Wednesday, 8 January 2020

कचरे में बेटी


 14/ 14
क.
बेटी की मौत, कोख में ,
सरेआम हो आज रही  ।
ममता की प्याली खाली,
कचरे में खो, नित्य  रही ।।
हृदय लालसा बेटे की , 
सुता उपेक्षा सहती है ।
शर्मसार है आज सृजन
फूट कर वसुधा रो रही ।।
ख.
अत्याचारी छीन रहे
मातु पिता की नींदे तक।
नहीं सुरक्षित बच्ची भी ,
कोई  सँभाले कहाँ  तक?
 जन्म ,कली लेगी कैसे ,
अभिभावक सब डरे हुए ।
स्कूल से घर तक बच्ची,
साये में डर के कब तक? 
ग.
पढी -लिखी बेटी ब्याही ,
दौलत बिना न जा पाती ।
दहेज उजाड़ी जिंदगी,  
बिटिया जान चली जाती।
हँसी खुशी घर सँभालती , 
पर खुद की परवाह नहीं   ।
चाह नहीं  चंद लम्हे की  ,
बिटिया कभी न सुख पाती।

उषा झा देहरादून

Tuesday, 7 January 2020

जिन्दगी


जिन्दगी कभी नेह की बौछार करती ।
प्रमुदित हृदय में सावनी घटा बरसती ।
छा जाती बहार रोम रोम महक उठता ।
नैनों में नये स्वप्न झिलमिलाने लगते ।।

जिन्दगी कभी इतनी कठोर बन जाती ।
हम ठगे निःशब्द हाथ मलते रह जाते ।
सागर के तट लहरों से थपेड़े खाते
रेत की भाँती तप तप कर बिखर जाती ।।

जाने जिन्दगी कितने ही  रंग दिखाती ।
किस्मत की लकीर जब किसी की चमकती 
इन्द्रधनुष के सप्त रंग से आच्छादित ।
उमंगों से भरी जिन्दगी मुस्कुराती ।।

आशाओं और विश्वासों के डोर थामती,
कल्पनाओं को हकीकत में ढालती ।
टूटे रिश्ते में जान फूकती जिन्दगी ,
बीज नेह की बो कर मन मरु सींचती ।।

उषा झा देहरादून

Monday, 6 January 2020

जीवन की सौगात

विधा-  दोहे मुक्तक 

*मेरे जीवन के लिए*,तुम "श्रेयश" सौगात ।
तुम्हें देख मन हो मुदित , झूमे पुलकित गात ।।
मात शारदे का रहे ,,तुम पर आशीर्वाद ।
मानव मूल्यों की सजे , मानस में बारात ।।
मानवता को तू करे , प्रतिपल आत्मासात ।।

बेटा तुझको तो रखे , ईश्वर ,आयुष्मान ।
मुखड़ा भी तेरा रहे  , सदा  दैदीप्यमान ।।
नहीं अवज्ञा हो कभी , दिल सबके लो जीत ।
आलोकित सब पथ रहें, मिले जगत में  मान  ।।

चाहत दिल में एक ही, नव गढ़ो कीर्तिमान  ।
सेवा कर मात पितु का , लाना मुख मुस्कान ।।
लड़ना वंचित के लिए,  मिले उन्हें अधिकार ।।
नाज करें तुम पर सभी, बढ़े हमारा शान ।।


उषा झा देहरादून

विरही तन मन सर्दी में


विधा :- हंसमाला छंद
मापनी- 112  212  2

वन  में  मोर  नाचे ।
मन के  प्रीत  बाँचे ।।
झुमके   बूँद   गाये ।
जग  को   प्रेम भाये ।

पिय  ने  नींद   छीना ।
रति ने  होश  छीना  ।।
जगती  आँख  जीना ।
अब  तो  दर्द   पीना ।।

चमके   मेघ    काले ।
छलके   नैन   प्याले ।।
कजरी  गीत   गा  ले ।
उर के   खोल  ताले ।।

