Sunday, 12 July 2020

फीकी चाँदनी

काफिया - ई
रदीफ - होने का मतलब क्या है
2122   1122   1122     22
चाँद से आज दुखी होने का मतलब क्या है ।
प्यार में यार कमी होने का मतलब क्या है ।।

दामिनी  की  सदा  शृंगार   बढा  देती  जो ।
फीकी फिर चाँदनी होने का मतलब क्या है ।।
   
आसमाँ में हो मकाँ दिल में यहीं है चाहत ।
बिन तेरे कोई खुशी होने का मतलब क्या है ।।

दरबदर इश्क,  गिरे  नैनों से   मोती  देखो।
आरजू रोज छली होने का मतलब क्या है।

दिल हमेशा किसी के बस में तो नहीं रहता ।
लब पे मेरे ये हँसी होने का मतलब क्या है ।

सुन प्रिये मेरे भी बस में है नहीं मन मेरा।
सच है बिन तेरे सुखी होने का मतलब क्या है।।

आरजू है ये  उषा  की  न  बढ़े   दूरी  अब  ।
रश्मियाँ दिव्य घुली होने का मतलब क्या है।।

प्रोo उषा झा 

Saturday, 4 July 2020

प्रहरी बने तपस्वी

 विधा- वीर छंद ( आल्हा छंद) आधारित गीत

नित जवान सरहद पर मरते , उबल रहा भारत का तंत ।
कुटिल चाल दुश्मन की अब तो,सुनो भारती करना अंत ।

आँधी तूफानों से लड़ते , कहाँ मानते  सैनिक हार ।
भीषण सर्दी में भी प्रहरी , सदा करें दुष्टों पर वार।।
विपदा माँ पर जब भी आई, किए वीर न्योछावर जान।
फर्ज  निभाते सपूत सच्चे, बन लीलाधर रखते मान ।।
मातु- पिता के लाल कभी वह,किसी सुहागन के हैं कंत।।
कुटिल चाल दुश्मन की अब तो,सुनो भारती करना अंत ।

कितने ही बलिदान दिए हैं,हुए तभी हम सब आजाद।
नियत बुरी है गद्दारों की,देखो करे  देश बर्बाद  ।।
घर गोली बारूद छुपाते,कलुष हृदय भरते मति भ्रष्ट।
सरहद पर  शिकार नित सैनिक,खोते हीरा हिय बहु कष्ट।
त्याग गेह वह बनते तपसी , सैनिक होते सच्चे संत ।।
कुटिल चाल दुश्मन की अब तो, सुनो भारती करना अंत। 
प्रतिपल प्रचंड़ धूप-शीत में ,अडिग वीर के माथ न रेख ।
चाह देश हित ही सर्वोपरि, चले एकला राही  देख ।।
आन बचाने भारत माँ की,  ढूँढ लेहिं  दुश्मन पाताल ।
आँख उठाए जब जब बैरी,चीर देहिं बन कर ये काल ।
 हर संकट को दूर भगाते , बन संकट मोचक हनुमन्त ।।
कुटिल चाल दुश्मन की अब तो,सुनो भारती करना अंत।।
नित जवान सरहद पर मरते , उबल रहा भारत का तंत ।।

उषा झा देहरादून

Friday, 3 July 2020

चुटकी भर नमक अनमोल

रदीफ - नमक
काफिया - आ
2122-  2122-   2122-    212

प्यार मीठा ही रहे बस चाहिए थोड़ा नमक ।
दीद की दृग प्यास दिल मे यूँ बढ़ा देता नमक।

यार से यारी सफर भी खूबसूरत कट गया।
है मुहब्बत पाक दिल को बाँध के रखता नमक ।।
  
जिन्दगी में बिन नमक होता  गुजारा ही नहीं ।
नैन जल में भी  मिलाया ईश ने  खारा नमक  ।।

दीन को रोटी   मिले   खाता  बड़ा ही प्रेम से  ।
थाल में सब्जी नहीं बस डाल वो लेता  नमक।।
   
सार जीवन  तत्व हो नमकीन दिल सबका उषा  ।      
बिछ जगत जाता उन्हीं पर,हर जिया भाता नमक।।

 स्वाद भोजन में बढाता   मात्र  चुटकी भर ही ।
ध्यान रखना  भोज्य में डालें नहीं ज्यादा नमक।

चीज है यह काम की कीमत बड़ा अनमोल है।
मोद दिल में हो जुबां पर हो उषा घोला  नमक ।।





आस की लौ

काफिया- अम
रदीफ - न जाने किस लिए

2122    2 122   2122    212
रूठ जाता वो, मुहब्बत का गम न जाने किस लिए ।
प्यार नकली देख निकले हैं दम जाने किस लिए।

खार जीवन में भरा हो फिर मिले कैसे खुशी।
आस की लौ अब हुई मध्यम न जाने किस लिए ।

स्वार्थ में जो अंगुली टेढी करे वह ही सफल ।
सत्य की है चाह सबको कम न जाने किस लिए ।

ताक पर रखके वचन , खेती हुई जो झूठ की ।
हाल अपना देख आँखे नम न जाने किस लिए ।।

हौसले की ढाल लेकर तुम सदा बढते चलो ।
वो लगाते पीर के मरहम न जाने किस लिए ।।

ज़ीस्त तो रोटी नमक मे यूँ उलझते ही गयी।
आज ये ईमान भी बेदम न जाने किस लिए ।

चाँद तारे संग दुख सुख बाँटती निश्चछल उषा ।
नैन आशा नित ढली, हमदम! न जाने किस लिए ।

