Thursday, 28 December 2017

नए साल में

नए साल नई खुशियाँ लाए
काली अमावस की रातें दूर ही रहे
पड़े न वास्ता किसीको मुफ़लिसी से
सबके जीवन उजालों से भर जाए ..

घर आंगन खुशियों से खिलखिलाए
न हो सामना गमों से किसी का
हर घर प्रसिद्धि से रौशन हो जाए
सबका मन नई उमंगों से मुस्काए ..

कई यादें जो दिल को कचोटता
जिनकी छाया अब न नसीब में
 जो हमारे दिल के बेहद करीब थे
बीते हुए वर्ष ने दी दुखों की सौगात ..

वो स्नेहहील रिश्ते जो बिछुड़ के
बहुत दूर चले गए हमें तन्हा करके
है उम्मीद न होंगे जुदा किसी से नए साल में ..
सब कोई रहे स्वस्थ व खुशहाल नए साल में ..

Wednesday, 27 December 2017

जीवन की निरंतरता

जिन्दगी चलती रहती है
चुपचाप बिना शोर के
बिना रूके बिना थके
अपने ही लय में, निरंतर गति से
जिन्दगी चलती रहती है ..
 जीवन की पथरीली राहों में
 लड़खड़ाके भी बढ़ते रहते
और  हिम्मत से चलकर
 मंजिल को पा ही लेते
जिन्दगी चलती रहती है ..
लोग मिलकर बिछुड जाते
यादों के साथ रह जाते
किसी के बेबसी से बेपरवाह
जिन्दगी चलती रहती है ..
जीवन के डोर जब टूटने लगते
धीरे धीरे जिन्दगी फिसलती जाती
और नियति के आगे हार जाती
फिर दामन को छोड़ बढ जाती
जिन्दगी चलती रहती है ..

Tuesday, 26 December 2017

संस्मरण ..

मेरी माँ ने छै मई को एकादशी उद्दयापन रखा था।बहुत ही भव्य आयोजन रहा ।पंडितों और परम्पराओं  के अनुसार माँ ने स्वेच्छा से पूजा विधि ,दान और ब्रह्म भोज कराया ।पूरे रात भजन कीर्तन भी हो रहा था ।मन में एक अजीब तरह की अनुभूति का संचार हो रहा था जैसे देव स्वयं विराजमान हो गए हों ।माँ पापा के गुजरने के बाद थोड़ी उदास सी दिखती है, न जाने क्यों उस दिन उनके चेहरे से अलग ही नूर टपक रहा था मानो पापा दिव्य आलोकिक तेज बनकर माँ के आत्मा में प्रविष्ट हो गए हों । पापा को
बड़ा ही मन था धूमधाम से माँ का एकादशी उद्दयापन करवाने का पर जिन्दगी ने उन्हें मौका ही नहीं दिया ।परंतु उनके बच्चों ने कोई भी कसर नहीं छोड़ा ।सभी रिश्तेदार, मित्र पड़ोसी उपस्थित थे शिवाय हमारे "पापा" के ।लेकिन न जाने क्यों किसी को भी उनकी अनुपस्थिति का एहसास ही नहीं हो रहा था ,लग रहा था वो वहीं हैं इधर उधर कहीं  ।जब पूजा विसर्जन हुआ तो पापा के प्रतिमा पर माल्यार्पण के समय सबकी एकाएक तंद्रा टूटी ,हम सभी लोग भाव विह्वल हो उठे ।सबने भींगी आँखों से पापा के चरण छू कर पूष्प अर्पण किया ।माँ को संभालने के लिए मैंने भी खुद को संभाला और अच्छे से उद्दयापन के बाकी बचे पूजन विधि को पूरा होने तक सभी रश्मों को पूरे मन से निभाया ।

Monday, 25 December 2017

सच्ची कहानी- -जीवन एक कर्मभूमि

सभी को अपने सारे कर्मों का हिसाब चुकता करना ही  पड़ता है ।जीवन में जो भी कर्म करते हैं उसका फल एक दिन अवश्य मिलता है । यहाँ पर हम जो भी करते हैं, यहीं भुगतना पड़ता है ।इन्सान बूरे कर्म करते वक्त उसके बूरे  परिणाम को नजर अंदाज कर देता है ...बात बहुत पुरानी है , मेरे मायका के दलान पर  बहुत बड़ा और सुंदर राधाकृष्ण जी का मंदिर है ।नित्य दिन पूजा पाठ के लिए पुजारी रहते हैं ।एक दिन मेरी दादी का कुछ खो गया ,बहुत खोजने पर नहीं मिला..वो दुखी हो कर नाराज हो रही थी इस पर मेरे पापा ने झल्लाकर कहा, मेरे कमरे में इतना समान है  कभी कुछ खोया ही नहीं आपका समान मिल जाएगा ।बगल में पुजारी सब सुन रहे थे ।उसी रात मेरे पापा के कमरे में पुजारी  चार डाकू ले के आया और सब कुछ उनलोगों ने चुरा लिया अंत में मेरे पापा पर आक्रमण करने वाला था परंतु पुजारी ही उस समय अपने साथियों से बचा लिया ।पापा इस एहसान के बदले पुजारी को पुलिस से बचाया और जेल जाने से रोक दिया साथ ही सजा माफी भी दिलवा दिया ।उस समय हम सभी भाई बहन बहुत छोटे थे।बड़े होने तक उस पुजारी को दादी के पैर पर रोते गिडगिडाते देखा करती थी ..पुजारी को कुष्ठ रोग हो गया था, उसकी पत्नी का देहांत हो गया था। पूरा परिवार ही बिखर गया था ।इन सभी को वो अपने कर्मों का फल मानता था...सचमुच हम जो बोते हैं वही फसल काटते हैं ।हमारे सभी कर्मों का फल इसी जिन्दगी में भुगतना पड़ता है ।अच्छे कार्य का फल भीअच्छा होता है और बूरे काम का बूरा ही फल मिलता है ...

