Saturday, 2 November 2019

पहचान

दुख सुख में प्रभु! सब बँटे , तुमने किया विभेद ।
एक सभी तेरे लिए , फिर क्यों करता भेद ?

 पिघला तेरा क्यो न हिय, लाचार किए मर्द ।
किसी की झोली भरता, दिया किसी को दर्द ।।

आँच सत्य पर जब नहीं , सच फिर क्यों लाचार ।
दिल को भाता  झूठ है, सत्य कैद दीवार ।।

अपना दुख लागे बड़ा , दिखे न दूजे पीर ।
मानव लिपटा स्वार्थ  में, देता मन को चीर ।।

कान खोल सुन ले मनुज , प्रेम बसे संसार 
जग उजाड़ नफरत भरी,दई मनुजता मार।

क्यों मनुज जड़ खोद रहा ,खुद जाएगा सूख
सिंचित कर नींव अपने, बदले तेरा रूख ।।

देख सूरत रीझ गया , पकड़ा अपना माथ ।
गुण की जिसको परख है, खुशियाँ उसके साथ ।।

उषा झा

Friday, 1 November 2019

कुरीति


विधा- गीत 16/ 14 ( लावणी छंद)
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मुखड़ा

क्यों कुरीति की बलि बेदी पर
चढ़ती नारी हर युग में ?
किस्मत की मारी को सब ही ,ठोकर मारे जग में ।

अंतरा

नियति ने मझधार जब छोड़ा,,नही मौन दृग, नीर बहा ।
पूत संग वह रही अकेली ,भरी जवानी बनी तन्हा।।
बिखर कामना गई ,रेत सम,भरी वेदना जीवन में 
मान अभागिनी को दे कौन?, पीर जले अंतस् मन में ।।
क्यो कुरीति की बलिबेदी...

जीवन में बिन रंग उम्मीद ,,करके कैसे ज्योति जले ?
डोर नेह की, थामे जीती ,दिल में, सुत के ख्वाब पले।।
बना हृदय पाषाण पीर से,,अटल-कर्तव्य पथ पर थी ।
पुत्र संग माँ भी खुश रहती,आंचल में नेह भरी थी ।।
हुई सफल तप, माँ बलिहारी, सुत खुश नूतन भविष्य में 
क्यो कुरीति के बलि बेदी....

अबला पुलक रही बेटे को , शुभ निहारन की घड़ी है ।
घोड़ी चढ़ कर पुत्र पुकारे, आ माँ तू कहाँ छुपी है?
नयनों का टूटा बाँध तभी, चाल चली विधि ने गहरी ।।
लगाती नजर टीका सतु को, उस माँ की ही नैन भरी ।
सहे वैधव्य बुत हतभागी , सुन ग्रहण! डूबी दर्द में ।
क्यो कुरीति के बलि बेदी....

देर हुई क्यों सुत आशंकित , घर में माँ को खोज रहा ।
करे तिलक अपशगुनी कैसे , किसी ने माँ को क्या कहा ।
संवेदन हीन बने परिजन ,, हृदय पूत का व्यथित हुआ ।
धूँध छँटा सबके मन से जब, सुत सब पर नाराज हुआ ।
माँ तुम से पहचान शगुन की ,,खुशी तुम्हीं से जीवन में ।।
क्यो कुरीति पर वार....

मन गढंत है बात अशुभ शुभ, बंदिश नहीं मुझे सहनी
थोप मनमर्जियाँ फिजूल की, नारी को करते छलनी
करदो कुप्रथा का बहिष्कार, है जिम्मेदारी सबकी ।
माता सी कोई उपकारी , नहीं हुई है इस जग की ।

क्यो कुरीति के बलि बेदी क्यों कर,,चढ़ती नारी हर युग में ।
किस्मत की मारी को ठोकर, मारे हर कोई जग में ।।

उषा झा स्वरचित 
देहरादून उत्तराखंड

मनुजता बेजार

विधा-  प्रश्नोत्तरी दोहे

मानव क्यों राक्षस बना,पीता क्यों वो रक्त ?
विवश मनुजता आज है,मति गायब बेवक्त।

मात-पितु के हिय सिसकें , परिवार रहा टूट
रिश्ते सब  दुश्मन बने , भाई भाई फूट ।।

नीड तिनकों से बनते,उड़ा दिया क्यों गेह?
चलती आँधी स्वार्थ की, नष्ट परस्पर नेह।

मानसिकता लोभ ग्रसित, क्यों मानव लाचार ।
सारे रिश्ते बेच कर , हुआ मनुज  बेजार ।।

पौरुषता है गुम कहाँ, लापता स्वाभिमान 
लज्जा किसी की न रखो , करो रोज अपमान ।।

अभिभावक बेघर हुए ,कहाँ  गया घरबार?
भिजवा वृद्धाश्रम दिया, बेटे धक्के  मार।

संस्कार बेकार गये ,,हिय में क्यों है ताप ?
कुसंस्कारी पूत हुआ,व्यथित आज माँ बाप।

धन दौलत के लोभ में,मनु क्यों करे  नुकसान?
कौड़ी जाए संग कब, ले संग पुण्य का दान।।

