वल्लभ भाई पटेल सचमुच , जन जन के उर बसते हैं
साहस के पुतले जन्म लिए, गर्वित भारत सुत पे है।
धन्य गुजरात अंचल नाडियाड, लौह पुरुष अवतरित हुए ।
मातु लाडबा पितु झवेर के , महामानव संतति हुए।
वर्ष अठारह सौ पछत्तर व,अक्टूबर इकत्तीस गाये।
दिवस गौरवान्वित आज तलक, देखो खुद पर इतराए।।
आज तलक माला उनके ही , नाम के सभी जपते हैं ।
वल्लभ भाई पटेल.....
जन्म हुआ भारत के भू पर , कर्मठ सुत अति उत्साही ।
दृढनिश्चयी सरदार पटेल , अदम्य केसरी साहसी ।।
देश भक्त वल्लभ भाई के , नीति अनोखी चर्चित है ।
बिखरी रियासतें जोड दिए ,हर भारतीय हर्षित है ।।
नीति नव राष्ट्र खडा इसलिए, नतमस्तक रहते हैं ।।
वल्लभ भाई पटेल.....।
सत्याग्रह आंदोलन में वो, गाँधी संग पग बढाए ।
स्वतंत्रता के दीप जलाए , वो लौह पुरूष कहलाए।।
वुद्धि विलक्षण के कारण ही, गृह मंत्री बने देश के।
चाल कुटनीति जब चली चित्त , हुए पेशवा भारत के।।
दृढ संकंल्प फौलादी जिगर , को शूर वीर कहते हैं।
वल्लभ भाई पटेल ...
कुरीति अन्यायों पर सदैव, कुठाराघात पटेल की ।
लड़े दीन दुखियों के वास्ते ,उर में फिकर सदा सबकी।।
गौरव गान कभी पटेल की , कम नहीं हिन्द में होगी ।
ऐसे वीर सेनानी पाकर , सबकी माता खुश होगी ।।
ऐसे महापुरुष युग युग तक, अमर कर्म से रहते हैं ।
वल्लभ भाई पटेल ....
लिए क्रांति मशाल पटेल तब , दिखाए मग बन प्रणेता।
शौर्य कीर्ति फैलाए देश के , ऐसे धीरवान नेता ।।
राष्ट्र हीत सर्वोपरी यही , आदर्श मार्ग दिखलाए ।
सदचरित्र सत्कर्मो से यश, पताखा जग में लहराए।।
उस शूर वीर को भारतीय ,नमन हृदय से करते हैं ।
वल्लभ भाई पटेल सचमुच, जन जन के उर बसते हैं।
*उषा की कलम से*
देहरादून उत्तराखंड
Tuesday, 22 June 2021
बीता यौवन
इस यौवन की यही कहानी
मन में आग नयन में पानी ।।
प्रणय भाव में नयन निमज्जित
लगता सब कुछ हुआ विसर्जित
जीवन में ज्यूँ मौज रवानी
इस यौवन की यही कहानी
मन में आग नयन में ...।।
भीगे मन में प्रेम भरा है ।
मानस उपवन हरा भरा है ।
प्रिय की है यह चूनर धानी ।
मन में आग नयन में पानी ।।
जो है दूर याद आया है ।
इन्द्र धनुष मन में छाया है ।
साँस साँस में प्रिय की वाणी ।
इस यौवन की यही कहानी ।।
शलभ जले जब दीपक जलता ।
प्रेम अग्नि से जीवन मिलता ।
प्रणय याण में घूमूँ क्षण क्षण ।
अर्पित प्रिय को मेरा कण कण ।
मैं भिक्षुक सी प्रिय है दानी ।
इस यौवन की यही कहानी ।।
*प्रो उषा झा रेणु*
देहरादून
Saturday, 12 June 2021
आस सजे श्रमजीवी के
विधा- ताटंक छंद
16 / 14 अंत तीन गुरु
आशाओं का संदेश लिए, नव प्रभात जब आएगा ।।
भर जाएगी झोली उनकी, सौगात शुभ्र लाएगा ।।
उषा काल धरणीधर देखो,मुदित खड़े वह रेतों में।
साँझ सवेरे धूल सने तन, श्वेद बहाते खेतों में ।।
करे परिश्रम सच हो सपने, नित गगन निहारे वो ।
दो बूँद बरस जा री मेघा ,नित भविष्य सँवारे वो ।।
खेतो में फसले लद जाए ,हृदय कमल खिल जाएगा ।
आशाओं का संदेश लिए , नव प्रभात जब आएगा ।।