सपने    नैन    डोले  ।
रसना   नेह   घोले ।।
दिल  के  भेद  खोले ।
पिय भी    प्रेम   तोले ।।

सजना   ताज  साजे ।
दिल   के  साज  बाजे ।।
अब तो  पास   आओ ।
सुख   के  रैन   लाओ ।।

घन    छाये,  रुलाये ।
विरहा  भी   जलाये ।।
तम  की  रैन  जागूँ ।
खुद  से   नित्य भागूँ ।

चुपके ख्वाब आते।
मुझको  क्यों  जगाते ?
बस वो भाव खाते  ।
मुझसे   दूर   जाते ।।

सहना  पीर  भारी ।
सजना  धीर   हारी ।।
लग   जा  अंग  मेरे ।
रहना   संग    तेरे ।।

Friday, 3 January 2020

खुशियाँ आये नववर्ष

विधा-  दोहे मुक्तक 

सूर्य किरण नव वर्ष की ,पूर्ण करे सब आस ।
सुष्मित पुलकित हृदय में,नव भरे अहसास 
जीवन आलोकित सदा,रहे तमस अब दूर ।
नित्यराग,उमंग नवल,जीवन हो न उदास ।

कोहरे की चादर से , लिपटे मोती घास ।
प्रीत मुखरित मुदित हिया, नैन स्वप्न है खास 
भीनी भीनी महक, उर , याद करे गत वर्ष।
ख्वाब पूर्ण नव वर्ष हो, भरे हृदय  उल्लास 

बिछुड़े परिजन हृद बसे याद करे दिल आज
धूँध  वक्त के  खो गए , रोये हैं दिल आज ।।
 कहाँ छुपे वो छोड़ कर,थे जो बहुत अजीज 
बीते निशान वर्ष के, ढूंढ रहा दिल आज ।।

नया वर्ष खुशियाँ लिए, आना मेरे द्वार ।
प्रतिपल ही उल्लास भर,सुखी रहे संसार ।
ईश ! शीश पर हाथ रख,देना प्रभु आशीष ।
हमें भँवर से तार दो, इतना कर उपकार  ।

उषा झा देहरादून

Thursday, 2 January 2020

उर में पुष्प खिले

विधा-  माहिया छंद- 
 12, 10 , 12 मात्राएँ पंक्तियों की 
पहली तिसरी चरण समतुकांत ।
212 वर्जित ।

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तन भी ठिठुर रहा है ।
ऋतु का कहर मचा ।
पिय जी मचल रहा  है ।

शीतल सेज रुलाई ।
प्रियतम भूल गए ।
सर्दी अगन बढ़ाई ।

कटती सजन न रैना ।
किससे दुख बाटूँ ।
निस दिन बरसे नैना ।

विरहा दर्द बढाये ।
पिय अंग लगाना ।
देख शिशिर सताये ।

तकती हूँ अब राहें ।
कितने वो बेदर्दी ।
निकली दिल से आहें ।

छुपना पी के बाहों ।
प्रियतम आ जाओ।
महके  गजरा बालों।

उर में पुष्प खिलाऊँ ।
उर आंगन गमके ।
कर शृगांर रिझाऊँ।

दमके क्यों मुखड़ा ।
मन संग तुम्हारा ।
दिल में जो प्रीत जड़ा ।

उषा झा देहरादून 

झूमे कोकिल मन

विधा हरिहरण घनाक्षरी 
8,8,8,8

मदीर बहे पवन ।
दूर धरा की तपन ।
महके चंदन वन ।
मुदित मानव मन ।

पुष्पित है गुलशन ।
सुरभित है कानन ।
सारिका फुदके वन ।
झूमता कोकिल मन ।

मन भावन सावन ।
पुलकित जन जन ।
पिया से लड़े नयन ।
पिघले नेह से मन ।।

बजे पायल छनन ।
जब  खनके कंगन ।
भरे उमंग सघन ।
बहके प्रीतम मन ।

उषा झा