Wednesday, 22 January 2020

प्रेम निवेदन


विधा :- ईश छंद 
=====================
112  121   22 
घनश्याम नेह घेरे ।
जब मीत साथ मेरे ।।
उर प्रीत है बढ़ाये ।
विरहा नहीं सुहाये ।।

मुरली मुझे सुना जा ।
मन कामना जगा जा ।।
सुन ! नाग के नथैया ।
तुमसे खुशी कन्हैया ।।

मृदु बाँसुरी बजा जा ।
दृग स्वप्न ही सजा जा ।।
ब्रज रास तो दिखा जा ।
रस प्रेम का चखा जा ।।

उर कंठ प्यास जागे ।
मजबूत नेह धागे ।।
सच भावना हमारी ।
यह राधिका तुम्हारी ।।

प्रभु मान राखना है ।
सब हर्ष बाँटना है ।।
तुम ही उपासना हो ।
तुम पूर्ण साधना हो ।।

अब जिन्दगी तुम्हीं से ।
सब चैन भी तुम्हीं से ।।
नयना नहीं बहा तू ।
मनवा वही जहाँ तू ।।
=====================
उषा झा 

Tuesday, 21 January 2020

मुदित हिया पिय साथ


दोहा सृजन
 तीर चले जब नयन से, हर ले सारे चैन ।
 आतुर है मन बावरा , नागिन लगती रैन ।।

 घायल कितने शूरमा , देख मद भरे नैन ।
 प्रीतम पर मोहित जिया,छलक रहे मृदु बैन ।।

 सजन गए परदेश हैं , अब दिन रैन उदास ।
 मोती झरते नैन से , टूटे दिल की आस ।।

 फेर लिए मुख जब पिया , लगे हृदय आघात ।
अंगार भरे नयन में ,  किसे कहें  उर बत  ।।

 नेह भरे नयना मिले , हृदय भरे अनुराग ।
 अंकुर पनपा प्रेम का , कुसुमित दिल के बाग ।।

 थाम डोर दिल के लिए , छुटे नहीं अब हाथ ।
 नैन में उमंग भरे ,मुदित हिया पिय साथ ।।

 चंचल नयना मिल गए, भाया पिय का रूप ।
सुन्दर चितवन,मृदु बोल , दिल को लगे अनूप।।

 लक्ष्मी विराजे घर में , सजे अधर मुस्कान 
हँसी खुशी घर दीन भी, मिले प्रेम की खान ।।

गए भुला दुख आपना, देखी जो मुस्कान ।
कलुषित मन निर्मल हुआ,दूर भगा अभिमान।।

हाथ मुस्कुराकर बढ़े , जो देते सम्मान ।
घुलती मिश्री हृदय में,बढ़ता सबका मान  ।।

 बिगड़े काम सँवारता, नफरत होती  दूर ।
नहीं पूछ हो रूप की,गुण की चाह जरूर ।।

मिलते दुश्मन भी गले ,मुख पर हँसी बिखेर
तार दिल के जोड़ दिया , हँस कर आँखें फेर ।।

मुग्ध नयना  प्यार भरे , मुख पर है मुस्कान ।
देख पिया प्रफुल्लित मन, हृदय करें रस पान ।।

Monday, 20 January 2020

बजी प्रीत की धुन

ज1222   1222  1222 1222
 मधुर धुन प्रीत की दिल में बजी पिय हो मिलन कैसे ।
 धड़कनें तो सुनो आकर , घटे दिल की अगन कैसे ।।
 कि तुम बिन मर नहीं जाऊँ, दवा तो कर पिया मेरी ।
 गमों का बोझ बढ़ती अब ,बुझे उर की जलन कैसे ।।

पिया क्यों खनकती कंगन, न भाये आज पायल है ।
झरे मोती, तुमारी याद में,मन नित्य  घायल है ।।
अधर लाली, सजी शृगांर करके, क्यों धुली कजरा ।
विरह फिर से मुझे हर दिन रुलाती अब कौन साहिल है ।

नही मिलती मुझे चैना कहूँ कैसे तुम्हें सजना  ।
हृदय में पीर कितनी हो उसे अब तो हमें सहना ।।
चुभी काँटे हृदय में जिन्दगी भर अब तड़पना है ।
दिये हो जब विरह प्रीतम शिकायत है बहे नयना ।।

नहीं धीरज धरे दिल अब कहाँ हो पिय चले आओ ।
तमस घिरने लगी देखो सनम रवि भी  ढ़ले आओ ।।
दुखी मन हर्ष के तुम फूल आकर अब खिला जाना ।
सुनो साजन बहे नैना  हृदय  रो रो  कहे आओ  ।।


उषा झा देहरादून

Sunday, 19 January 2020

सूखीं नदिया

विषय-नदी
विधा- गीत (16/14 )

नदी शुष्क, नीर -विहिन जबसे , तट भी घिरे  हुए हैं ।
हवा चली ऐसी विकास की, घन अब रूठ गए हैं ।।

