Monday, 18 March 2019

माँ है बिमार

विधा--अहीर छंद

माँ है बहुत बिमार ,,डाॅ करते उपचार
चलने से लाचार,,पीड़ा है भरमार
मर्ज का हुआ भान,,प्रभु बचाना जान
आफत से अंजान,,परिवार परेशान

हालत है नासाज,,हुए हैं सभी जाँच
आपरेशन न टाल ,,कोई संशय न पाल
घुटने के बदलाव ,, डाॅ ने दिए सुझाव
पीड़ा होगी दूर  ,, जीवन सबका नूर

हो गया है इलाज ,, सहमे हैं हम आज
चल ली , है संतोष,, आए हृद को होश
मिट गए सभी पीर,,बहे खुशी के नीर
छा गए हर्ष धूप  ,, खिले हृदय के पुष्प

उषा झा (स्वरचित)

Saturday, 9 March 2019

मनमीत

विधा- गीत

जल रही मैं सदियों से , तेरी ही प्रतिक्षा में
जम रही अब सुधियों के धूल,ले लो तुम पनाह में

जीवन दीया के मैं बाती ,,तुम भी घृत बन जाना
बुझने ना देना आस पिया, जोत प्यार के जलाना
मिलके सुख दुख बाँटू हो सिर्फ ,नेह छैया अंगना में
जल रही मनमीत सदियों से ....

प्रेम अगन में जलती हर दिन,,आँधी बुझा न डाले
डरती दुनिया के नजरों से,,, हैं दिल सबके काले
आ एक दूजे को थाम, हो,,,जाए फना संसार में
जल रही मनमीत सदियों से ....

नारी तो बाती होती है,,पुरुष है ज्वलन शक्ति 
अधूरे एक दूजे बिन है,,द्वय दिलों की आसक्ति
हम संग हो तो अपने चमके,,सितारे आसमां में
जल रही मनमीत सदियों से ,तेरी ही प्रतिक्षा में

दो दिल जब मिलते हैं प्रेम दीपक पथ रौशन करे
नर बिन नारी है अधूरी,, कौन इससे इंकार करे
यही सत्य है सृष्टि का नींव ,,नर नारि के मिलन में
 जल रही मनमीत सदियों से,तेरी ही प्रतीक्षा में
जम रही सुधियों के धूल ,ले लो तुम पनाह में  ।।

प्रो उषा झा रेणु 

सिक्को पे न डोल कलम

कमतर न कलम को आंक
तलवार से पैनी इसकी धार

कलम या तलवार कौन बड़ा है
प्रश्न बार बार मन में उठता है
एक दुश्मनों के शीश काटता
दूजा शब्दों से ही करता वार
तलवार से पैनी इसकी धार

कलम में ताकत है बेशुमार
निष्पक्ष लेखन से रख सरोकार
देर न लगता तख्ता पलटने में
मदांध शासक करे अत्याचार
तलवार से पैनी इसकी

जब निरंकुशता हद से बढता
झूठ जब सत्य पर भारी पड़ता
कलम लगाता अंकुश उन पर
कमाल किया कलम ने हर बार
तलवार से पैनी इसकी धार ...

कलम ओज भरती है वीरों में
इन्सां के संग निभाती अन्याय में
अश्रु पोछे कलम अबलाओं के
कलम ने काम किया है हजार
तलवार से पैनी इसकी ...

कलम में ताकत है अनगिनत
अरी को ललकार लहू बहाती
कभी लिखे शांति प्रेम संगीत
प्रेम पाती से पत्थर दिल जाए हार
तलवार से पैनी इसकी  ..

जब कभी कलम बिक जाता
समाज तब टुकड़ो में बँट जाता
दीन दुखियों पे ही गाज गिरता
कुत्सित मनोवृत्ति बहुत बेकार
तलवार से पैनी इसकी ...

कलम तुम अद्भुत अनमोल
सिक्को के खनक पे न डोल
आईना समाज को दिखा तुम
करना है बस इतना उपकार
तलवार से पैनी इसकी ...

