Thursday, 17 January 2019

उत्थान

विधा - सार ललित छन्द

भीड़ में सब एक दूजे को ,,,रौंद ही डालते हैं      1.
चींटी चलते पंक्ति बनाकर ,, मनु नियम तोड़ते हैं
धीरज धर ले हर कोई तो,,,घटना टल सकती है
कभी न कुंभों के मेले में ,,,भगदड़ मच सकती है

होड़ लगी लोगों में कैसी,,,सब में मारा मारी          2.
छीने हक भाई के, लालच ,,अब रिश्तों पे भारी
जिनको कद्र नहीं रिश्तों का,,उसे कौन अपनाया
लगे बोझ माता पिता जिन्हें ,, समझो विनाश आया

स्थान मिले सबको ही अपना,,ये तो हक जन जन का 3.
छीने न कोई किसी का हक, समाज हो समता का
अनुशासन से इंसानों का,,व्यक्तित्व निखर जाता
सत्य की राह में शूल भले,, युग पुरुष न घबराता

निस्काम कर्मों से फल मिले,,,यही भाव गीता का      4.
काम  क्रोध,लोभ,मद छोड़ने ,,पे उत्थान सबों का
बैर भाव का जो त्याग करे,,,निर्मल मन हो जाते
दुख में दया प्रेम दिखलावे ,,, वही मनुज कहलाते

मन मरुस्थल

मुँह मोड़ लिए जब सजन, हुई बहुत हैरान
तुझ बिन जिन्दगी मेरा , बन गया रेगिस्तान

जिन्दगी बिखर गई रेत सा
कोई नहीं लगे अपना सा 
चौ राह छोड़ क्यों चले गए
हवाओं का रूख विपरीत आज
बेसुरे सारे दिल के साज

ढूंढ रहे मरुस्थल में  , हम कदमों के निशान
तुझ बिन जिन्दगी मेरा , बन गया रेगिस्तान

पग पग पे जीवन छलता है
कोई नहीं कहीं दिखता है
सहरा भी मन भरमाता है
दूर दूर तक  है  सूनापन
करूँ किसपर कैसे यकीन

अस्तित्व को तुमसे ही , मिली नई पहचान
तुझ बिन जिन्दगी मेरा , बन गया रेगिस्तान

तुमने मुझे कहीं का न छोड़ा
 बेरूखी ने दिल है तोड़ा
मृगतृष्णा की चाह ने छला
 सितम तूने जो ऐसा ढ़ाया
 दिल मेरा फिर संभल न पाया

एक डगर चलकर पिया , थी तुमसे अंजान
तुझ बिन जिन्दगी मेरा , बन गया रेगिस्तान

गर्म हवाओं से दहकता तन
मन मरुस्थल में चले आँधियाँ
रेत में दबी लम्हों की दास्तान
उग गई जख्मों की झाड़ियाँ
सिंचित कर इसे नेह बूँद बन

रीतेपन के रेत बहे दृग ,, से, प्रीत दो प्रतिदान 
तुझ बिन जिन्दगी मेरा,,,बन गया रेगिस्तान

Wednesday, 16 January 2019

रिमझिम फुहार

विधा- गीत
सावन सुहावन लाई बरखा बहार

सन सन पवन चले हिया में करे शोर
उड़ते घुमड़ते बादलों को देखकर
धड़कनें लगी अरमां दो दिलों की 
आसमान से बरस रही बूँदे हजार
सावन सुहावन लाई ...

गगन में देख कर घटाएँ घनघोर
मुदित चातक स्वाति बूँदें देखकर
पपीहा गाने लगी नाचने लगे मोर
किसलय से सुसज्जित बन हुए हरे
कलियाँ खिली, बागों में आई बहार
सावन सुहावन ...

बादल के गर्जना से दामिनी दमकी
टीप टीप बूँदनियाँ भी छत पे टपकी
सौंधी सौंधी जब खुशबू छाये मिट्टी की
प्रियतम से मन मिलन को तब तरसे
आसमान से  गिर रही रस की फुहार
सावन सुहावन ....

मचले हैं अरमान, कदम भी बहके
बूँदों की रिमझिम सुनके मन थिरके
मन के भाव जगे जब घिर आई बदरा
ताप मिटे हिय के ,सुर सजाती जियरा
प्रीत के हिलोर में डूब जाता है संसार
सावन सुहावन लाई ....

Monday, 14 January 2019

उपहार

विधा-- ललित छंद
16/12

प्रियतम बिन विरह की मारी,,,नैन बहे जल धारा
 शूल बन गई सेज हमारी ,,,, मुझे पीर ने मारा

आया है ऋतु पावस देखो,,,  लेकर रिमझिम बूँदें
अगन बढ़ाए मिलन की, जगे  ,,,चाहतों की उम्मीदें 

तड़पते हैं हम तुम विरह में, दिल वियोग में हारा
शूल बन गई सेज हमारी,,, मुझे पीर ने मारा..           1.