है जीवन दो बूँद नीर ही, मानव  व्यर्थ बहाए ।
क्या पूर्वजों के श्रम बेकार , मनु क्यों वृक्ष कटाए।।
अब बरसे न बदरा धरा पर, जीवन मुँह लटकाए ।
टुकुर- टुकुर पशु पक्षी देखे, कैसे प्यास बुझाए?  
 उजाड़ चमन प्रकृति रोती है, मिट अस्तित्व गए हैं ।
 शुष्क नदी नीर विहिन जबसे , तट भी घिरे हुए हैं  ।।

जल बिन नदी धरा है बंजर , सबको भूख रुलाये ।
मनुज बुलायी खुद ही आफत , दूषित वायु सताये।।
जल-संरक्षण बेकार समझा, निज करनी भुगत रहे।
मूल्य वक्त का जिसने समझा, वो ही मुस्कुरा रहे ।।
पट्टी खोलें आँखों की क्यों, वसुधा नष्ट किए हैं ।
नदी शुष्क, जल विहिन तट पर, तट भी घिरे हुए हैं ।

धरती माता उर विह्वल है, ऋतु परिवर्तन से रोती ।
बनी धरा मरुभूमि छुपे घन,अब उपज नहीं होती ।
कंक्रीट- अट्टालिकाओ में, हरियाली कहाँ रही  ?
हुआ नष्ट सौन्दर्य  जगत का , नदियों में नीर नहीं  ।।
खग पशु भी हो रहे हैरान, गिरि वन विजन हुए हैं ।
हवा चली ऐसी विकास की ....

प्रो उषा झा रेणु

Saturday, 18 January 2020

कान्हा का रूप अनूप

विद्या:- वर्ष छन्द- वार्णिक
वृहती जाति
मगण, तगण, जगण,
222  221  121

कान्हा पे राधा निसार ।
दोनों ने खोले  उर द्वार ।।
नैना  खोये हैं  अभिसार  ।
भोली राधा दी अधिकार ।।

 कैसी थी वो मोहित नार ।
दौड़ी बंसी को सुन धार ।।
भूली  राहें,  हे   करतार  ।
थामे कान्हा के पतवार ।।

भाये  कान्हा को अनुराग ।
खेले गोपी माधव फाग ।।
मीठा मीठा, प्रेम अपार ।
 देखो छेड़े  हैं उर तार ।।

कान्हा के देखे  ब्रज  रास ।
कैसी माया ! नैनन प्यास ।।
गोपी राधा थी कुछ खास ।
झूमे  गाये पी  बहुपास   ।।

नैनों की आशा अब श्याम  ।
गोपी की चारों  बस धाम  ।।
बंधे जन्मों, है दिल याद ।
सच्चे रिश्ते ही  बुनियाद  ।।

लीला धारी के नव रूप ।
कान्हा राधा नेह अनूप  ।।
काली रैना वे मदहोश  ।
कान्हा नाचे हैं मन जोश  ।।
===================
उषा झा देहरादून 










पहला एहसास

मृदु स्पर्श नव उमंग मन में ।
अनगिनत यादें जेहन में ।।
शनैः शनैः वक्त फिसल गए ।
बंधन जन्म के बिछुड़  गए ।।

खिले पुष्प चमन में खुशबू ,
द्वय  दिल मचले फिर रूबरू ।।
प्रेम पावन बस महक रहे ।।
उनकी निशानी जेवर हैं ।।
पहला एहसास हृदय में ।
अनगिनत यादें जेहन में ।।

अल्हड़ मस्त स्वप्न कुँवारे ।
नयना लड़े संग तुम्हारे  ।
सूखे गुलाब किताबों में ।
छुपे हृदय हैं दर्द सारे ।
कैद अब जज्बातें दिल में ।
अनगिनत यादें जेहन में ।।
 
भूल सकी न मधुरिम यादें ।
निभा सके कहाँ तुम वादे ।।
 नहीं संग  प्रीतम  हमारे   ।
 शब्द में पिय अक्स तुम्हारे ।।
अधूरी चाह कसक दिल में ।
  अनगिनत यादें जेहन में ।

उषा झा

Thursday, 9 January 2020

प्रीत की बात

विथा :- विमोहा छंद
212   212
प्रीत की रात है ।
राज की बात है ।।
तप्त ये गात है ।
 नेह सौगात है ।।

प्रेम तो खास है ।
नैन में प्यास है   ।।
कंत  भी पास है ।
ईश की आस है ।।

जीत संसार लो  ।
लक्ष्य को साध लो ।।
प्रीत को घोल लो ।
धीर को तोल लो ।।

दीप तो नेह के  ।
ज्योत है प्रेम के ।।
 गीत संगीत है   ।
 श्याम ही मीत है ।।

प्रीति को वार दो ।
रीति संवार दो  ।
मान सम्मान हो ।
फर्ज का भान हो ।।

संग तेरा रहे ।
नेह धारा बहे ।।
 सात फेरे कहे ।
मान रिश्ते रहे ।।

  प्रेम के मोल से ।
  मीत *दो बोल* से ।।
  मोद घोले हिया ।
   प्रेम  भाये जिया ।।

  प्रो उषा झा रेणु 
स्वरचित देहरादून