Tuesday, 21 November 2017

नागदंश

किसी की मीठी बोली
किसी के सूरत भोले भाले
ऐसा बिछा देता है जाल
जिसमें रह जाते हम उलझ
 शातिराना चलता चाल
 मन को कर देता घायल ..

 प्यारी प्यारी बातें कर पहले
विश्वास को कर लेते हासिल
चिकनी चुपड़ी झांसे में आते
ही वो अपने सारे विष को
 नागदंश कर देते उड़ेल..

किसी के बाण जहरीले
बिंधकर कर देता घायल
असंख्य घाव दे देते दिल पर
छटपटा कर रह जाता पहलू
ऐसों को है पहचानना मुश्किल ..

कहीं न कहीं ऐसे लोग हमें
टकरा ही जाते जीवन में
इंसा गर अच्छे से उसे पहचान ले
तो कीचड़ के छींटे पड़ने से बचा ले
फिर दामन को अपने होने न दे मैला ..

 

 

 

Monday, 20 November 2017

शब्दों की नियती

बचपन में एक खेल
 खेला करती थी
जिसमें जीवन के
 मूल मंत्र छूपा था ..
एक बच्चे के कान में
कुछ शब्द बोलना होता
फिर वही शब्द दूसरे ,
तीसरे ,चौथे व पाँचवें
इस तरह सारे बच्चे तक
वही शब्द कान में
 बोला जाता  ..
अंतिम बच्चे से जब
वही शब्द पूँछा जाता ..
तो बच्चे जो कुछ बोलते
 सुन के सब जोर से हँस देते 
बच्चे को समझ में न आता
आखिर ये क्यों  हँसते ?
दरअसल एक कान से
दूसरे कान तक वो
शब्द ही बदल गए थे ..
कहने का मतलब
कभी किसी के
कानों सुनी बातों
पे करो न यकिन 
औरों तक पहुंचते
बातें हो जाती अर्थहीन ..
इस खेल के पीछे
छूपा था यही सार
एक ही शब्द कई बार
अलग अलग लोगों तक
पहुँचते ही अर्थ और भाव
खो देते ...
कभी कभी बातें पूर्णतः
बदल ही जाती..

Sunday, 19 November 2017

गम के भाई खुशी

दो सगे भाई
खुशी और गम
रहते दोनों ही
साथ हरदम
जब खुशियों की
 पींगे मन में
हिलकोरे लेने लगता  ..
अभिलाषाओं की
उड़ानों में उड़ते हम ..
जाने कहाँ से आते
ये दुख के बादल
  छुप के बैठे रहता
आ जाते रूलाने हमें ..
 गम की बारिश
ऐसी आती की
नयनों के आंसूँ
सैलाब बन खुशियों
को बहा ले जाती ..
लगता न बितेंगें
मुश्किल भरे दिन ..
पर सबके नियति
में होते सुख दुःख
आते हैं जरूर
गम के बाद खुशी ..

Saturday, 18 November 2017

दुःख की बारात

अक्सर दुःख आती
तो बारात लेके आती
निकलने का रास्ता
न मिलता ..
मैंने पहले न देखा
न सुना था कभी
ऐसा भी हो सकता है !!
माँ के साथ पिता
भी छोड़ गए उसका
स्तब्ध रह गई सुनके
मेरे जानने वाले एक
मित्र की पत्नी गुजर गई 
कुछ दिन पहले मैंने
सुना था माँ भी उनकी ,
दो चार महीने पहले ही
साथ छोड़के चली गई
उसलोक ..
बेचारे बहुत दुखी रहते
पुत्र और पुत्री रहते थे
बहुत दूर उनसे
बेटी इन्जिनियर है
बेटा इन्जिनियरिंग करके
सर्विस की खोज में है
पापा बच्चे से मिलने गए
अगले ही दिन चले गए
इस दुनिया को छोड़ के
बेचारे बच्चों की तो
दुनिया ही उजड़ गई ..
हम सभी भी हैं हतप्रभ
एक साल के अंदर
चार चार मौत
भगवान बच्चों को
शक्ति दे इस वेदना से
उबरने की !!