कृषक दुखी है, व्यापारी, स्वार्थी भाव गिराता है ।
झूठे सपने भरे नयन में,क्यों मन को भरमाता है।।
सेठ, सरकार जब छल करता,श्रमजीवी बस रोता है ।
गुदड़ी सीकर वस्त्र पहनता,बीज खुशी का बोता है ।।
मोल परिश्रम का मिल जाए, गीत खुशी के गाएगा ।
आशाओं का संदेश लिए , नव प्रभात जब आएगा ।।
पूँजी नहीं यकीं हाथों पर , फिर भी खेत लहलहाते ।
अपना पीठ जलाते हलधर , मरु में सोना उपजाते ।।
फल फूल लदे हैं पेड़ो पर ,पशु पंछी भी मुस्काते ।।
मायूस मन दृग कोर भींगे, जग प्रतिपालक नीर बहाते ।।
लाभ योजनाओं के पहुँचे , नेहिल दीप जलाएगा ।।
भर जाएगी झोली उनकी , सौगात शुभ्र लाएगा ।।
*प्रो उषा झा रेणु*
देहरादून
जग प्रतिपालक नीर बहाते
16 / 14 अंत तीन गुरु
आशाओं का संदेश लिए, नव प्रभात जब आएगा ।।
भर जाएगी झोली उनकी, सौगात शुभ्र लाएगा ।।
उषा काल धरणीधर देखो,मुदित खड़े वह रेतों में।
साँझ सवेरे धूल सने तन, श्वेद बहाते खेतों में ।।
करे परिश्रम सच हो सपने, नित गगन निहारे वो ।
दो बूँद बरस जा री मेघा ,नित भविष्य सँवारे वो ।।
खेतो में फसले लद जाए ,हृदय कमल खिल जाएगा ।
आशाओं का संदेश लिए , नव प्रभात जब आएगा ।।
कृषक दुखी है, व्यापारी, स्वार्थी भाव गिराता है ।
झूठे सपने भरे नयन में,क्यों मन को भरमाता है।।
सेठ, सरकार जब छल करता,श्रमजीवी बस रोता है ।
गुदड़ी सीकर वस्त्र पहनता,बीज खुशी का बोता है ।।
मोल परिश्रम का मिल जाए, गीत खुशी के गाएगा ।
आशाओं का संदेश लिए , नव प्रभात जब आएगा ।।
पूँजी नहीं यकीं हाथों पर , फिर भी खेत लहलहाते ।
अपना पीठ जलाते हलधर , मरु में सोना उपजाते ।।
फल फूल लदे हैं पेड़ो पर ,पशु पंछी भी मुस्काते ।।
मायूस मन दृग कोर भींगे, जग प्रतिपालक नीर बहाते ।।
लाभ योजनाओं के पहुँचे , नेहिल दीप जलाएगा ।।
भर जाएगी झोली उनकी , सौगात शुभ्र लाएगा ।।
*प्रो उषा झा रेणु*
देहरादून
जग प्रतिपालक नीर बहाते
Saturday, 5 June 2021
नम चदरिया एहसासों की
विथा गीत - 16/ 14
एहसासों से नम चदरिया ,चाँदनी रैन उदास है ।
बावरे नैन अब बिना पिया, बिखर रहे सभी आस है।
कानन पुष्पित ऋतु राज खड़े , कामदेव को संग लिए।
धड़क रही है जवां धड़कनें, नूतन सपना नैन दिए।
फूली सरसों जब आशा की, पोर पोर में नेह भरी ।
बासंती तन मन अरुणाई, सुरभित वसुधा हरी भरी ।।
बाट जोहती मैं विरहन बन, फीका लगे मधुमास है ।
एहसासों से नम...।।
पीले श्वेत वसन पहने हैं, निकल रही सभी छोरियाँ ।
कोकिल कंठ सुधा बरसे हैं, मंजीरा लिए टोलियाँ ।।
राग अनुराग पले हृदय में , बसंत उतरे हैं अँगना ।
लगे सुहावन दृश्य सभी तब, उन्मादित सजनी सजना ।
संग पिया अहो भाग उनके,मन में हास परिहास है ।।
एहसासों से नम चदरिया....
सुरम्य गगन इन्द्रधनु छाया ,चहके हृदय खग वृन्द का ।
मन आंगन है अब खिला खिला, चला बाण कामदेव का ।
रंग बिरंगे स्वप्न नयन है ,कब प्रियतम के भाग जगे ।
मधुरिम मधुमास द्वार आए ,प्यास प्रीत की हृदय पगे ।।
नित दिन नैना अब बहते हैं, प्रीतम नहीं बहुपास हैं ।
एहसासों से नम ....
