Sunday, 9 September 2018

आसक्ति

अतुकान्त/ छन्द मुक्त सृजन

आज हर संबंधों में
लगाव कम और
दिखावा अधिक है
फायदे और नुकसान
के तर्ज ही रिश्ते के
आधार हो रहे हैं
ममता खून के
आँसू पीती है
सपूत स्वार्थ में लिप्त है
पल पल वो दूर हो रहे
माँ के दूध का कर्ज
चुकाए बगैर ...
जाने क्यों वो
मतलबी हो रहे ..
सब उलझे हुए हैं
अनंत इच्छाओं के
मकड़जाल में ..
अपनी ही परिधि में
सभी घिरे हुए हैं ..
लालसाओं के
कुपमंडुताओं से
बंधके अपने ही
फर्ज से मुख
मोड़ रहे हैं ...
क्यों न स्वार्थ
की बेड़ियों से
मुक्त रखें खुद को
सफर आसानी से
कट जाएगी ...
जब जाना ही है
एक दिन सबको
छोड़ के ..
क्यों ना खुद को
दूर रखें आसक्ति के
भंवर जाल से ...



Saturday, 8 September 2018

समय

विधा- कविता

समय तेजी से बदल रहा था
बचपन की दहलीज लांघ कब
दर पर यौवन खड़ा हुआ था
सहसा कहाँ यकीन हुआ था..

बचपन की अटखेली बीती भी नहीं
सखी संग वो मासूम अभी गुम थी,
शादी के बंधन में बांध अभिभावक
तुरंत निभा दी अपनी जिम्मेदारी थी

साहस लिए उर में फिर खड़ी हुई
खुद बनाने को अपनी दुनियाँ नई
जीवन के हर रिश्ते बहुमूल्य बनाया
बच्चों को उँचे नभ पर पहुँचाया ..

फर्ज  निभाने में भूल गई खुद को
मिट गई हस्ती उलझनों में खोके  
अपनी ख्वाबों व आकांक्षाओं को
बच्चों के सुंदर भविष्य सजाकर 
 पूरी कर ली अपनी हसरतों को

अजीब संतुष्टि है खुद को खोकर
शामिल होना बच्चों की खुशियों में
पहुँचे बेसक बच्चे नित नए उँचाई में
पर काटे न कभी अपनी जड़ों को
दे वो स्नेह व आदर माता पिता को

Thursday, 6 September 2018

राम वनवास

विधा-कजली गीत
 
कि हरे रामा अयोध्या भइल सूनसान
भेल वनवासी दशरथ नंदन ए हरि ।
कि हरे रामा गाछ पात सब रोये
नगर वासी सारी ऐ हरि ..
 1.
मात कौशल्या रोये फूटी फूटी
कहंमा गईल हमार राम लला बाटे ।
जानकी बिन उदास भवनवां
श्मशान लागे ए हरि ।
कि हरे रामा अयोध्या ..
2.
मंथरा कैकयी के बुद्धि फेरि दिहनि
निकस गईल दशरथ के प्राण
पड़ल आघात विपदा बड़ भारी ।
हियरा हारी ऐ हरि ।
कि हरे रामा अयोध्या ..
3.
माई कुल घातिनि तू हमार मात नहीं
माता कुमाता कभियो न होला
भाई राम लक्ष्मण भावज सिया
वनके देलन ए हरि ।
कि हरे रामा अयोध्या ..    
4.
राम भैया संग मिली गला
भरत के हिचकी छूटैय लागल
अयोध्या तोहरे बिन अनाथ
नहीं चाही राज पाट  ऐ हरि ।
5.
सुनी रघुनाथ मन ही मन मुस्काये
उठ ह भरत कर तू आपन कर्तव्य ।
आपन अधूरा काज संपन्न करब,
आयब हम अयोध्या ऐ हरि ।

कि हरे रामा अयोध्या भइल सूनसान
भेल वनवासी दशरथ नंदन ए हरि ।
 

Tuesday, 4 September 2018

कजरी

सावन भादों के महिनमा में करिया मेघ बरसे ला
कलेजवा पे बिजली गिरेला मोर जियरा जरे ला

घर अयलन सबके सजनवा
हमरा नसीब मे वियोग बा
पिया तू विदेशवा में घुमेला
पिया विदेशवा ...

सावन भादों के ..

पिया कैसे कटे दिवस हमार
आबे न तोहरा कबहू याद हमार
बालम तू कैसन निष्ठुर हो गई ल
बालम तू ..

सावन भादों के ....

पिया सौतन संग करिहय् न प्यार बा
हमार जिनगी तोहरे पे निसार बा
पिया तोहरे कारण घर द्वार छूटल
पिया तोहरे ...

सावन भादों के ...

मेंहदी हरिहर चूडी से करब सिंगार
अखंड सुहाग हमार रहे बरकरार
पिया तीज में कितना बजार सजेला
पिया  तीज ...

सावन भादों के ..

पिया देवर संग नेईहर पठाय द ना
भईया के हम तनी राखी बान्हब ना
पिया सावन में रक्षा बंधन आयल बा
पिया सावन ...

सावन भादों के ...

पिया सावन में नेईहर पह़ुँचाय द ना
कजरी गायब ननदी भउजईया ना
सखियन संग ऊँहा हम झूलब झूला
सखियन संग ..

