Friday, 16 November 2018

पोटली चाहतों की

चाहतों की पोटली लिए फिरते हैं हम
अनगिनत ख्वाहिशों तले दब जाते हम

जीवन भर  उम्मीद की आस छुटती नहीं
चाहतें एक के बाद एक बढ़ती ही जाती

बस में नहीं सभी के मखमली गलीचे
बार बार ख्वाब पर क्यों दिल सजाते

दिन रैन सुकून के दो पल की चाहतें
हर कोई जीवन भर आस लिए जीते 

खुशियों के पल हम  समेटते समेटते
जीवन में जाने कितने दूर निकल जाते

रह जाती सब कही अनकही चाहतें अधूरी
टूट ही जाती कभी न कभी साँसों की डोरी

छूट जाएगी मोह माया की बंधने सारी
चाहतों की लोलुपता छुटती नहीं कभी 

सच्ची लगन हो चाँद पर चढ़ने की तेरी
तो अधूरी ख्वाहिशें भी हो जाती पूरी

हो  रब की इनायतें तो आती है खुशियाली
भर ही जाती है असीम चाहतों की पोटली

कान्हा चितचोर

विधा-  दोहा

मनमोहन की बाँसुरी,,, बहुत हृदय को  भाय  
कर्ण प्रिय धुन सुन कामिनी,,सुध बुध सब बिसराय

देख छवि चितचोर की ,  मुदित हृद गए  हार
रूप अद्भुत चकित किये  , मोहित हुई अपार

अनुपम छँटा वृन्दावन ,की, छलक रहे नेह
कान्हा रास रचा रहे , आह्लादित सब गेह

चित उन्माद गोपी के, छोड़ दिए घर द्वार
बीती रैन चाँद छुपे ,  बिखरे सब श्रृंगार

दिखाकर रूप मोहनी , वो कर गए अनाथ 
विरह में  डूबे  गोपी, श्याम छुड़ा गए हाथ

राधा विरह में अधीर , सुन कृष्ण समाचार
दूत उद्धव को भेजा,, जिद्द करे न बेकार

बोले उद्धव गोप से ,  बहा न तुम अश्रु धार
मिलना बिछुड़ना सबको, जीवन का यह सार

धरो ध्यान घनश्याम के, करते  उर  उजियार  
विराजमान हिय में हैं  , झांक हृदय के पार

सुन उपदेश भड़क गई ,,ये कैसा संदेश
भूखी हैं हम प्रेम की ,, छलिया उनका भेष   

खिले प्यार के गुल

नयन तेरे लगे हैं पुष्प कमल 
देख कर मन में बजे पायल

मखमली बोल छूते हृदय तल
मद भरी आवाज की हूँ कायल

बिखरे जब जब रेशमी जुल्फें
लगे घिर आए हैं घने बादल

तेरा उन्नत मस्तक जैसे चंदा
दिवाना दिल भी गया मचल

अब मेरी दुनियां तुम्हीं से है
हूँ मैं तो तेरे प्यार में पागल

तुम्हारे संग मैं तो निखर गई
तुझे पाके झुमे खुशी से दिल

लबों पे देखकर तेरी मुस्कान
मैंने खोया चैन मन है घायल

मुझे जबसे तुम तन्हां कर गए
करती रहती मैं याद पल पल

कोई तुझसा नहीं लगे जग में
जाए दम तेरे बाँहों में निकल

मेरा जीवन हो तेरे पनाहों में
यूँ ही खिलते रहे प्यार के गुल

तुझसे जुदा मैं न रह पाऊंगी
बिन तेरे होगा जीना मुश्किल 

Thursday, 15 November 2018

रुसवा ममता

विषय- व्यंग्य

वृद्धाश्रम में अभिभावक , बहा रहे अश्रु रोज ।
कलेजे के टुकड़े को, हर पल करते खोज ।

डग मग चले थाम जिसे ,छोड़ा उनका हाथ  ।
जीवन के इस मोड़ पे ,छोड़ दिया सुत साथ ।

पाल पोस बड़ा करते , गम से रखते दूर     ।
बुढ़ापे का लाठी बन, प्रेम करे भरपूर       ।

ममता रूसवा हो गई,,किया ऐसा करतूत  ।
ऐसे संतान से भला, रहे सभी बिन पूत ।
 
 भूखा रह पाला जिसे ,रोटी दे वो भीख   ।
 नेह इतने दिए फिर भी ,याद न रही सीख ।

जीवन की सभी खुशियाँ ,देकर, सूनी है आँख ।
किया न परवाह उनका,गम दे दिए हजार लाख ।

सुत उनके सेवा करे  , करते हैं सब आस ।
स्वार्थी संतान के रहे , माँ बाप न अब खास  ।