उषा झा देहरादून 

 सादर समीझार्थ 🌹🌹😊

Thursday, 2 July 2020

घुँघरूँ की पुकार

विधा - कबीर छंद(सरसी छंद)
16/ 11अंत 21

मन्दिर मन्दिर महफ़िल सजती,घुंघुरु की झंकार।
मधुर मधुर धुन पर आ नचती, पीर परायी सार।

घुँघरू गीतों में रची बसी , करे भक्त रस पान ।।
अमिय धार नित बहे हृदय में, रास रंग की शान ।
अम्बे के दरबार में सजी, शुचित भजन शृंगार ।
मधुर मधुर धुन पर उर नचते, पीर परायी सार ।।

कला पुजारी पग बाँधे, प्रमुदित उर मृदु तान ।।
अप्सरा पग बाँध छीने , देवों के मन प्राण ।
मोहित प्रियतम के दिल धड़के,प्रीत जगत के सार।।
मंदिर मंदिर महफिल सजती, घुँघरू की झंकार।।

देवालय से विद्यालय, बढा गई सम्मान ।
सियासी गलियों की रही , घुँघरू सदैव जान ।।
चाह घृणित लोगों की बस वह , पहुँच गई बाजार।
मंदिर मंदिर महफिल  ....

नृत्यांगना के नृत्य पर , सजी सुरीली नूर ।
पग बँधी वाह पर नहीं थकी ,घुँघरू जग मशहूर ।।
चाह ईश को अर्पण बेड़ी से , मुक्ति ही परम सार ।।
मंदिर महफिल .....

कोठे की महफिल में सज , बिक गई बारंबार ।
हुस्न के वाह से आहत, बहते नैन से धार ।।
कच्ची कली के पग बँधी , हुए द्रवित उर खार ।।
मधुर मधुर धुन पर आ नचती, पीर पराई सार।

मंदिर मंदिर महफिल सजती, घुँघरू की झंकार।

उषा झा देहरादून
सादर समीक्षार्थ 🌹🌹

Monday, 29 June 2020

नेहिल सरिता उर बहे

आयोजन - स्वतंत्र
दिन- शनिवार 
दिनांक- 19.6.2020
विधा - राधे श्यामी 
16/ 16 आदि अंत द्विकल 

सीमा पर नित्य कुटिलता अब,बढ रही धृष्टता अरि की है।
करते दुश्मन क्यों मनमानी,बलि चढती नित निरीह की है।
सुत वीर भारती के अनेक  , वो आन नहीं मिटने देंगे ।
हो देश सुरक्षित वीर जवाँ,दुश्मन के शीश काट लेंगे ।

शुचि सदा रहे जब ये वसुधा , तब प्रेम सुधा निर्झर बहती।
सत प्रीति देख निश्छल माता,खुशहाली भी घर-घर रहती।
कुछ संतानें अब भटक रहीं ,माँ वार पीठ पर सहती है ।।
सोने की चिड़िया जब लुटती , निशि दिन क्रन्दन वह करती है।

अब नहीं चलेगी बल जोरी, अरि का मर्दन बस करना है।
भारत माँ का सिर ऊँचा हो, हुंकार हृदय में भरना है।
मन के हों खोट दूर सारे, बस प्रेम सुधा जग बह जाए ।
कर लें सुविचार तनिक मानव,नेहिल सरिता उर बह जाए।
 

उषा झा देहरादून
उत्तराखंड

Friday, 26 June 2020

उपेक्षित कारीगर

सारिका का घर बन रहा था , नित्य मिस्री और मजदूरों के लिए 
चाय बिस्किट सुबह शाम बड़े केटली में बना लाती ।सबको बड़े कप में चाय पिलाती , खुद भी अपनी कप भर लाती ।चाय
पीते पीते मीठी - मीठी बातें करती , मजदूरों के दुख सुख भी पूछ लिया करती ।
मिस्री और मजदूर खुश होते और मन से घर के डिजाइन 
पीलर , आर्च खुद एक से बढ़कर एक डिजाइन बनाते । सारिका मन ही मन फूली न समाती ।
उसे पता था ये मजदूर प्रेम और स्नेह के भूखे होते ।इनसे मीठी बातें कर वो घर मनपसंद तरीके से बनवा रही थी ।
घर का काम सम्पन्न हो चुका था ।मिस्री मजदूर का काम समाप्त हो चुका था ।
देखते देखते खूबसूरत घर तैयार हो गया ।मिस्रियों ने बहुत मनोयोग से गृह निर्माण किया था ।सारिका की नाक ऊँची 
होने लगी ।सुन्दर सुरूचिपूर्ण घर बनने के बाद धीरे धीरे उसको अहंकार होने लगा ।
एक दिन मिस्री आया अपना हिसाब करने ।धीरे धीरे वो घर के दहलीज तक आ गया , और मुग्ध होकर घर निहार रहा था ।
इतने में सारिका आ गई , एकाएक चिल्ला पड़ी । कहने लगी, अरे दहलीज तक कैसे तुम आ गयि । कुछ कहना था , तो आवाज लगाता ।
मिस्री रामु बेहद गमगीन होकर बोला , मालकिन हम मिस्री के मेहनत और कारीगरी ही इक दिन ईंट गारे से महल बन जाते ।जिस हाथों की कलाकृति की भूरी भूरी प्रशंसा होती ,उन मिस्री मजदूर को उसे निहारने तक की इजाजत भी नहीं ।
माफ कर दीजिए मालिक मैं अपना औकात भूल गया था...।