Wednesday, 21 November 2018

गूढ सीख

विधा- पदपालाकुलक छंद

तज  कर मान अभिमान को तू   ।
बन जा रे  मनुज  इंसान  तू   ।
तन कर्म भट्टी में तपा ले  ।
मन को खरा सोना बना ले   ।

जीवन पथ मुश्किलों से भरे
दृढ़ निश्चय से हल मिला करे
कठिन तपों से ही मुक्ति मिले
ब जलधि मंथन से,अमृत मिले

चल तू कर्तव्यों के राह पे   ।
चाहे कंटक बिछे हो पथ पे   ।
हो न तेरा साथी तभी भी ।
तू नेह दीप ले चल तब भी ।

ये जीवन है बहती दरिया  ।
इस के भगवन ही खैवैया    ।
वो ही करे पार दरिया के   ।
 जो  ठान लेते  तैरने के    ।
 
बिन कोशिश मेवा नहीं मिले ।
फल कठिन परिश्रम से ही मिले  ।
ये ही गूढ़ सीख जीवन का    ।
है क्रोध द्वेष बेमतलब का     ।

Tuesday, 20 November 2018

धर्म (मुक्तक)

बताकर धर्म का पैगम्बर करते जुर्म संग हैं उनके
बनाकर नारी को खिलौना जीवन से खेलते उनके
दस्तूर नहीं किसी कौम का, लिखा है ग्रंथ में कहाँ
बीच राह में छोड़ के अकेले,दिल फिर तोड़ते उनके

धर्म की आड़ में छुप के जो मानवता पे वार करते हैं
लेके पत्थर निहत्थे लाचार के सिर वो फोड़ा करते हैं
नापाक इरादे से इन्सानियत को क्यों कर करते रूसवा
खुदा से बंदगी कैसी जो होली खून की खेला करते हैं

अंधविश्वास के आड़ में धर्म को बनाते हैं हथियार
हद से ज्यादा औरतों पे रखते बंदिशों के पहरेदार
औरतें कठपुतली नहीं वो भी जीती गाती है इन्सान
उन्हें अवसर दो फैला दो शिक्षा व ज्ञान के उजियार

  बाहर निकाल धर्म के रूढ़िवादी पुराने खयालात
  बेटा ही जल दाता भूला दो, कमजोर मानसिकता
  प्यार करो दोनों को बिटिया भी देगी सुख सेवा से
  गौरवान्वित करेगी वो बनके तेजस्विनी महाश्वेता

बेटी (मुक्तक)

कोख में मौत बेटी की,सरेआम हो रही
ममता की प्याली खाली, कचरे में रो रही
बेटे की लालसा मन में, करे उपेक्षा उसकी
आज सृजन है शर्मसार, प्रकृति भी रो रही

सड़कों पे अत्याचारी, छीने नींद माँ बाप के
नन्हीं भी नहीं सुरक्षित, कहाँ रखे संभाल के
जनम लेगी कैसे कली ,डर में आज अभिवाक
घर से स्कूल तक जीती बच्ची साये में डर के 

कितनी पढ़ी हो बेटी ब्याही न जाती बिन दहेज के
समाज में व्याप्त दहेज,छीन रही जान बेटियाँ के
सबको खुश रखकर घर संभालती दिलों जान से
मिलते न चंद लम्हें जीवन में उसे खुशी व प्यार के

बिन प्रीत अधूरे सब

जलना ही शमां की नियति
सदियों से उसकी यही गति
रौशन करके सबों के जीवन
तिल तिल करके वो मरती

महल हो या झोपड़ी देती
एक समान ही वो ज्योति
किसी संग विभेद न करती
जल के भी वो राह दिखाती

किस्मत में है उसका जलना
डराती नहीं उसे काली रैना
किसी से कुछ नहीं कहती
जीवन के जंग खुद ही लड़ती

देख जलते शमां को अकेली
भर आता परवाना का दिल
आरजूँ में मिलन के दो पल
जल जाता परवाना पागल

चले न जोर इश्क पे किसीका
न्योछावर हो लुटा देते खुद को
शमा परवाना का प्रेम अनोखा
है निस्काम बलिदान उसका