पौध लगा कर आस की, देगा वो फल मूल  ।
ले गया कोई ओर फल , एहसास हुआ भूल ।

घर के  मालिक बदल गए  , हुए बेघर माँ बाप ।
सीढ़ी पे सीढ़ी लगी  ,कर्म फल मिलते आप ।

कुन्डलियां

अ.
छठ* पूजा कहे सबसे , हिम्मत न कभी हार  ।       1.
हुआ अस्त उदय निश्चित , *जीवन का ये सार* ।

*जीवन का ये सार*, रखना खुद पे एतवार  ।
प्रतिकुल समय हो तो  ,धीरज होता आधार ।

समय चक्र के फेर, पर हारकर न तुम बैठ ।
दुख के बाद सुख है,कहे सबसे माता *छठ*।

*अछूता* छठ प्रपंच से  , आडंबर का न भार ।  2.
बिन पंडित का पूजन  ,  *अद्भुत ये  त्योहार*  ।

*अद्भुत ये त्योहार*, होता न मूर्ति पूजन  ।
दिनकर को अरघ दे , मन वचन करते अर्पण ।

अमीर गरीब सभी  , एक ही प्रसाद चढ़ाता  ।
हर्ष उल्लास का पर्व , आड़ंबर से *अछूता*।

******************************************
ब.
सबरी होके मगन मन , करे अश्रु से वंदन    1.
चित्रकुट में पधार रहे, सिया राम व लझ्मण

सिया राम व लक्ष्मण , के पग पखारे सबरी
सुध बुध भूला दिया ,हर्ष में खुद को बिसरी

जब होश आई उसे ,कंद मूंद लाई बावरी
फल देती हरि को,नेह से चख कर सबरी

प्रेम का प्रकाष्ठा, अद्भुत रूप ईश के      2.
मन से उन्हें भजते, छाँव में रखे नेह के

छाँव में रखे नेह के, हैं वश में वो प्रेम के
भूल अगर मान लो, क्षमा देते भक्तों के

बैर खा के झूठे  ,भी हरि रखे हृदयंगम
शरणागत वत्सल, वात्सल्य मय वो प्रेम

****************************************** 

गुरु सानिध्य

मनुज विमुख न हो कर्म से , रख ले उर तू साफ
  प्रभु चरण के रज ले लो, करे भूल वो माफ

तन की माया त्याग दो, टुटे श्वास की डोर
 दया कर सभी जीव से , कर्मो पर कर गौर

छोड़ जाना जग सबको ,,, बोलो मीठे बोल
 कर उपयोग पल पल का ,,, जीवन है अनमोल

  है निश्चित कुछ भी नहीं ,क्षण भंगुर  संसार
  नेकी जाते संग ! न तू  , दौलत पर दिल हार

छल प्रपंच जग में भरे , मुश्किल है पहचान 
 गुरु सानिध्य से होती, है मंजिल आसान

गुरु चरण शीश झुका , मिलते जीवन सीख
  चाह सभी पूरी करे, मांग ज्ञान का भीख

शान्ति मिले गुरु चरण से ,दिल में भरते प्यार
  सब क्लेशों को वो हरे, करे वही भव पार ।

 

Monday, 12 November 2018

अलमस्त बचपन

विधा- कविता(बाल रचना)

मैं तो हूँ एक छोटा सा बच्चा
लेकिन हूँ मैं मन का सच्चा
दादी दादू के आँखों का तारा
माँ के आंचल का हूँ सितारा ..

पापा का हूँ मैं कृष्ण कन्हैया
संग उनके खेलुँ भूल भूलैया
घुटने पे पापा झुलाते झूला
कान्धे पे चढ़ समाता न फूला...

गलियों में हम करते हैं हुडदंग
नित नए खेल से सब होते दंग
मित्रों की टोली में हम रहते मस्त
बाग बगीचे के मालिक होते पस्त

बच्चों के शरारतों से माँ परेशान
पल में भूले क्रोध, देख भोलापन
रोज ही शिकायतें लाए पड़ोसन
ऐसे ही अलमस्त होते हैं बचपन..

सतसंग मित्रों की ज्यों मिले सच्चे
बन जाते संस्कारी अज्ञाकारी बच्चे
माता पिता के जब हम कहना मानते
सफलता के कसीदे नित्य ही काढ़ते

उषा झा  (स्वरचित)
उत्तराखंड (देहरादून)