Sunday, 9 May 2021

सीता हरण

212/ 6
धुन जिन्दगी की लड़ी

भाग्य क्यों बाम मेरे हुए, नित्य ही जानकी सोचती।
दुष्ट लंकेश क्यों हर लिए, जिन्दगी अब नहीं मोहती ।

बिन पिया के नहीं जी लगे,अब विरह रैन कैसे कटे।
दिन महीने हुए खत्म पिय, राम के नाम नित उर रटे ।।
स्वप्न में आह मनवा भरे, रागिनी भी तृखा घोलती ।
भाग्य क्यों बाम मेरे हुए, नित्य ही जानकी सोचती ।।

खो गए वो मिलन के दिवस कब कमल नैन दर्शनकरे।
चाँद से बात कितनी करें चाँदनी भी नहीं दुख हरे ।।
बस तड़पती विरहणी नहीं मुख सिया शूल से खोलती ।
भाग्य क्यों बाम मेरे हुए नित्य ही जानकी सोचती ।।

पुष्प के वाटिका में बहे नैन मन धीर सीता नहीं ।
पति विरह दंड भारी मिले आज संदेश मीता सही।।
कौन विधि राम लंका पधारे विरह दंश बस भोगती।
भाग्य क्यों बाम मेरे हुए नित्य ही जानकी सोचती ।।

घुल रही पीर से बावरी, ओह क्या काल के खेल है ?
कौन निर्जन विटप दे सहारा नहीं, आस उर ढेल है ?
रात काली डराती नहीं नींद दृग, दुख किसे बोलती।
भाग्य क्यों बाम मेरे हुए नित्य ही जानकी सोचती ।।

शूल उर में सदा राह प्रिय राम के नित निहारे सिया ।
धीर भी हो गये खत्म बस सोचती क्यों भुलाये पिया।
वाटिका रो रही मातु, हनुमान दी अंगुठी राम की ।
राम के दूत हनुमंत आए हरे पीर माँ जानकी ।।

सोच प्रभु दूत सीता बँधी आस, पिय याद में डोलती ।
भाग्य क्यो बाम मेरे हुए नित्य ही जानकी सोचती ।।

*उषा की कलम से*
देहरादून

Friday, 7 May 2021

शूल हरो भोले भंडारी

विधा - *वीर/आल्हा* *छंद* (गीत)

आओ भोले भंडारी अब, शूल हरो जल्दी संसार।
घर घर व्याकुल आभास हृदय,आलय के प्रियजन बीमार।।

बूँढी अँखियाँ बाँट जोहती, अस्पताल जबसे गया पूत ।
अर्धांगिनी अमर सुहाग को , बाँध रही पति रक्षा सूत।
दुख की छाई घनघोर घटा ,स्तब्ध हृदय नित हाहाकार।
घर घर व्याकुल आभास हृदय,आलय के प्रियजन बीमार।।

छीन गई है साँसे अनगिन,कौन बँधाए किसको धीर ?
जब छुट रहे साथ अपनों के ,घायल वक्ष पर चुभे तीर ।।
मूक मनुज इस त्राहिमाम से,लावारिस लाशें अंबार।
घर घर व्याकुल आभास हृदय,आलय के प्रियजन बीमार।।

आशा की अब बाँध पोटली,बाँटो हर घर में मुस्कान।
देकर नवल दिलाशा साथी,मानवता का रख दो शान ।।
चाहे प्रकृति चोट दे कितनी,नहीं मानना कोई हार।
घर घर व्याकुल आभास हृदय,आलय के प्रियजन बीमार।

कहर महामारी ढाता है , समय बड़ा ही प्रतिकूल ।
हिम्मत को हथियार बनाना, फिर आ रहा वक्त अनुकूल ।।
जीवन जंग जीत साहस से , बुजदिल पार करे मझधार ।
घर -घर व्याकुल आभास हृदय,आलय के प्रियजन बीमार।

