Saturday, 6 April 2019

गीत आजादी का

आया है दिन आज खुशियों का
गाओ सभी गीत आजादी का

अनुपम स्वर्गिक देश हमारा
लगता हमको जां से प्यारा
नाज हमें अपनी धरती पर
अर्पित बूंद बूंद शोणित का
शत्रु न दूषित कर पाएगा...

मातृभूमि के लिए मरेंगें
और उसी के लिए जिएंगें
बलि बलि जाएंगें क्षण क्षण हम
शत्रू के दूषित नजरें
कभी न बर्दास्त करेंगें

आजादी हमें सबसे प्यारी
वीरों ने जान लुटा के दी
शहीदों की कुर्बानी
व्यर्थ न हम होनें देंगें
देश के लिए हमें जीना है
इसके लिए सदा मरना है

आओ सब गुन गुना ले
आजादी के गीत गा ले

पथ विहिन मनुज

मानव किस उद्देश्य से , तुम आए संसार
फंसे हुए भ्रम जाल में,मानव धर्म बिसार ।।

मनुष्यता की नाव में, बैठे हो तन धार
भूले हो कर्तव्य क्यों,बन धरती पर भार  ।।

यह माटी का देह ले, खुद को ईश्वर  मान
पर दुख से है विरत तू ,दम्भ लोभ की खान ।।

स्वारथ में मानव घिरा , खुद को कर संम्पन्न
जो पर पीड़न कर रहे ,सबसे बड़े विपन्न  ।।

मानव लोभ प्रवृति से , ग्रस्त हुआ सर्वत्र
सजा धजा फिर भी लगे ,जग को वह निर्वस्त्र  ।।

आया जग में किसलिए ,क्या है तेरा काम
पाप दिशा में भागता , मानी नहीं लगाम   ।।

दया धर्म को त्यागकर , कैसा तू धनवान 
राजनीति की ओढ़नी,गर्हित मन अभिमान    ।।

कौन देव दानव यहाँ ,कैसे हो पहचान
रक्त रक्त का शत्रु है , मनुज बना शैतान   ।।

भार कोख में बेटियां , जग करते शमशान
मातृशक्ति की दुर्दशा , करे अंधे इन्सान     ।।

मनुज मनुज के बीच में , नफरत की दीवार
जीवित हम कैसे रहें ,दुनिँया में बिन प्यार    ।।

मानवता रोती फिरे ,कौन किसी का  मित्र
अपनों के ही रक्त ले ,बना रहे वो चित्र     ।।

खामोशी

वेदना की बदलियों ने
आज फिर आकश घेरा
खामोशियों का पहरा
बिठा दिया दिल पर
जीवन उपहास बन गया
पीर से है हृदय विचलित
मिले जो अपनों के दंश
सह वो नहीं पा रहा

अपनेपन का ढ़ोंग
रचाते हैं सभी लोग
झूठी दया सहानुभूति
के मत बनो तुम पात्र
झूठे स्वांग में सब फँस गए हैं
आज दिलों के रिश्ते
स्वार्थ में लिपटे होते

अब दिल का लगाना
खेल ही तो हो गया
किसी को मत कहो कुछ
भाता नहीं किसी से
 कुछ बात कहना
खामोशी की चादर
ओढ़कर सबसे छुप जाना
एक मात्र अब अस्त्र है

किसी का दर्द का उपहास
सभी ही उड़ाते रहते हैं
फिर किसी से कहकर
हँसी का पात्र बनना
किसको स्वीकार होगा
जब अपने ही खंजर
भोंक डाले वक्ष पर
फिर धीर कौन बंधाए
है बहुत बेर्दद जमाना
नैना फिर क्यों न नीर बहाए...?

 

Friday, 5 April 2019

अपना लिया

सपने में हमदम को अपना बना लिया
हसरतें हुई पुरी खुदा को ही बुला लिया

तुमसे मिले कितने मुद्दत की बात हो गई
तेरी सूरत को मैंने नयनों में बसा लिया

जाने मुझे किस बात की सजा दी तुमने
क्या भूल हुई है तुमने दामन छुड़ा लिया

मिलन की अब कोई सूरत नजर नहीं आती
बस यादों को मैंने अपने दिल में समा लिया

विरह के दिन नागिन सा डसते हैं मुझको
पीर में मैंने अपना जीवन को मिटा लिया

 वफा में लौटकर तुमको आना ही पड़ेगा
पि के वास्ते ,मैंने खुद को ही मना लिया

उम्मीद है विदा होंगे जुदाई के ये लम्हें
सपनों में सही मैंने बाँहों में छुपा लिया

हमनफज

बेहद दिल अजीज
वो हमनफज
एक अमिट छाप
छोड़ गए
रह गए सारे
अनछुए जज्बात..

वो भीनी भीनी यादें
वो मीठी मीठी सी
कुछ कही अनकही
बाते...
दिल के कोने में
अपना घरौंदा बनाकर
वो हसीन दिलकश
हमनफज
एक मीठी चुभन दे
ले गए सारी हसरतें...

भींगी भींगी सी
एहसास
हलचल सा मचा
रिश्तों को अपनी
गर्मी में पिघलने
को आतुर कर देता

एक खलिस सी
रह जाती
दिल मिलने को
बैचेन कर देता
वो हमनफज..

कान्हा चितचोर

मनमोहन की बाँसुरी , सुन मन शीतल होय
कामिनि खोई शून्य में,सुध बुध सारी खोय

देखी छवि चितचोर की ,हृदय गए हम हार
रूप अलौकिक मन बसा,मोहित हुए अपार

वृन्दावन की भूमि में, छलक रहा है नेह
रास रचा रहे कान्हा , आह्लादित सब गेह

पीकर चितवन की नशा,छोड़ दिए घर द्वार
रैन संग चंदा गया ,बिखरे सब श्रृंगार

 भंवर में डूब रही गोपी , श्याम छुड़ा गए हाथ
विरह अग्नि में जला के ,,वो कर गए अनाथ

उद्भव की सुन गोपियां,  सहें विरह की पीर
मन मोहन के संग गया, हो कैसे अब धीर

धरो ध्यान घनश्याम का ,करके उर उजियार
हुए प्रतिष्ठित हिय में,, अब कैसा घर बार

बीते यौवन

इस यौवन की यही कहानी
मन में आग नयन में पानी
प्रणय भाव में नयन निमज्जित
लगता सब कुछ हुआ विसर्जित

भींगे मन में प्रेम भरा है
मानस उपवन हरा भरा है
प्रिय की है यह चूनर धानी
मन में आग नयन में पानी

जो है दूर , याद आया है
इन्द्रधनुष मन में छाया है
हर सांस में प्रिय की वाणी
इस यौवन की यही कहानी

शैलभ जले जब दीपक जलता
प्रेम अग्नि से जीवन मिलता
प्रणय यान में घूंमूं क्षण क्षण
अर्पित प्रिय को है  कण कण

मैं भिक्षुक सी प्रिय है दानी
इस यौवन की यही कहानी