छटा निराली चहूँ ओर है, शुचि सौरभ से पुहुप लदे।
घायल उर है मदन चाप से, तोड़ दिए फिर भ्रमर हदें।
रंग उमंग पिय भरमाये , आकुल मन संताप भरे ।
आना जल्दी तुम परदेशी , बसंत तब उल्लास भरे ।।
बैरी प्रीतम भूल गए जब, हृदय बहुत ही निराश है।
एहसासों से नम चदरिया, चाँदनी रैन उदास है।
बावरे नैन अब पिया बिना ,बिखर रहे सभी आस हैं।
प्रो उषा झा रेणु
देहरादून
एहसासों से नम चदरिया ,चाँदनी रैन उदास है ।
बावरे नैन अब बिना पिया, बिखर रहे सभी आस है।
कानन पुष्पित ऋतु राज खड़े , कामदेव को संग लिए।
धड़क रही है जवां धड़कनें, नूतन सपना नैन दिए।
फूली सरसों जब आशा की, पोर पोर में नेह भरी ।
बासंती तन मन अरुणाई, सुरभित वसुधा हरी भरी ।।
बाट जोहती मैं विरहन बन, फीका लगे मधुमास है ।
एहसासों से नम...।।
पीले श्वेत वसन पहने हैं, निकल रही सभी छोरियाँ ।
कोकिल कंठ सुधा बरसे हैं, मंजीरा लिए टोलियाँ ।।
राग अनुराग पले हृदय में , बसंत उतरे हैं अँगना ।
लगे सुहावन दृश्य सभी तब, उन्मादित सजनी सजना ।
संग पिया अहो भाग उनके,मन में हास परिहास है ।।
एहसासों से नम चदरिया....
सुरम्य गगन इन्द्रधनु छाया ,चहके हृदय खग वृन्द का ।
मन आंगन है अब खिला खिला, चला बाण कामदेव का ।
रंग बिरंगे स्वप्न नयन है ,कब प्रियतम के भाग जगे ।
मधुरिम मधुमास द्वार आए ,प्यास प्रीत की हृदय पगे ।।
नित दिन नैना अब बहते हैं, प्रीतम नहीं बहुपास हैं ।
एहसासों से नम ....
छटा निराली चहूँ ओर है, शुचि सौरभ से पुहुप लदे।
घायल उर है मदन चाप से, तोड़ दिए फिर भ्रमर हदें।
रंग उमंग पिय भरमाये , आकुल मन संताप भरे ।
आना जल्दी तुम परदेशी , बसंत तब उल्लास भरे ।।
बैरी प्रीतम भूल गए जब, हृदय बहुत ही निराश है।
एहसासों से नम चदरिया, चाँदनी रैन उदास है।
बावरे नैन अब पिया बिना ,बिखर रहे सभी आस हैं।
प्रो उषा झा रेणु
देहरादून
Saturday, 29 May 2021
जब बिसराया गाँव को
शहर की चका चौंध भायी, गाँव को छोड़ गए सारे ।
ऐश में गेह भूल जाते ,मातु पितु पंथ बस निहारे।।
जहाँ ने घाव दिया गहरा,उसे कण कण को तरसाया ।
दुखी वह रोटी कपड़ा से, मिली ठोकर घर को आया ।।
मलिन मुख आँख धँसी उनकी ,चेहरे बन गए छुहारे ।
शहर की चका चौंध भायी , गाँव को छोड़ गए सारे ।।
जिन्दगी भीख माँग कटती, आपदा लील गई खुशियाँ ।
रोग परिणाम भयावह है, हुई गम में घायल दुनिया।।
विकल बेमोल जिन्दगी है, झरे नैन से नित्य धारे ।
ऐश में गेह भूल जाते , मातु पितु पंथ बस निहारे ।।
घड़ी मनहूस जगत आई, छीन कर साँस दिल दुखाते ।
क्षुब्ध मन आशंकित रहता , डोर अपनों से छुट जाते।।
फँसे जब लोग आपदा में , छा रहे नैन अंधियारे ।।
शहर की चका चौंध भायी , गाँव को छोड़ गए सारे ।।
विवश एकांत वास को जग, हर्ष अरु विषाद वो भूले ।
मौन स्तब्ध जिन्दगी ठहरी , नहीं वो सावन के झूले ।
आह आई न जगत में इस, बार वो मृदुल सी बहारे।
ऐश में गाँव भूल जाते , मातु पितु पंथ बस निहारे ।।
खत्म प्रभु अब ये दौर करो,आस के बीज धरा बो दो
रोग महामारी से आतप मन, रोग बीज को ईश रों दो ।
द्वार पर अतिथि सत्कार हो,प्रेम से नित चरण पखारें