आओ भोले भंडारी अब, शूल हरो जल्दी संसार ।।

*प्रो उषा झा रेणु*
सर्वाथिकार सुरक्षित
देहरादून

मनभावन उपहार

विधा - हंसगति छंद ( मात्रिक)
20 मात्रा
 11/9 पर यति

➖यति से पहले 21 यति के बाद
त्रिकल ।

मन भावन उपहार ,शुचि मिलन सजना ।
सावन आये द्वार, विलग मत रखना ।।
       
जीवन तुमको सौंप ,मुदित उर मेरा  ।
आनंदित है गेह , लगे पियु फेरा ।।
पावन अपना प्रीत, युगो उर डेरा ।
 साजन सच्चा मीत , स्वप्न दृग घेरा ।
बरसे छम छम मेह, तुम्हीं पर मरना
सावन आये द्वार , विलग मत रखना ।

मुश्किल में भी साथ ,सदा तुम देना ।
नैया हो मझधार , थाम कर लेना ।।
भोली हूँ मैं भूल , माफ तुम करना ।
 प्रियवर मेरे आप , हृदय में रहना ।।
  सूना लगता गेह , कहाँ हो ललना ।
मन भावन उपहार,शुचि मिलन सजना ।।

आज तलक उर याद , प्रणय की रैना ।
कम्पित है मम गात , जाग ते नैना ।
शुचित वरदान प्रेम , पुनीत हमारा ।।
रख ली हूँ संभाल , सौगात प्यारा ।।
पुलकित जीवन शाम , हर्ष नित भरना ।।
मन भावन उपहार , शुचि मिलन सजना ।।

लाली मेरी माँग , सदा सजी रहे ।
पायल बिछुआ पाँव , मधुर प्रीत गहे ।।
अंजन अलकित नैन , नेह रस छलके ।
कुंतल कजरा डाल , हृदय कुँज महके ।।
प्रीतम भर लो बाँह , मोद मृदु बहना ।।
मन भावन उपहार , शुचि मिलन सजना ।



प्रो उषा झा रेणु
देहरादून

यादें गाँव की


 खोयी *मैं* भूली बिसरी यादों में ।
  दादी दिख जाती पूजा करती   ,
 तुलसी वृक्ष शुचि उस आंगन में ।।
दीये की कतारें झिल मिल करती,
नित दिन तुलसी चौरा संध्या में ।

  दलान पर मंदिर के प्रांगन खड़ा,
  बूढ़ा बरगद ममत्व लुटाये बरसों से।
  चलती गाँव की चौपाल वहीं ।
 आपस में बच्चे बूढे गपियाते ।
  चुपके से लेट जाते पशु वहीं  ।।
 भाँति भाँति के पंछी आश्रय पाते,
शीतल शुद्ध छाँव बरगद लुटाते ।
शुचित वायु सबके प्राण बचाते ।।
खेलते लुका छुपी हम बच्चे वहीं।।

बाड़ में  नीम के पौधे लगे थे ।
दादा जी कहते देख डाॅ पौधे  ।।
होते अंग अंग इनके गुणकारी ।
 करो नमन सब कोई अब इनको ,
 छाँव में इनके तनिक सुस्ता लो ।।
 
कट गए वृक्ष,अब चौपाल कहाँ !
कमरों में हुए बंद सब ए सी में ।।
 भटक रहे पंछी लगाए नीड कहाँ
 तिनका ले घुमे कंक्रीट के भीड में।
  तृषित मन लौट रहे अंजान देश में

  प्रो उषा झा रेणु
   देहरादून उत्तराखंड़

Saturday, 10 April 2021

फागुन गीत

विषय - फागुन

अली कली मदहोश हुए हैं,प्रीत पगी मन फगुनाई।
मन विभोर खोये सपनों में ,चूनर पूर्वा फहराई ।

खिलने लगे पलास सेमल , धरा गगन है सिंदूरी ।
नैन बिछे प्रिय के आगत में , सही नहीं जाए दूरी ।।
विरह रागिनी पुहू छेड़ती, विरही अँखिया तरसाई ।
अली कली मदहोश हुए हैं , चूनर पूर्वा फहराई ।

मन मलंग अनकही प्यास है, मुखर प्रणय उर मतवाले ।
भावों कि बिसात बिछी जब, खुले हृदय के फिर ताले ।।
रंगों से अच्छादित नयना ,महि पर यौवन गदराई ।।
अली कली मदहोश हुए हैं ,प्रीत पगी मन फगुनाई ।