जाने कौन सुख मिलता उसे
मिट जाता चाहत में प्रिया के
इस जगत में बंधे हैं सब कोई
दिल से होते मजबूर हर कोई

शाश्वत सत्य यही प्रीत की
बिन प्रीतम के अधूरे सभी
मिल जाए सबको मुहब्बत
हँसते गुजरे जीवन सभी की

Monday, 19 November 2018

मुहब्बत

विधा-मुक्तक

उनको देखते ही मेरा हाल बूरा हुआ        1
मन मेरा बेकाबू दिल भी घबराया हुआ
धड़कनें भी कहाँ अब मेरा कहना माने
साँसों की तीव्र गति से बैचेन मनवा हुआ

यौवन की दहलीज पर चढके करे सब भूल   2.
रुप यौवन का माया जाल लगे जीवन फूल
धड़क धड़क कर धड़कनें छीने जीवन मूल्य
बहक जाते कदम ऐसे बिछते पथ पर शूल

कब मांगने से मिले, मुहब्बत है किसी को      3.
रब की मर्जी से मिले,मुहब्बत है सभी को
रूह की रौशनी से, सजदा सच्ची मुहब्बत
मन में बसाकर मूरत , पूजता मन है तुझीको

प्यार तो व्यापार होता , ठगता सब किसी से  4.
प्यार का दिखावा करे,  दे घात पीछे से
नेह लुटा के पता चले, सुकून मिले कितना
दुख में जो साथ निभा दे, मिलता है प्यार उसे

लाड़ली

विधा-नवगीत

सुन लो ऐ जग वालों
हूँ तेरे आंगन की कली
बगिया की खुशबू हूँ
मुझसे महकती धरा है
मेरे बिन बेनूर चमन

तेरे गुलशन की हूँ तितली
छूके पंख न कर घायल
मुट्ठियों में कैद न करना
देख के कर ले मुग्ध नयन
मैं हूँ सबकी मुस्कान

स्नेह की धारा मुझसे निकली
मैं ही हूँ झरणों की कल कल
संगीत की धुन मुझसे निकली
हूँ सबकी दिलों की धड़कन
मेरे संग प्रेम अंतहीन

हूँ मैं तेरेकोख की लाड़ली
मुझसे ही है घरों की लाली
करो न मुझको कोई भी नष्ट
वर्ना खत्म हो जाएगी सृष्टि
मेरे दम से दुनिया रौशन

परवाना शमां पे निसार

विधा- सरसी छंद आधारित गीत

शमां न जाने तू क्यों जलती , किसे कर रही याद  
तिल तिल कर तू मरती रहती, है किसका अवसाद

तन मन अपना जला रही है  , क्यों हो गम में बोल
हिया में तेरे कौन दुख है ,  राज जिया की खोल

रंक के घर व राजमहल करे , रौशन एक समान
तिमिर हटाकर रैना की तुम , देती हो वरदान

प्रतिक्षा में अभिसार की करो , न तुम वक्त  बरवाद
शमां न जाने तू क्यों जलती, कर रही किसे याद        1.

हूँ परवाना पागल, बरसों,,,   किया है इन्तजार
घायल हुआ सुधी बिसराया, दिल तुझ पे गया हार

मिट जाए हस्ती फिर भी टुटे , न मिलन की अब आस
 दिवाना हूँ दीदार के लिए, मिल लो तू बस काश

तेरे बिना व्यर्थ है जीवन ,,,,,  हूँ तेरा दिलशाद
शमां न जाने तू क्यों जलती, कर रही किसे याद   2.

रुप सुहाना देख के तेरा,,,,    गवां लिया है होश
आलिंगन को मन लुभाया जब , आ गया बहुत जोश

चाहे जल जाए मेरे पंख,,,,   करूँगा तुम्हें प्यार
सदियों से हूँ  दिवाना, तुझ  ,,,पे जान न्योछावर

हम तुम हैं जन्मों के साथी, अद्भुत है ये प्रमाद
शमां न जाने तू क्यों जलती, कर रही किसे याद      3.