ऐश में गाँव भूल जाते , मातु पितु पंथ बस निहारे ।।
प्रो उषा झा देणु
देहरादून
ऐश में गेह भूल जाते ,मातु पितु पंथ बस निहारे।।
जहाँ ने घाव दिया गहरा,उसे कण कण को तरसाया ।
दुखी वह रोटी कपड़ा से, मिली ठोकर घर को आया ।।
मलिन मुख आँख धँसी उनकी ,चेहरे बन गए छुहारे ।
शहर की चका चौंध भायी , गाँव को छोड़ गए सारे ।।
जिन्दगी भीख माँग कटती, आपदा लील गई खुशियाँ ।
रोग परिणाम भयावह है, हुई गम में घायल दुनिया।।
विकल बेमोल जिन्दगी है, झरे नैन से नित्य धारे ।
ऐश में गेह भूल जाते , मातु पितु पंथ बस निहारे ।।
घड़ी मनहूस जगत आई, छीन कर साँस दिल दुखाते ।
क्षुब्ध मन आशंकित रहता , डोर अपनों से छुट जाते।।
फँसे जब लोग आपदा में , छा रहे नैन अंधियारे ।।
शहर की चका चौंध भायी , गाँव को छोड़ गए सारे ।।
विवश एकांत वास को जग, हर्ष अरु विषाद वो भूले ।
मौन स्तब्ध जिन्दगी ठहरी , नहीं वो सावन के झूले ।
आह आई न जगत में इस, बार वो मृदुल सी बहारे।
ऐश में गाँव भूल जाते , मातु पितु पंथ बस निहारे ।।
खत्म प्रभु अब ये दौर करो,आस के बीज धरा बो दो
रोग महामारी से आतप मन, रोग बीज को ईश रों दो ।
द्वार पर अतिथि सत्कार हो,प्रेम से नित चरण पखारें
ऐश में गाँव भूल जाते , मातु पितु पंथ बस निहारे ।।
प्रो उषा झा देणु
देहरादून
Thursday, 27 May 2021
पीर नदी की
सागर से मिलने को बीहड़, डगर नदी बलखाती ।
सच करने को सपने वह तो, दर दर ठोकर खाती
राह कठिन संकल्प नदी हिय,उदधि मिलन बस मन में ।
पर्वत की बेटी शूल लिए ,बहती निर्जन वन में ।
बाँटे राही दुख सुख गर तो, खुश हो प्यास बुझाती ।।
सागर से मिलने को बीहड़ , डगर नदी बलखाती ।।
चोट शिला से जब जब खाती, शोर बहुत ही करती ।
पीर भरे उर गीत सुनाती,कल कल करती बहती ।।
सागर से मिलने के खातिर , हर दुख वह सह जाती ।
सच करने को सपने वह तो ,दर दर ठोकर खाती ।।
सींच खेत खलिहान मुदित वह , बिन नीर नदी रोती।
क्षुब्ध नदी दोहन से अपने ,अस्तित्व नित्य खोती ।।
प्रदुषित जल जलयान चलाया, बंधन बस तरसाती ।।
सच करने को सपने वह तो , दर- दर ठोकर खाती ।
अपने संग बहा ले जाती , पाप सभी के गंगा ।
घायल उर मल मूत्र डाल के ,लेते मानव पंगा ।
पन बिजली से सूखी नदिया, बूँद बूँद ललचाती ।
सागर से मिलने को बीहड़ , डगर नदी बलखाती
बाँध पोटली हिम्मत वाली, तटिनी चलती राहों में ।
बढ जाती परमार्थ कर पियु , सपन सजे बाँहों में ।।
ढोती संग जडी बूटी वह, सींच खेत हर्षाती।
सागर से मिलने को बीहड़ ,डगर नदी बलखाती ।।
*प्रो उषा झा रेणु*
देहरादून उत्तराखंड
रोम।रोम में राम विद्यमान हो
विथा - गीत
🌷रोम रोम में राम बस विद्यमान हो🌷
राम राज्य की कल्पना साकार हो,इस जगत में राम नाम का गुण गान हो ।
रोम रोम में राम बस विद्यमान हो, मेरे संग हर घडी कृपा निधान हो।।
राम सार्वभौम सृष्टि के वरदान है ।
राम अभिमान है महि के सम्मान है ।।
राम पुनीत प्रीति के बस आधार है ।
हर युग रघुकुल दिप्ति दीप दिनमान है ।
भक्ति निस्काम करूँ कर्म अपना करूँ ।
राम विनती सुनो उर शुचि भावना हो ।
रोम रोम में राम बस विद्यमान हो , मेरे संग हर घडी कृपा