होली की रंगीनी देकर ,धमक ऋतु राज पुलकाते ।
वृंत अनावृत तीर चले उर, दिवाने को नित लुभाते ।।
पशु पंछी मन पुलक रहे हैं , लदी बौर शुचि अमराई ।
मन विभोर खोये सपनो में , चूनर पूर्वा फहराई ।।

उड़ने लगी गुलाल मुग्ध जगत , राधे कृष्ण अनुकूल है
मन मधु राग थाप ठोलक की , उड़े प्रिया के दुकूल है।
मधुबन में भौवरें का फेरा , कलियाँ ने ली अँगड़ाई ।
मन विभोर खोये सपनों में , चूनर पूर्वा फहराई ।।

प्रो उषा झा 'रेणु'

Thursday, 8 April 2021

मुग्ध मन दुलारी में

सार ललित छंद

कोमल कोमल फूल लगे हैं, देखो फुलवारी में ।
खिली कली ममता के आँगन,मुग्ध मन दुलारी में ।।

रंग बिरंगे बाग रहे बस , देख भाल करना है ।
पंख कली के बड़े सुकोमल, उपवन का गहना है ।।
कुत्सित मधुकर दूर रहे तब , महके हर क्यारी में ।
कोमल कोमल फूल लगे हैं, देखो फुलवारी में ।

बुरी निगाहें कलियों पर हो, तो मिले दंड भारी ।
मसल नहीं डाले दुष्ट कभी, करना पहरेदारी ।।
मोहित है गुलशन बचपन के, निशि दिन किलकारी में ।
ममता के आँगन खिली कली , मुग्ध मन दुलारी में ।।

तितली अलि का फेरा गुल में ,मन अटखेलियों को।।
मृण्मयी नयन की प्यास बुझी , चूम के पंखुड़ियों को । पुहुप जग को सौरभ बाँटने, की अब तैयारी में ।।
कोमल कोमल फूल खिले हैं , देखो फुलवारी में ।

जग बगिया की शान कली है, नेह उन्हें बस बाँटो ।
रूप दिवाने पथ भटके जो,उसके पर अब काटो ।।
सुमन सुवासित वसुधा तब हो, मधु पराग प्यारी में ।।
खिली कली ममता के आँगन, मुग्ध मन दुलारी में।।

मोदित कलियाँ चटके निशि दिन, गुल सिंचित करना है ।
बजे नुपुर छन छन छन पग में ,हृदय भरे रसना है ।।
उड़े तितलियों के दुकूल मृदु , लगती शुचि न्यारी है ।

कोमल कोमल फूल खिले हैं , देखो फुलवारी में ।
खिली कली ममता के आंगन , मुग्ध मन दुलारी में ।।
*उषा की कलम से
सर्वाधिकार सुरक्षित 

सम्मोहन प्रियतम का

नूतन चाहत हृदय सँजोये ,प्रणय रंग संसार ।
स्वप्न सजा कर इन नैनों को, करे सजन उपकार ।।
प्रेम पान को तृषित अधर है, बजते उर के तार ।
तट को तोड नदी करती है , सागर से मनुहार ।।

प्रमुदित तन मन प्रणय मिलन को, हो जीवन साकार ।
एक डोर से बँधे हुए दिल, सत्य प्रेम आधार ।।
बीज प्रेम के लगी पनपने ,सिंचित प्रणयित नीर ।
महि पर पुष्पित नेह वाटिका, बिखरे कण कण हीर।

कुंचित अलको में पिय खोये, सम्मोहन आगार ।
कलित रूपहली ओढ चूनर,पनघट बैठी नार ।।
सजल नयन के अवगुंठन में, छाये हृदय बहार ।।
ललित उरोजों से मन रसना ,चाहे मृदु अभिसार ।

रस चखने को मधुप कली से,मांगे शुचि अधिकार ।
मधुबन गूँजे मधुप दिवाना, मुखर राग दरबार ।।
हृदय विलोचन बस झूम रहा, बजे मृदुल झंकार ।
प्यासी अखियाँ ढूँढ रही है, प्रेम मिलन तैयार ।।

पिया चकित से देखे सजनी, विमल रूप शृंगार ।
चंचल हिरनी भरी कुँलाचे , वन में रास विहार ।।
नाचे गाये मन मोर जभी , पगे हृदय में प्यार।
फैली आभा प्रेम कहानी, सात समुन्दर पार ।

*प्रो उषा झा रेणु*
देहरादून