Saturday, 25 August 2018

जीगर

विधा- गजल
काफिया- अर
रदीफ- गए होते

 मेंहदी रचती उनके नाम कि वे न डर गए होते
 मांग में मेरे महबूब काश सिंदुर भर गए होते

तकदीर का लिखा कभी नहीं मिट सकता 
उनसे हम भी बिछुड़के संभल गर गए होते

रंजो गम हम तुम संग मिलके ही बाँट लेते
हसरत है दुल्हन बनके तुम्हारे घर गए होते

रोजी रोटी में प्यार सबके काफूर हो जाते हैं
रहती पनाहों में उनके कुछ ऐसा कर गए होते

लाखों में एक वादा निभाने का जीगर रखते
तुम मुझे न मिलते तो इन्तजार में मर गए होते

 

 

Thursday, 23 August 2018

राम वंदन

विधा- हरिगीतिका

मैं आपके शरण में आई  , प्रभु दया कीजिए  1
अंधकार में डूबा तन मन,रक्षा मेरा कीजिए
 मोह माया में रहती पड़ी,ज्ञान मुझे दीजिए
 तुमसे न उर विमुख रहे,चमत्कार कर दीजिए ।

तुम ही प्रभु सृजन करते , देते अभय वरदान   2.
धरा पापियों से मुक्त हो,  करो उसका निदान
मैं अधम चरणों में लिपटी,कर मेरा समाधान
राम बिन जग का न आधार, हैं वो कृपानिधान

***************************************

     विधा- हरिगीतिका

मान ली पिता की आज्ञा ,राम वनवासी बने   1.
दशरथ के प्राण निकल गए, वैकुन्ठ वासी बने  
हाहाकार अब नगर करे,  अयोध्या सूनी लगे
कौशल्या रोये जार जार, सिय बिन जी न लगे

भरत के करूण पुकार सुन , राम भी विह्वल हुए   2.
सजल नयन से मिलकर गले, कसम ली रोते हुए
भैया से खड़ाऊ लिए भरत, चले नगर को लेके
राज धर्म अपना निभाया , तपस्वी जैसे बनके

Monday, 20 August 2018

जीवन यात्रा

बोलती तस्वीर
विधा- कविता
दिन- सोमवार 
दिनांक- 20.08.2018

मिलना है जब पंचतत्व में क्यों माया के फेर में हैं सब
विमुख न हो कोई कर्म पथ से,जीवन यात्रा तब सफल

दीए उम्मीद के जला
लक्ष्य की चाहत में
राहों से कभी न भटक
जला न अपना दिल
पाँव हो जाए घायल
निकाल राहों से काँटें
कदम बढ़ा रख हौसला
भविष्य होगा उज्ज्वल
चीर दो उर की व्यथा
गम के बादलों से निकल
पुकार उठेगी मंजिलें

विमुख न हो कोई कर्म पथ से, जीवन यात्रा तब सफल

लेके आए हाथ खाली
एक दिन मुट्ठी को फैला
पंचतत्व में होगें विलीन
नहीं कोई अजर अमर
कर्म सिर्फ परहित करें
यादें मन मस्तिष्क में रहे
मिट्टी के तन का न मोल
रह जाते हैं रिश्ते नाते धरे
जाना है सबको अकेले
दया धर्म ही सबका मूल
 ये जीवन है अनमोल

विमुख न हो कोई कर्म पथ से ,जीवन यात्रा तब सफल

धूप में जो तन तपाया
दीन दुखियों के सेवा में
अपने दिन रैन बिताया
मखमली गलीचे छोड़
काँटो को सेज बनाया
राग अनुराग, लोभ द्वेश
स्वार्थ जिसे न सताया
उस तपस्वी को ही ईश
ले जाते विमान में स्वयं
स्वर्ग द्वार रहता खुला ..

मिलना है जब पंचतत्व में, क्यों माया के फेर में हैं सब
विमुख न हो कोई कर्म पथ से, जीवन यात्रा तब सफल

Saturday, 18 August 2018

अस्तित्व

विधा-अतुकान्त

तलाश
में  खुद की..
जाने कहाँ से
कहाँ निकल गई
रास्ते बढ़ते गए
मैं चलती रही
निरंतर मंजिल की ओर
एक शाम नदी के किनारे
चलते चलते जाने कितने दूर
निकल गयी पता ही नहीं चला
नदी के उठते गिरते लहरें देख
जाने कैसी विचारों की आंधी
मेरे मन में कौंध रही थी ..
बरबस खींच के ले चली मुझे
वो सुनहरे संसार में ..
वो नन्ही सी जान जो माँ के
आँचल में दुबक रही थी
वो मासूम मस्त व बेखबर सी
दुनियाँ के भेड़ चाल से अंजान
आज नई दुनिया, नई मंजिलों
नए सपने, नए अरमानों को
हकीकत में साकार करने
अपने कदमों को जमीं पर रख
जाने कितने दूर निकल गयी
उलझनों व तकलीफों के
मकड़जाल से निकल पड़ी
राहों की दुश्वारियों से
बिना डरे अपने पथ पर
बढ़ते हुए अपनी मंजिल की ओर
जमाने के दिए ठोकरों के
परवाह किए बगैर
एक दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ
अस्तित्व की तलाश में ...