गरजे हैं नभ में बादल क्यों  ,,,देते  उन्माद  जैसे
तरसे उर अब प्यास बढ़ाती,,,हुए व्याकुल ऐसे

दग्ध हृदय की चैन छीन रही,,, वेदना बहुत भारी
सजनी बैठे राह निहारे,,, अंखिया भी है हारी

अनगिनत ख्वाब नैन में सजा,,,, धरा ने नभ उतारा
शूल बन गई सेज हमारी,,,,,   मुझे पीर ने मारा      ...2.

पवन झूम के तुझको बुलाये,,, क्यों मुझको भूल गए
बनी आज धरती है दुल्हन,,, जाने किस देश गए

 मचल रहे हैं अरमान बूँद,,, प्रेम उपहार लाए
 मेघों के गर्जन नर्तन भी,,,पी के याद दिलाए

बाग में कुहूके कोइलिया  ,,,सुनके लगता प्यारा
शूल बन गई सेज हमारी,,,, मुझे पीर ने मारा    ...3.

 

Sunday, 13 January 2019

नेह का बंधन

चाँद सूरज सा चमके भाई, चाहत हर बहनों का
बहन को दे प्यार हर भाई ,यही उपहार राखी का

एक ही आँचल के वो सितारे
नेह डोर से बंधे दोनों का प्यार
भैया तू रहना हमेशा सलामत 
बहनों के दिल की यही पुकार

अक्षत रोली चंदन से कर तिलक
रब से ले अभय वरदान जीवन का
जीवन में खुशियों के दीप जले
बहना आरती उतारती भाई का

रेशम की कच्ची डोरी से बंधे, प्यार भाई बहनों का
बहनों को दे प्यार हर भाई, यही उपहार राखी का

भाई बहनों को मान देना हमेशा
रहने न देना तुम कभी भी उदास
बहनों की सदा इतनी सी ख्वाहिशें
रिश्ते रहे अटूट स्नेह के जज्बातों से

बहनों का हिम्मत टूटने न देना
विपत्तियों में रखना तुम ध्यान
मायके याद आए तू लिवा लाना
वहां के कहकहों से रूबरू कराना

रब से मांगे भाइयों के वास्ते, पूरे हो ख्वाब उनका
बहनों को दे प्यार हर भाई, यही उपहार राखी का

सूखे वृक्ष

समय को लग जाते हैं पंख
सुख के दिन कितने जल्दी
तीव्र वेग से बीत जाता
पता ही नहीं चलता ...

खुशियों को समेटते समेटते
जीवन की सांझ ढल जाती
रूप यौवन खत्म हो जाता
पता ही नहीं चलता ...

कुछ बनने के धुन में खोकर
बचपन वक्त के तीव्र वेग से
तालमेल बैठाने में लगा रहता
वक्त तो हर पल बदल जाता ..

युवावस्था में परिवार व बच्चे
के बीच फर्ज निभाते निभाते
वक्त हाथों से फिसल जाता
पता ही नहीं चलता ..

फर्जों के इस आपाधापी में
बहुत से काम अधूरा रह जाता
ख्वाहिशें कई अधूरी रह जाती
समय बड़ा ही बलवान होता ..

जीवन के पौधे छायादार वृक्ष बन
जाने कब सूखने लग जाता
समय चक्र कब बदल जाता
पता ही नहीं चलता ...

पौधों को हर कोई ही सिंचता
पेड़ बन फल फूल जो वो देते
जीवन की कैसी ये अद्भुत रीत
सूखे पेड़ को कोई न पूछता ..

यौवन का संग जब होता
सब कोई नतमस्तक होता
सूखे पेड़ को सब काटता
हर कोई ही उसको जलाता

हो जाते हैं जीर्ण शीर्ण देह
विवशता पे अपनी वो रोते
जीवन जीवंत खत्म हो जाता
पता ही नहीं चलता ...

Saturday, 12 January 2019

वेदना

विषय मुक्तक--दुःख

तुम बिन जीना अब दुश्वार हो गया  
तुम संग थे तो जीवन फूल बन गया
दिल को दर्द गम है तेरे वियोग का 
मुहब्बत का गम तुम ता उम्र दे गया
       
तिनके तिनके से एक नीड़ बनाया था 
अपने नन्हें चुजों  को दाने खिलाता था
पंख ज्यों ही आया वो उड़ गया फूर्र से
पाखी का दुख ही संग साथ अपना था

रूबाई  / गम

तेरी याद  एक   नासूर  घाव
तू अब देख बीच  मझधार नाव
जाने क्यों गम दिए ,गए चौराह छोड़
किस्मत पे प्रिय लगा दिया है न! दाँव

यादों में  हो शामिल , हो यार कहाँ !
राहों  में  हो  फूल, वो तकदीर कहाँ !!
कर जाओ रुसवा गर सनम,   मुझे
घुट जाएंगे  साँस,  वो मुहब्बत कहाँ ।।