों में घने
तुम बिन जीवन कैसे कटे  ..

Thursday, 9 November 2017

गिद्ध दृष्टि

जिन्दगी बन जाता मजाक
वक्त जब कुछ इस कदर
दो राहों पे खड़ा करे लाके
मुफलिसी सबब बन जाती
खुद के तमाशा का ..

हर ओर दिखता गिद्ध दृष्टि
खा जाने वाली निगाहें लोगों की 
जो चुभ जाता अंदर तक
एक नंगा सच समाज का ..

जग में निः सहाय अबला का
 होता न कोई भी सहायक
गरीबी लाचारी में देते न साथ
उठाते लोग फायदा दुखिया का ..

यूँ तो बनते हैं लोग सिद्धांतिक
 बड़ी बड़ी दलिलें देते मानवता का
तो चेहरे से नकाब ही निकल जाता
जब अवसर आता कुछ करने का..

गजब रीत होता संसार का
जब हो परिपूर्ण हर ओर से
तो घिरे होते हरदम अपनों से
सब छोड़ देते साथ पड़ती मार वक्त का
समाज के दोहरी मानसिकता गजब का..

 

Wednesday, 8 November 2017

मतलबपरस्त

कुछ रिश्ते जीवन में
एक लाइलाज बिमारी
की तरह होता ..
जिसका कितना ही
इलाज करा लो पर
ठीक ही न होता ...
कभी कभी इलाज के
क्रम में अंगों को
 काटना पड़ता ..
फिर भी इन रोगों से
छुटकारा न मिलता ...
ठीक इसी तरह
ऐसे रिश्ते को
खुद से कितना ही
अलग कर दो पर
पीछा न छूटता ..
वो साथ साथ रहते
और वार करने को
मौके की तलाश में होते ..
 ये जिस थाली में खाते
उसी में सुराख करने की
 कोशिश में लगे रहते ...
कितना ही जतन करो
स्नेह और सम्मान देकर
रिश्ते में मिठास लाने की
पर ये कुटिलता न छोड़ते कभी
विश्वास घाती ये रिश्ते
फरेब करने से बाज न आते
मतलबपरस्त इस जग में
सच्चे रिश्ते जैसे मोती सीप में ..

Tuesday, 7 November 2017

धरातल

पाकर  प्रसिद्धि को
 सरल बने रहना
 है मानवियता की
असली पहचान ।।
 
ऊँचाइयों पे पहुँचना
कोई दीगर बात नहीं
पर है बड़ी बात इसे
संभाल के रखना ।।
 
शोहरत के शिखर
सभी चढ़ते संभल कर
जरा सी असावधानी
लुढ़क ही जाते जमीन पर ।।

अक्सर लोग पाकर
नाम और शोहरत
घमंड में हो जाते हैं चूर
खुद को पीर समझने लगते ।।

फल विहिन वृक्ष तने ही रहते
अगर कोई वृक्ष हो
फल से लदे तो हमेशा
वो झुके ही रहते ।।

ऊपर पहँचकर भी जो
खुद को सर्वश्रेष्ठ न समझे
नीचे नजर से न देखे जो
धरातल पे रहने वाले को
वही महापुरुष कहलाते ।।

 
 

 

 

 

Monday, 6 November 2017

प्रतिकार

समझोता बिन जीवन
कभी न होता संपन्न ।
परिस्थितियों के सामने
लाजिमी नतमस्तक होना ।।
कल्पना भी नहीं करते
आ जाती ऐसी परिस्थिति ।
जिन्दगी कई इम्तिहान लेती
कभी परिवार कभी बच्चों या
जिविकोपार्जन की खातिर
करने ही पड़ते समझोते ।।
सफल विवाह का आधार
एक दूसरे से सामंजस्य बैठाकर।
खुद के अस्तित्व मिटाकर
चुप रहते सामंजस्य के खातिर ।।
 सहनशीलता का लाभ
उठाते हैं लोग कभी कभी ।
आत्मसम्मान पे न हो आघात
तब तक है जरूरी समझोता ।।
सामंजस्य सही पर गुलामी
असहनीय वेदना ।
सामने वाले की गलतियों
पर जरूरी प्रतिकार करना ।।