सावन भादों के महिनमा में करिया मेघ बरसे ला
कलेजवा पे बिजली गिरेला मोर हियरा हुलसे ला

Sunday, 2 September 2018

कर्म का फल

विधा- कविता

जब कोई न सुने दर्द की चित्कार
बेसहारा के हो न कोई मददगार
अपनों से भरे जहाँ में मिले न पनाह
आगे न आए कोई देने को सलाह
तो सुन के करुण पुकार आते जरूर
रक्षा करने दुष्टों से चक्रधारी कृष्ण मुरारी ..

अबला नारी की इज्जत जब होती तार तार
करें दुराचारियों सब मिलकर अत्याचार
बनाकर रख दे जिन्दगी को नर्क समान
जीवन जब बन जाए कठिन लाचार
मन से सुमिरन करने पे आते हैं जरूर
करने को उद्धार चक्रधारी कृष्ण मुरारी ..

जीवन में हो जब दुखों का सागर
समझ में न आए कैसे करें पार
संकटों का पहाड़ चहूँ ओर हो घिरे
सूझे न कोई रास्ता दिखे न मंजिल
सुनकर फरियाद आते हैं जरूर
देने को सहारा चक्रधारी कृष्ण मुरारी

अदृश्य रहकर भी वो रखते हैं सब पर नजर
सारी गलतियों का रखते वो हिसाब किताब
फिर भी लोग बाज नहीं आते बुरे कर्मों से
कर्मों के अनुरूप ही मिलता है दंड अवश्य
जैसी जिसकी करनी है फल देते हैं जरूर  
मुरलीवाले चक्रधारी कृष्ण मुरारी ..

Thursday, 30 August 2018

भ्रमित मानव

विधा - लावणी छंद

मनुज तेरा क्या लक्ष्य है ?क्यों,इस धरती पे जनम लिया
पथ तेरे क्यों भ्रमित हुए जो,,निज धर्मों को भुला गया ?

विश्व के उत्थान के वास्ते , वसुन्धरा पे जनम लिया
निज कर्तव्यों से मुँह मोड़  , क्यों मानव तू भटक गया

मिट्टी के तन से मोह इतना , समझ बैठा खुद को खुदा
खेल रहे सबके जीवन से ,, हुआ आज क्यों सोच जुदा

करते मुनाफाखोरी ..गला,, काट व्यापार के आदी
घिर गया स्वार्थ में मानव..है,मिलावट खोर की चाँदी

लोभ लालच का नंगा नाच ,,,सर्वत्र दिखाई दे रहा
मद में चूर दौलत के..दीन ,,,धनिक में दूरी बढ़ रहा  

मनुज तेरा क्या लक्ष्य है?क्यों,इस धरती पे जनम लिया
पथ तेरे क्यों भ्रमित हुए जो , निज धर्मों को भुला गया

सोने चाँदी में खोया वो , दिल में दया न धनिकों के
नेताओं की भर रही जेब ,,,खून चूसे  गरीबों के

कौन सच्चा कौन कपटी है ,पहचान बहुत मुश्किल है 
भाई बहन में न प्रेम स्नेह , माँ बाप बेघर हो रहे
 
जन्म से पहले अपनी बच्ची ,, को कोख में मार रहे
मर चुकी है आज मानवता , सगे सगे के दुश्मन है

जात पात में बँटा इन्सान ,,, खून खून के प्यासे हैं
तुम क्यूँ भूले मनुज एक ही,,परम ब्रह्म के संतान हैं

रो रही मानवता मही पे ,,, कौन किसके हितैषी है
मिले सभी को कर्मों के फल,, जाने क्यूँ तू भूल रहे 

मनुज तेरा क्या लक्ष्य है?क्यों,इस धरती पे जनम लिया
पथ क्यों तेरे भ्रमित हुए जो,निज धर्मों को भुला गया ?

नन्ही  व किशोरी भेंट चढ़ी , आज भी दुष्कर्मियों के
प्रभु भी उपर रो रहे होंगे,,, जुर्मी इन्सां देख के

दहशतगर्दियों के साये पले ,, जीवन देख भयभीत है
अधर्मियों हो जा सावधान , तुझे दण्ड मिलना तय है

पापियों क्यों नहीं समझ रहे ,,,खुले सभी द्वार नर्क के
हे अचला के सुत खोल नयन,तिमिर दूर कर तू उर के

कर ले मनुज कर्तव्य अपना ,,नव निर्वाण भू सजाये
गर्वित हो तुझ पे धरा ! बढ़ा,,,सम्मान, वो मुस्कुराये !

 

Monday, 27 August 2018

समर्पण

काफिया- आऊ
रदीफ- किस तरह

 अपना प्यार तुमको जताऊ किस तरह
  तेरे दामन में सर छुपाऊँ किस तरह

 निंदियाँ न जाने गयी है कौन से देश
पलकों पे ख्वाब सजाऊँ किस तरह

मुझसे न जाने क्यो हैं वो खफा खफा
रूठे दिलबर को मनाऊँ किस तरह

 तेरे बिन मेरे जीवन का क्या है अस्तित्व
 तू रहते न रूबरू तुझे भूलाऊँ किस तरह

जाने क्यों तुम सा कोई भाता नहीं
 किसी को दिल में बसाऊँ किस तरह

एक ही बार ये दिल किसी पे हारता है
प्रीत की रीत तुन्हें सिखलाऊँ किस तरह