निधान हो ....।
राम से सिर्फ आस और विश्वास है ।
दुखियों के भक्त वत्सल सदा दास है ।
राम नाम की महिमा अपरम्पार है ।
भक्तों पर नेह राम का कुछ खास है ।।
राम संस्कार में आचार अरु विचार में ।
हृदय में है आस्था पूर्ण साधना हो ।।
रोम रोम में राम बस विद्यमान हो , मेरे संग हर घड़ी कृपा निधान हो ।
राम सुर संगीत है मन के राग है ।
सबके उर में बसे प्रेम अनुराग है ।
राम नाम से ही पावन संसार है ।
राम जग बाग के मृदु पुष्प पराग है ।
उर उमंग उल्लास अरु अमृत धार है ।
नाम रटते रहो अधर पर मुस्कान हो ।
रोम रोम में राम बस विद्यमान हो , मेरे संग हर घडी कृपा
निधान हो ।
जग ज्योतिर्गमय राम दिव्य प्रकाश है ।
राम से समग्र वसुधा पर विलाश है।
विरक्त मोह से वह वैराग व त्याग है ।
पतझड जीवन में खिले गुल पलाश है ।।
राम कण कण में क्षण क्षण में व्याप्त दिखे ।
अधर पर सदैव राम शुभकामना हो
रोम रोम में राम बस विद्वमान हो , मेरे संग हर घडी कृपा
निधान हो ।
सत्य निष्ठा मर्यादा के प्रतिमान हैं ।
राम सद्भाव है सिर्फ क्षमादान है ।
जग जानते राम ईश के अवतार हैं ।।
सदियों से उर की बस यही याचना है।
राम राज्य की कल्पना साकार हो , राम का नित्य ही गुण गान हो ।
प्रो उषा झा रेणु
देहरादून
🌷रोम रोम में राम बस विद्यमान हो🌷
राम राज्य की कल्पना साकार हो,इस जगत में राम नाम का गुण गान हो ।
रोम रोम में राम बस विद्यमान हो, मेरे संग हर घडी कृपा निधान हो।।
राम सार्वभौम सृष्टि के वरदान है ।
राम अभिमान है महि के सम्मान है ।।
राम पुनीत प्रीति के बस आधार है ।
हर युग रघुकुल दिप्ति दीप दिनमान है ।
भक्ति निस्काम करूँ कर्म अपना करूँ ।
राम विनती सुनो उर शुचि भावना हो ।
रोम रोम में राम बस विद्यमान हो , मेरे संग हर घडी कृपा
निधान हो ....।
राम से सिर्फ आस और विश्वास है ।
दुखियों के भक्त वत्सल सदा दास है ।
राम नाम की महिमा अपरम्पार है ।
भक्तों पर नेह राम का कुछ खास है ।।
राम संस्कार में आचार अरु विचार में ।
हृदय में है आस्था पूर्ण साधना हो ।।
रोम रोम में राम बस विद्यमान हो , मेरे संग हर घड़ी कृपा निधान हो ।
राम सुर संगीत है मन के राग है ।
सबके उर में बसे प्रेम अनुराग है ।
राम नाम से ही पावन संसार है ।
राम जग बाग के मृदु पुष्प पराग है ।
उर उमंग उल्लास अरु अमृत धार है ।
नाम रटते रहो अधर पर मुस्कान हो ।
रोम रोम में राम बस विद्यमान हो , मेरे संग हर घडी कृपा
निधान हो ।
जग ज्योतिर्गमय राम दिव्य प्रकाश है ।
राम से समग्र वसुधा पर विलाश है।
विरक्त मोह से वह वैराग व त्याग है ।
पतझड जीवन में खिले गुल पलाश है ।।
राम कण कण में क्षण क्षण में व्याप्त दिखे ।
अधर पर सदैव राम शुभकामना हो
रोम रोम में राम बस विद्वमान हो , मेरे संग हर घडी कृपा
निधान हो ।
सत्य निष्ठा मर्यादा के प्रतिमान हैं ।
राम सद्भाव है सिर्फ क्षमादान है ।
जग जानते राम ईश के अवतार हैं ।।
सदियों से उर की बस यही याचना है।
राम राज्य की कल्पना साकार हो , राम का नित्य ही गुण गान हो ।
प्रो उषा झा रेणु
देहरादून
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