Sunday, 5 November 2017

भ्रूण हत्या

महरी के रोने से
तंद्रा भंग हुई मेरी
रो रो कर अपनीे
आप बीती वो सुना
 रही थी मुझसे ।।
दूसरे बिटिया के
जन्म लेते ही उसे
पति ने निकाल ही
दिया घर से ।।
अब क्या करें वो
कहाँ जाए ?
फरियाद करें किससे ।।
उसकी क्या है गलती ?
समझ में न आया उसे
आखिर बाप है वो कैसा ?
ममता ने भी न
पिघलाया उसे ।।
मन ही मन मैं
उसकी व्यथा सुन
आहत हो गई,
सोच में पड़ गई
देखकर उसकी दशा ।।
बेटा के चाह में स्त्री 
कितना दबाव सहती
कितनी तिरस्कृत होती
न जाने कितनी सहती यातनाऐं
ये एक औरत ही जानती ।।
समाज, परिवार ,पड़ोसी
सबके ताने से न होती विचलित
पर पति की उपेक्षा
न होता बर्दाश्त उसे ।।
इसलिए बिटिया पैदा
करने से वो ड़रती
और हो जाती शामिल
भ्रूण हत्या में औरतें ...
सिर्फ महरी की ही नहीं
ये आपबीती ।।
विकसित परिवार और शिक्षित
औरतें भी ऐसा करने को
विवश हो जाती ...

Saturday, 4 November 2017

मिलन

क्षितिज सिंदुरी हो उठा
धरती गगन कर रहे
मिलन की तैयारी ..
रवि बने हैं इनके गवाही
आह कितना अद्भुत दृश्य
सूरमई शाम भी दुआएँ दे रही
प्रकृति के इस अनुपम मिलन
सौन्दर्य की अनुठी है भेंट ।।
तारों के साथ चाँद भी
स्वागत में है रोशनी बिखेर
हर ओर खुशियों की बयार
खूबसूरत शमां दिलों को झूमा
प्रीत की आगोश में समा  
सम्मोहन की रंगों में नहा
अनगिनत ख्वाहिशों को पिरोकर
 प्रणय की बारिश कर रही  ।।
प्रकृति के इस अद्भुत रीति
सबके मन को कर लेती सम्मोहित ..
प्रयेसी के मिलन की आस सजाए
हर कोई उम्र भर करते इन्तजार ..
एक साथी के साथ की सबको जरूरी ।।
मन ही मन करते सब रब से विनती ..
बिन साथी के ये जग सुना
जिन्दगी के रास्ते लगते कठिन
कट न पाता जीवन सफर ..
तन्हा न कोई भी रहे..
एक अदद जीवन संगी बहुत जरूरी
मिलन के आस सबके हो पूरे ।।

Friday, 3 November 2017

स्मृति

सन्नाटे को चीरती 
पपीहे की मधुर तान
कर गई मुझे झंकृत
जेहन में लगी उभरने
कई मधुर स्मृति ...
जज्बातों के कई
अनछुए क्षण
मायूस कर गए..
एक एक लम्हें
तुम्हारे साथ बिताए
चल चित्र के तरह
स्मृति पटल पर
सजीव हो गया ..
हाथों में हाथ लेकर ..
वो बगीचे का सैर
या चाँदनी रातों में
घंटों चाँद को निहारना
 कितने सुकून भरे
पल लगते थे !!
एक तुम्हारे होने भर से ... ।
सारी दिनचर्या होती
तुम्हारे ही आसपास ..
अब खाली दिन
खाली शामें ..
बच्चे भी व्यस्त
खुद के संसार में ..
रह गयी मैं स्मृति
के एक एक तार
को पिरोने ...।।

Thursday, 2 November 2017

सृजन

परिन्दों की तरह
तिनके तिनके से
नीड़ बनाया ..
छोटे छोटे चूजे आए
अपने हिस्से के दानें
उसको चुगाया ..
बनाने को स्वावलंबी
क्षितिज में कुलाँचे
भरना सिखाया ..
पंखों में ज्योंहि उसे
 जान आया ..
उड़ गया गगन में
बनाने को खुद का
गंतव्य नया ..
चूजों से बिछुड के
परिन्दें तन्हा रह गए ..
मायूस हो के भी वो
चूजों के उड़ानों से
मुस्कुराया ..
बंधे हैं सभी फर्ज से
स्वार्थ से ऊपर कर्तव्य ..
जीवन का यही नियति
सृष्टि सृजन का यही रीति
धरती हमेशा ही देती
वैसे ही होते मात-पिता ..

Wednesday, 1 November 2017

खुशियों का कारवाँ

मन रे तू मत हो उदास
अपने पे रख भरोसा
समझ न खुद को बेबस

किसी से फरियाद न कर
बना न खुद को लाचार
हक न मिलता मांगने पर ।

जब निराशा मन को घेरे ले
अंधकार चहूँ ओर फैल जाएँ
तू उम्मीद की किरण थाम ले ।

जब हो सामने परेशानियाँ
जमाने ने दी हो रूसवाईयाँ 
तो धीरज को बनाना सहेलियाँ ।

जिन्दगी कई इम्तिहान लेती
मुश्किलों के पहाड़ों में घिर जाते
चतुराई से ही राह निकालना पड़ता ।

 गर हौसले में हो बुलंदियाँ
तो कदम चुमती कामयाबियाँ
खुशियों का कारवाँ भी संग चलती  ।