Friday, 17 November 2017

कुल दीपक

👪👪👪
बरसों पहले
मेरे घर आई
मेरी दूसरी परी
 आई थी वो
दस साल बाद
 हम सभी
बहुत खुश हुए
मेरे पति ने सभी को
मिठाईयाँ बाँटने
और रूपये देने
हास्पिटल के
स्टाफ को बुलाया
ये क्या सबके चेहरे
मुरझाया था ..
रहने दो साहब
दूसरी बेटी ही हुई ..
मेरे पति ने डाँट लगाई
मेरे घर आई लक्ष्मी
ऐसी बातें दुबारा न कहना
उन्होंने समझाया

हास्पिटल से
मैं मायका आई
अपनी माँ के साथ
आपरेशन के बाद
बच्ची को इन्फेकशन
हो गया था
बड़ी मुश्किल से
नन्ही मेरी बची थी
मेरे लिए वो
किसी बेटे से
कम नहीं थी ..

पर ससुराल वाले
आहत थे
क्योंकि तीसरी
 पोती हो गई
एक देवर के
और एक मेरी ..
समाज के लोग
बोल रहे थे
सास ससुर को
पोते देखना
नसीब में नहीं
अब आपका

दो महीने बाद
मेरी देवरानी
को पुत्र रत्न
प्राप्त हुआ
बहुत खुश हुए
मेरे ससुराल वाले
जेवर कपड़े मिठाईयाँ
सब लेके गए
देवर के ससुराल ..
बड़े लाड़ से वो
पोते को कुलदीपक
कहके बुला रहे थे
मेरे मन में कुछ
पिघल रहा था
बच्ची की अनदेखी से
मैं पिड़ित थी

खैर हम सक्षम थे
अपनी बच्ची की
सुंदर परवरिश के लिए
आज मेरी परी
 इनजियरिंग
इलेक्ट्रॉनिक स्ट्रीम
से पूर्ण कर
 गेट की तैयारी
 कर रही है
अपने यूनिवर्सिटी में
मेरी बिटिया टाॅपर थी
और कुल दीपक कुछ
बन न पाया
शायद कहीं एडमिशन
दिलाया जाएगा

Thursday, 16 November 2017

परिवर्तन

परिवर्तन मौसम का ,
तकाजा है सृष्टि का ..
 स्वयं पृथ्वी गतिमान
नियत पथ पर चक्कर
लगाती रहती बारंबार ..
यहाँ स्थिर कुछ भी नहीं
सब बंधे अपने परिधि से
सब कुछ चलायमान
जाने किसके इशारे से !
 कठपुतली के तरह
सभी नाच रहे ..
कोई तो है जो इस जग को
चला रहे  ..
दिन के बाद रात का आना
 नियत समय से ऋतुओं का
बदलना ..
एक आश्चर्यजनक पहले ही
तो है ...
सब कुछ पल पल बदल रहे
बचपन धीरे धीरे यौवन में
यौवन से जाने कब ढल जाती उम्र
तनिक भी आभास नहीं होता ..
एक एक सांस के साथ हम जीये
लगता अभी तो है बांकी दिन ..
सचमुच हमने इतने वर्षों तक
एक एक क्षण को आत्मसात कर
पूरे किए हैं जीवन 
हर पल को अपने कर्मों की
भट्टी में जलकर..
साहसा यकिन ही नहीं हो पाता ..
और आ जाता निकट समय
हो जाते पूरे हमारे घंटे मिनट
उस अंतर्यामि के इशारे 
पे चल पड़ते एक
नए गंतव्य की ओर ...

Wednesday, 15 November 2017

आत्मबल

उफान देख नदियों का
मांझी गर दिल थाम ले
छोड़ दे हाथ पाँव चलाना
तो मझधार में ही डूब
जाएँगें उसकी किस्ती ..
हिम्मत वाले तूफानो को
गुजर जाते छू के ..

जो मन से हार मान ले
गर कोई इसां बैठे रहते
हाथ पे हाथ धरके
वो बैठे रहते साहिल पे
 घबरा के ..
साहस को जो साथी बना ले
वो ही पार करते सागर को..

इस जग में है अनेकों झमेले
अनेकों यहाँ होते भेड़ चाल
जीवन के इस माया जाल
से निकलना होता मुश्किल
आत्मबल से मिलता है हल
खुद पे हो बुलंद हौसला
तो इन उलझनों से खुद ही
जाते निकल ..