रिश्ते माया पर टिके,कब चढ़ते परवान?  
प्रेम हुआ अनमोल है,मूरख तू यह जान।

बने पराये मीत जब,किसे दिखाए दर्द ?
बीवी के पल्लू छुपे , रहते हैं सब मर्द ।।

प्यास बुझाता रक्त से,मानव क्यो शैतान? ।
कटते बकरी भेड़ से,नीयत बेईमान ।।

गिरा जगत को गर्त में,मनु क्यों करता नाश?
कौड़ी भर औकात से, सिर्फ मिले उपहास  ।।


उषा झा

हरि के अद्भुत प्रेम

प्रेम से बंधे प्रभु हैं , अद्भुत प्रभु का रूप ।
मन से जो उन्हें भजते, भक्त लगते अनूप ।।
भक्त लगते अनूप, हैं बस में वो प्रेम के ।
भूल अगर मान लो ,रखे छाँव में नेह के ।।
झूठे चलते बेर , ,वात्सल्य से भरे प्रेम  ।
हृदयंगम में भक्त ,  हरि के अद्भुत  प्रेम ।।

सबरी हो कर के मगन ,हुई प्रेम में लीन
हरि दर्शन को तड़पती , जैसे जल बिन मीन
जैसे जल बिन मीन, प्रेम की भूखी सबरी
सुध बुध दई भुलाय, हर्ष में खुद को बिसरी
 आई जब वह होश , लगे ज्यों हुई बावरी
 हरि को देती बेर, नेह से चखकर सबरी

Thursday, 31 October 2019

कड़वी याद


122 2     122 2           12 22     1222
तुम्हें फिर याद कर आँखें जगी बस पीर सोती है ।
उदासी अब गमों के बीज ही हर वक्त बोती है ।।

कभी तुमने मुझे भी प्यार कर रखते पनाहों में ।
पराये क्यों किया उर जख्म से बेजार रोती है ।।

हृदय तो अब तलक मंजर मिलन के देख कर जीता ।
सुहाने दिन ढ़ले अब भी जतन से क्यों सँजोती है ।।

जला दिल बात कड़ुवी याद करके पिघलती रहती ।
तड़प कर मन मुझे अब आस बंधाती न होती है। ।

हमेशा मन दुखाया जो उसे मैंने दिया ये दिल ।
जगी अब नींद से उनपर सभी विश्वास खोती है ।।

उषा झा (स्वरचित )

खंडित विश्वास

रुला गया क्यों बेवफा,क्या था मेरा दोष?
नीड़ प्यार का जल गया,रिक्त प्रेम का कोष।

दूध सपोले को पिला, किया सदा विश्वास 
डंक मुझे अब मारता,शेष न कोई आस ।

टूटे रिश्ते काँच से,भरी हृदय में आग।
मुखड़ा उसका चाँद सा,लेकिनउसमें दाग 

जीना क्यों मुश्किल हुआ, करता रहा  प्रहार 
मात-पिता उसके लिए,लगते असह्य भार 

आँधी क्यो बनता पिया, उड़ा दिया क्यों नीड़?
दो राहों पर मै खड़ी,देख रही जग भीड़ ।।

रीत रहा घट हृदय का, छलता क्यों है  प्यार।
बीज प्रपंची बो गया, वोछलियाअवतार ।

नही धार तलवार पर,चलना है आसान ।
करे कैद जज्बात को, वो पत्थर इन्सान ।

Saturday, 26 October 2019

प्रेम दीप जले

विधा - सुन्दरी सवैया
आठ सगण और गुरू (112/8 2)

112   112   112     112  112  112 112  112 2
धनतेरस की शुभ साँझ भये धन धान्य सभी घर में बरसा दे
घर द्वार सजा सब बैठ गए कब आंगन पैर कुबेर सहसा दे
मन ज्योति जले ,दिन रैन बढे खुशियाँ कमला धन तू बरसा दे
 मग दीपक एक जले यम दूर रहे वरदे, मुख सिर्फ हँसा दे

प्रिय नेह भरे जब दीप जले मदहोश हुआ मन भींग रहा है
 घर रौशन प्रेम करे सबके घृत डाल अहं ,हृद पींग रहा है
मुख दर्शन को उनके मचले मनमोहन, क्यों उर धींग रहा है 
बस प्रीत प्रकाशित हो दिल में तम दूर रहे , तन भीग रहा है