Sunday, 24 December 2017

यादों के झरोखों से (बेटी की विदाई)

बिटिया के शादी के वर्षगाँठ के उपरांत वो सारी बातें याद आ रही है..मैं कितनी गमगीन और परेशान हो गयी थी।जिस बेटी को अपने से एक पल के लिएअलग नहीं की थी अब उसे विदा करना है, ये सोचकर ही मन बैचेन सा हो रहा था ।खैर विदाई तो करनी ही थी ।औरत भी अजीब होती है ..
जब तक उपयुक्त रिश्ते नहीं मिल रहे थे ,तब भी परेशान थी।हमेशा यही सोचती मेरी फूल सी बच्ची के लिए अच्छे
और संस्कारी वर और परिवार मिल जाए ।अब जब सब तरह से योग्य वर और परिवार मिल गया तो मन भी  आनंदित हो उठा ।शादी के तैयारी से लेकर कन्यादान तक मन में किसी और बात सोचने की फुर्सत ही नहीं थी।
मुझे याद है कन्यादान के समय मेरे पति फूट फूट कर रो रहे थे ,परंतु मैं बिलकुल नहीं रोयी ।लेकिन विदाई की घड़ी आते ही न जाने क्यों मन इतना व्यथित हो उठा ,शायद परायी होने के गम को सह नहीं पा रही थी
लग रहा है था मानो मेरे शरीर से दिल को काट कर निकाला जा रहा है, सचमुच विदाई का वो पल बहुत वेदना से भरा हुआ था ।आज भी याद आने पर आँखें नम हो जाती है, मन बहुत भींगने लगता है ।सचमुच बिटिया होती ही ऐसी है... जब जाती है तो घर से रौनक ही चली जाती है ..आती है तो घर भी खिलखिलाने लगता है ..
शादी के बाद हम सब घर से देहरादून आ गए।बिटिया के एक एक समान, कपड़े सम्हालते समय फूट फूट कर रो रही थी ।
घर का एक एक कोने पे उसकी याद को समेट कर कहाँ रखती ..सब जगह खाली खाली लग रहा था ।पहले भी हास्टल पढ़ने के लिए गयी ,परंतु उस समय थोड़े से समय बाद उदासी भाग जाती थी ,लगता छुट्टियों में तो आएगी ही ।लगभग साल भर बहुत उदासी में कटा समय ।डॉ साहब  (मेरे पति) ने बहुत समझाया, तुम्हारे बिना भी घर उदास हुआ होगा,दुनिया की रीत निभानी ही पड़ती है ..
बिटिया ने भी समझाया .."मम्मी मै हमेशा तुम्हारी हूँ ,बस
मेरी जिम्मेदारी बढ गयी है।मुझे दोनों घर सम्हालना है ।
आप खुश रहोगी तो मैं भी खुश रहुँगी।"खैर बिटिया के समझाने पर अब मैं सम्हल गयी हूँ ।बिटिया पढाई के साथ साथ सारे रिश्ते बखूबी निभा रही है ।सब उससे बहुत खुश है ।जीवन उसे हर खुशीयों से नवाजे..

Saturday, 23 December 2017

नीरव निशा

निः शब्द निशा
शुकुन भरा पल
लेके आयी
देके जाएगी
ढेरों ऊर्जा
कल के सुबह के लिए ..

टिमटिम तारों के
साथ चंदा से
देखो दो पल
मिलने आई
पल में ही बिछुड़ के
चली जाएगी ..

नेह भरे कुछ
पल देके नीरव निशा
निश्क्रंदन कर
आती मिलन की
आस लिए अपने
प्रियतम चंदा से ..

सुहानी मनमोहनी
मधुर यामिनी
शुकुन के चंद
लम्हें लेके ..
देती मिटके भी
कई खुशियाँ ..

मिलन की वो
सुनहरी रातें
पल में ही जुदा
हो कर बनके
रह जाती यादें
ऐसे ही मानव
के संग जीवन
पल में ही छुटके 
बन जाती एक
फसाना ..

Friday, 22 December 2017

प्रीत की रीत

क्यूँ सूरजमुखी रोज ही खिल जाते ..
किरणों से जब भी सूरज निकलते ..
सागर बाँहें फैलाए बार बार
अवनि को छूने को मचलते
क्यों चातक स्वाति बूँद को तरसती ..
 
रब की ये अद्भुत पहेली समझ न पाती

नेह गंध में लिपटा भ्रमर
कुमुदिनी के खिलने पर
इर्द गिर्द मंडराया करता ..
रजनीगंधा खुशबू फैलाती
रात सुहानी जब भी आती ...
प्रियतम परवाना के आस में
तिल तिल कर शम्मा है जलती 

मन ही मन हर दिन ये सोचा करती ...

दिल को फिर समझ में आया 
प्रीत का प्याला जिसने पिया
दिल आसक्ति में डूब ही जाता
जिस संग जिसकी प्रीत है होती
उसके परिधि में घुमती रहती

जीवन की डोर उसके ही संग बंध जाती ..

सच्ची प्रीत अनोखी होती
शर्तों में वो  कभी न बंधती
दूरियों से प्रीत कम न होती
मन उसी संग बंध जाता ..
उसके खुशी में ही खुश रहता
अपना सब कुछ सौंप के
मन ही मन आनंदित होती

प्रीत की रीत हमें  यही सिखलाती ..