Tuesday, 14 November 2017

सुहाने बचपन

बचपन के दिन
 सबसे सुहाने 
राग द्वेष से परे
न किसी से वैर
छल कपट से दूर
मन से निश्छल
बच्चे होते सच्चे ...

सबके राज दुलारा
वो सबसे निराला
सभी को लगते प्यारे
कभी वो झूठ न बोले
भेद भाव से रहते दूर
सबको समझे अपना
न कोई गम का फिकर
बच्चे मन के सच्चे ...

याद कर अपने बचपन
खुशियों से भर उठे मन 
दोस्तों के संग मस्तियाँ
छुपन छुपाई की गलियां
सैर सपाटे की पगड़ड़ियाँ
वो सारे खेल खिलौने
कभी भूल न पाता मन
स्मरण कर भींग जाए मन
बच्चे होते सच्चे ...

Monday, 13 November 2017

गहरे रंग प्रीत का

दो युगल प्रेमी
दुनियां से बेखबर
गुम है एक दूजे के
प्रीत में ..

दोनों ही मदहोश
अंजान है खुद से
परवाह न ही किसी की
खोये हैं प्रीत के आगोश..

प्रेम की बारिश में
भींगते जब प्रेमी
दिल के कई परत
घूल जाते एक दूजे में ..

मधुर चाँदनी रातों में
खुल के निखरते
प्रीतम का प्यार ...
उज्ज्वल धवल चाँदनी
ले जाते उन्हें एक
अलौकिक संसार में ..
 
प्रीत का रंग इतना गहरा
एक बार जो चढ़े तो
कभी भी न उतरे
पैसो की खनक न इसे लुभाए
जाति पाति का भेद भाव न करे ..

प्रीत की पाकीजगी
सच्चे प्रेमी रखते बरकरार
कभी न करते नापाक
गर वो न भी मिलते तो
दूसरे जन्म तक करते इन्तजार
मरके भी जिन्दा रहता सच्चा प्रीत ..

 

Sunday, 12 November 2017

स्नेह के दो शब्द

दो शब्द स्नेह के
औषधि जैसा 
अमृत बाण बन
मरहम की तरह
उपचार करते रोग का..

कभी कोई
हिम्मत हार के
मन से टूट गए
तो दो बोल मीठे
करता हौसलाअफजाई ..

सही वक्त पर
दिया किसी का
आत्म बल
जिन्दगी भर के
बन जाते ऋणी ..
 
पैसों से मदद
लौटाया जा सकता
दो शब्द स्नेह के
बदले स्नेह
देकर ही चुका सकते ..

गर सच्चे स्नेहिल हो
तो जीवन के हर मोड़
पर रहते तैयार
हरदम संभालने को ..

 
 

Saturday, 11 November 2017

चेहरे पे चेहरा

प्रीत जल से भी निर्मल
राग द्वेष व अहंकार से परे
दर्पण दिखाता सत्य अविरल 
भाव भंगिमायें हर इक लकीरें 
सच्चे स्नेहिल भेद न खोले
दर्पण कभी झूठ न बोले ...

कुछ दोष कच्ची उम्र की
दिखता न मैल मन का
मूढ़ मन कसूर किसका 
कर लेते विश्वास गैर पे
पड़ जाते प्रपंच के फेर में
सरल मन बाहुपाश के घेर  में    ..

शैतानों की नियत पढ़ न पाती
आँखों पे छाई  रहती है धूल 
 समझ नही आती अपनी भूल  

मासूम अदा के फेर में उड़े दुकूल

 फिर ऐसे समझौते  कर लेती

अपनी वो लुटिया ही डुबो देती
और  मुहब्बत बलि चढ़ जाती ..

मुश्किल है ढूंढना सच्ची प्रीति
पढ़ना असंभव किसी के चेहरे
चेहरों के जाने होते परतें कितने
बह  बयार रही आधुनिकता की 
शायद हो बदलाव नए दौर का
कोई मोल नहीं स्नेहिल रीति....  ।।

Friday, 10 November 2017

तुम बिन जीवन कैसे कटे

तुम्हारे होने का आहट
एक काल्पनिक एहसास
जबकि तुम बहुत दूर हमसे
 लगता हर ओर सन्नाटा
 मन जैसे सिमटा सिमटा
तुम बिन जीवन कैसे कटे ..

याद कर वो मुस्कुराहट
लगता वो लम्हें आए लौट
खामोशी जाती मिट
खुशियाँ आती लौट
मन दुखी सा लगे जब भ्रम टुटे
तुम बिन जीवन कैसे कटे ..

रात्रि कालिमा हमें डराती
आहट किसी के कदमों के लगे
डरावने सपने आते विचित्र
कल्पनाओं में हमेशा विचरती
यादें मन को कर देती द्रवित
तुम बिन जीवन कैसे कटे ..

यादों का पहरा हरवक्त होता
आस पास किसी का न साथ
अकेलापन ही अब मेरे साथी
सूनापन में ऐसे घिरे मन
जैसे चाँद छुपे बदलियों में घने
तुम बिन जीवन कैसे कटे  ..

Thursday, 9 November 2017

गिद्ध दृष्टि

जिन्दगी बन जाता मजाक
वक्त जब कुछ इस कदर
दो राहों पे खड़ा करे लाके
मुफलिसी सबब बन जाती
खुद के तमाशा का ..

हर ओर दिखता गिद्ध दृष्टि
खा जाने वाली निगाहें लोगों की 
जो चुभ जाता अंदर तक
एक नंगा सच समाज का ..

जग में निः सहाय अबला का
 होता न कोई भी सहायक
गरीबी लाचारी में देते न साथ
उठाते लोग फायदा दुखिया का ..

यूँ तो बनते हैं लोग सिद्धांतिक
 बड़ी बड़ी दलिलें देते मानवता का
तो चेहरे से नकाब ही निकल जाता
जब अवसर आता कुछ करने का..

गजब रीत होता संसार का
जब हो परिपूर्ण हर ओर से
तो घिरे होते हरदम अपनों से
सब छोड़ देते साथ पड़ती मार वक्त का
समाज के दोहरी मानसिकता गजब का..

 

Wednesday, 8 November 2017

मतलबपरस्त

कुछ रिश्ते जीवन में
एक लाइलाज बिमारी
की तरह होता ..
जिसका कितना ही
इलाज करा लो पर
ठीक ही न होता ...
कभी कभी इलाज के
क्रम में अंगों को
 काटना पड़ता ..
फिर भी इन रोगों से
छुटकारा न मिलता ...
ठीक इसी तरह
ऐसे रिश्ते को
खुद से कितना ही
अलग कर दो पर
पीछा न छूटता ..
वो साथ साथ रहते
और वार करने को
मौके की तलाश में होते ..
 ये जिस थाली में खाते
उसी में सुराख करने की
 कोशिश में लगे रहते ...
कितना ही जतन करो
स्नेह और सम्मान देकर
रिश्ते में मिठास लाने की
पर ये कुटिलता न छोड़ते कभी
विश्वास घाती ये रिश्ते
फरेब करने से बाज न आते
मतलबपरस्त इस जग में
सच्चे रिश्ते जैसे मोती सीप में ..