Friday, 17 August 2018

हर दिल अजीज

चट्टान से भी अटल
व्यक्तित्व जिनका
पर्वत से भी अडिग
जिनके होते थे फैसले
हृदय था  जिनका
सागर सा विशाल
ऐसे महामना पे
फक्र है हिन्दुस्तां को..

जमीं से ही जो जुड़के
देश हित के उँचे ख्वाब
जागती आँखों से देखा
ऐसे हर दिल अजीज
माननीय वाजपेयी जी
बार बार माँ भारती के
बनें सपूत जन जन की
है यही अब अभिलाषा
दुश्मनों की चाल जिनको
कर्म पथ से डिगा न सका
सलाम उस कर्म वीर को..

विदेशों में भारत को
बनाए जो शक्ति संम्पन
पोखरण का कर परीक्षण
चौंका दिया था दुश्मन को..
गाँव गाँव शहर शहर को
जोड़ दिए जो बनाकर चतुर्भुज
जिनके वाणी में ओज
दिल में मिठास था लेकिन ..
इतिहास के पन्नों में अंकित
बेदाग छवि राजनीतिक का
याद रहेगा सबको सदियों तक ..

रचनाधर्मिता में उनकी
गहन रूची व अनूठी शैली
साहित्य प्रेमियों के अन्तस्
को छू लिया जिन्होंने..
हिन्दी के स्वर्णिम पन्नों
पे याद दिलाएगें सबको 
रचनात्मकता उनकी
अनोखी व मनमोहक ..

लोकप्रिय वो जन जन के
हँसमुख व मृदुभाषी इतने
कि विपक्षी भी जिनको
सुनते थे मुग्ध हो के
सादा जीवन उच्च विचार
मूल मंत्र ही जिनका
प्रखर वक्ता के रूप में
प्रधानमंत्री अटल जी
राज करते थे दिलों में
ऐसे महान विभूति का
जन्म फिर से भारत की
सरजमीं पे हो दिल में
यही है अब कामना 🙏🙏
कोटिशः श्रद्धांजलि

Thursday, 16 August 2018

पनाह ( गजल)

काफिया- आ के
रदीफ- देखते हैं

तन्हाईयों के आलम में शमां सा जला के देखते हैं
उसे पाने के ख्वाब में मोम सा पिघला के देखते हैं

कहते हैं इश्क की राह पे जो चल दिए मुड़ते नहीं
मैं परवाना शमा के प्रेम में पागल मिटा के देखते हैं 

बगैर दिलबर के अपना जहान फीका फीका है 
अपने प्रिय से मिलन के मंजर तलाश के देखते हैं

दीदार में जुगनुओं के सुध बुध खो दिया अपना
शमां से आलिंगन में अस्तित्व लुटा के देखते हैं

यूँ तो मिलता नहीं सब को मुक्कमल जहान
 ख्वाहिशों को आज हकीकत बना के देखते हैं

प्रीत के अंजुमन में जग में लेते सब पनाह
अपने बेइन्तहां प्यार को जता के देखते हैं ..

रब ने भी क्या खूब बनाई दिल वालों की बस्ती
हर शै में है रब का इशारा उन्हें मना के देखते हैं

 

Wednesday, 15 August 2018

स्वाधीनता दिवस

गीत गाएँ सब हिल मिलकर दिवस है स्वाधीनता का

माँ भारती के सपुतों ने
पराधीनता की बेड़ियों से
प्राणों की आहुति देके
मुक्त किया जन्मभूमि को
रंग गयी थी माँ भारती
क्रान्तिकारियों के खून से..
आजादी की लड़ाई में
हिम्मत न हारे कभी बापू ने

आओ सब मनाएँ जश्न 
करें सब कोई गुण गान
आजादी के गौरव गान
अमर शहीदों के नाम
जाने कितनी माँ ओं के
गोद  हो गई थी सूनी
जाने कितनी सुहागिंनों
के उजड़ गए हैं मांग
वीर  सैनिकों की कुर्बानी
 याद रखेगा हिंदुस्तान ...

गीत गाओ सब हिल  मिलकर दिवस है स्वाधीनता का

जग में हमारे देश ने
बनाएँ हैं नई पहचान
आज भारती के शान को
धूमिल कर रहे हैं दुश्मन ..
सत्य अहिंसा की धरती पे
 जाने क्यों वो खून बहा रहे
आतंक व जातियता का
 कहर वो बरपा रहे..
एक ही माँ के बच्चे
जैसे हो जाते हैं भिन्न ..
वैसे  मुट्ठी भर लोग
शैतानी कर रहे ...
बेगुनाहों और मासूमों
पे जुर्म वो ढाह रहे..

देश के वीर सपूतों देंगे
जवाब इन कायरों को
करेंगे सफाया दुष्ट व
दानवों के बदनियति का..
सम्मान की खातिर देश के
हर बच्चा बच्चा मर मिटेंगे
हम सब मिलके बढायेंगें 
मान माँ भारती का..
अपनी देश के तिरंगा को
कभी भी झूकने न देंगें ..

गीत सब कोई गाओ हिल मिल कर दिवस है स्वाधीनता का