Thursday, 7 March 2019

दूषित निति कौरव का

विधा- बरवै छंद

पांडु पुत्र के न रहे ..अब अधिकार
ताऊ बैरी, किससे .. करे गुहार

स्वार्थ के रिश्ते, बहे..रक्त मवाद
भाई हो जब दुश्मन ..घर बर्बाद

भ्रष्ट दुर्योधन चले .. शातिर चाल
फंस गए सभी पांडव ..उठा सवाल

सकुनि के छल ने छीन..ली घर बार
पांडव छुपे वनों में ...ही परिवार

द्रोपदी को लगाया ,, जिस दिन दाँव
मार दिया कुल्हाड़ी,, कौरव पाँव

अबला की चीर हरण,,भरे बजार
कौरव पुत्रों के घृणित ,,,थे व्यवहार

कान्हा पांचाली की ,, सुनी पुकार
लाज बचा ली तब प्रभु,,कृष्ण मुरार

दुर्योधन के मन में... था अति लोभ
बंधी पट्टी मद की ...था हृद क्षोभ

छल घृणा से हुआ था ,,बड़ा संग्राम
रक्त बहे सगो के तय , यही अंजाम

रहे स्वच्छ पर्यावरण

लुप्त हरियाली से क्षुब्ध है वसुन्धरा
बिन बरसे नभ में घुमड़ रहे हैं बदरा
बिन नीर ताल तलैया सब सूखे पड़े
ग्लोबल वार्मिंग से मनुज संभल ले जरा

धुआँ धुआँ है जिन्दगी जलती पराली
गाड़ी की भीड़ ने आफत बुला डाली
दूषित पर्यावरण में है बेबस जीवन 
नित्य नीर बहाते हैं प्रकृति के माली

प्रकृति के संग खिलवाड़ अति महंगा पड़ा
कहीं कहीं जल प्लावन कहीं सूखा पड़ा
भूख से बिलख रहे सब, मानव लाचार
मृदा क्षरण से अब सारा जहान उजड़ा

पशु भूखा है खोज रहा हरियाली
घोसला बिन पक्षी के,कानन खाली
उभर रहे नदियों में रेत और बालू
जल बिन तड़पे मछली,जलाशय खाली

नादां इन्सां कंक्रीट के जाल बुन रहे
दिन प्रतिदिन पर्यावरण नष्ट कर रहे
वृक्ष कटान व केमिकल गैस से दुखी मही
रुग्ण सभी, दूषित वायु सांस में घुल रहे

जाग जा मनुज, वृक्ष लगा कर वृष्टि करा दे
पैदल चलकर अब प्रदूषण को हरा दे
कूड़ा का निस्पादन न ही यत्र तत्र कर
लो कपड़े की थैली प्लास्टिक बंद कर दे

Monday, 4 March 2019

पुण्य तिथि

सबों को छोड़ गए ,,,पितु जाने किस देश
तीन वर्ष से नीर,,,, दृग में बचे न शेष
उनके बिन अधूरा,,,लगे हमें परिवार
वंद पलक करूँ प्रकट ,,,होती छवि हर बार

रोबदार व्यक्तित्व,, उनका अप्रतिम शान
दयालू इतने कि,,,,छिड़के सब पर जान
निश्छल हँसी की, अब,,,तलक सुने दिल गूँज
बिन पिता हूँ अनाथ,,हुए खत्म नेह पूँज

पुण्य तिथि पर पितु को, करे दिल बहुत याद
धी मैं उस विभुति की ,,,,दूँ नसीब को दाद
लूँ जब भी जनम वो, बने पिता हर बार
विनती तुमसे प्रभु ,, नैन बहे अश्रु धार

Friday, 1 March 2019

आलम मदहोशी के

रविधा --पदपादाकुलक छंद

ओ पिया आ गया वसंत है
उनमुक्त भ्रमर बाग में है
खिल रही कली उर में मेरी
तकती राहें निश दिन तेरी

सज संवर सजनी इठलाती
पी संग सखी नयन मटकाती
रंग रही रूत सबके उर्मी
मधुमास में मिले द्वय प्रेमी

कोयल की कूक अब न भाती
छन छन पायल शोर मचाती
साजन बिन सब फीका लगता
बैरी पी याद नहीं करता !

सज धज दुल्हन बनी मही
ख्वाबों के झूला पींग रही
मन भाए खुशबू कलियों के
आया आलम मदहोशी के

नव पल्लव से तरु प्रमुदित
मन कूँज प्रीत से सुवासित
कुसमित कानन दिल हर्षाए
प्रियतम हृदय बहुत बौराए