Thursday, 15 November 2018

गुरु सानिध्य

मनुज विमुख न हो कर्म से , रख ले उर तू साफ
  प्रभु चरण के रज ले लो, करे भूल वो माफ

तन की माया त्याग दो, टुटे श्वास की डोर
 दया कर सभी जीव से , कर्मो पर कर गौर

छोड़ जाना जग सबको ,,, बोलो मीठे बोल
 कर उपयोग पल पल का ,,, जीवन है अनमोल

  है निश्चित कुछ भी नहीं ,क्षण भंगुर  संसार
  नेकी जाते संग ! न तू  , दौलत पर दिल हार

छल प्रपंच जग में भरे , मुश्किल है पहचान 
 गुरु सानिध्य से होती, है मंजिल आसान

गुरु चरण शीश झुका , मिलते जीवन सीख
  चाह सभी पूरी करे, मांग ज्ञान का भीख

शान्ति मिले गुरु चरण से ,दिल में भरते प्यार
  सब क्लेशों को वो हरे, करे वही भव पार ।

 

Monday, 12 November 2018

अलमस्त बचपन

विधा- कविता(बाल रचना)

मैं तो हूँ एक छोटा सा बच्चा
लेकिन हूँ मैं मन का सच्चा
दादी दादू के आँखों का तारा
माँ के आंचल का हूँ सितारा ..

पापा का हूँ मैं कृष्ण कन्हैया
संग उनके खेलुँ भूल भूलैया
घुटने पे पापा झुलाते झूला
कान्धे पे चढ़ समाता न फूला...

गलियों में हम करते हैं हुडदंग
नित नए खेल से सब होते दंग
मित्रों की टोली में हम रहते मस्त
बाग बगीचे के मालिक होते पस्त

बच्चों के शरारतों से माँ परेशान
पल में भूले क्रोध, देख भोलापन
रोज ही शिकायतें लाए पड़ोसन
ऐसे ही अलमस्त होते हैं बचपन..

सतसंग मित्रों की ज्यों मिले सच्चे
बन जाते संस्कारी अज्ञाकारी बच्चे
माता पिता के जब हम कहना मानते
सफलता के कसीदे नित्य ही काढ़ते

उषा झा  (स्वरचित)
उत्तराखंड (देहरादून)

Wednesday, 31 October 2018

मतलबी

काफिया-आ

गम देकर वो सारी खुशियाँ चुरा ले गयी
बेदर्दी सनम कर हदें पार भरोसा ले गयी

एतवार करना किसी पर बहुत मुश्किल
बदनुमा दाग चेहरे पे चेहरा छुपा ले गयी

किसी के दिल की खोट दिखती कहाँ है
औकात वो असलियत के दिखा ले गयी

हकीकत यही बिकती है सब कुछ बाजार में 
जेब जिसके गरम हो जमीर भी बिका ले गयी

विश्वास नहीं है आज किसी को किसी पे ही
खाते हैं सब धोखा मुहब्बत के वफा ले गयी

प्रियतम के प्यार में पागल गुजर गए दर बदर
उनके गमों  ने नैनों में अश्रु धार बसा ले गयी

मुहब्बत का दौर भी अजीबो गरीब है साहिब
नशा का ये आलम सारे सुकून सजा ले गयी

किसी पे एतवार करना अब बहुत है मुश्किल
औकात वो अपने ही हस्ती का मिटा ले गयी

सच और झूठ की पहचान करना कठिन काम
मतलब परस्त जहां में सच्ची प्रीत लुटा ले गयी

Monday, 29 October 2018

बावरा मन

विधा- रूपमाला

रूप देख अलबेली की  , गुम हो रहे होश   ।   1.
चाल मस्त मृगनयनी के, कर रही मदहोश ।।
लट बिखरे हैं नितम्ब तक ,रूप लगे अनुपम ।
चाँद सा सूरत अप्रतिम, चितवन भरे प्रेम  ।।

लाज से बहुत सकुचाती , भींगती हो ओस   ।   2.
छवि बसती अब नैनों में, मिलन की है आस  ।।
मन सुमन बरसा रहे हैं , स्वागत करे नैन  ।
राह निहारूँ अब निश दिन  , हिया है बैचेन  ।।

ये घटा घनघोर आई, बावरा मन आज      ।      3.
बह रही शीतल बयरिया,बज रहा दिल  साज ।।
याद में तरसी पिया की , मन है अब उदास  ।
मीठी मिलन की चाह ने , जगाया है प्यास  ।।

ख्वाब में है कौन आया, कर रही महसूस   ।  3.
जनम की संगिनी तेरी, कर न तू मायूस     ।
बने जीवन सफल मेरा, रख अपने पनाह   ।
बनूँ साजन अर्धांगिनी , यही दिल में चाह   ।

आसरा

विधा- हरिगीतिका

हे अम्बिके मैं बेसहारा ,कौन मुझ पे ध्यान दे    । 1.
दरबार में आई तिहारे , मात ममता दान दे       ।
दे दो भवानी तू सहारा,  कर कृपा मम तार तू   ।
अज्ञानता की तिमिर उर में ,कर मेरा उद्धार तू   ।

तेरी दया से लंगड़े चले , शक्ति भरमार है तुझे    ।
है निवास धुर्तों की बस्ती , ले लो शरण में मुझे   ।
खाल में है छुपा भेड़िया , परख सकूँ दृष्टि  दो   ।
पापियों से जगत भरा है ,कर संघार उबार दो   ।

जीने न दे लोग निर्बलों को, जिन्दगी असहाय है ।
है अधर्म का ही बोलबाला, पहना सब नकाब है ।
छल प्रपंच के आवरण में क्यों,फिर सच आज ढक गया । अधंकार संसार से मिटाकर ,मातेश्वरी कर  दया ।

करबद्ध मैं कर रही विनती ,अब तो दर्शन दीजिए ।
भव बंधनों में पड़े मन को , माँ मुक्ति दे दीजिए    ।
हूँ जग में अबला अकेली, पुकार तो सुन लीजिए   ।
आप ही मातु पितु मेरे हो ,आसरा दे दीजिए   ।

 

 

Thursday, 25 October 2018

जल संरक्षण

विधा- कुण्डलिया

 प्यासा है जग नीर बिन , बहा नीर न इन्सान
बिन नीर नहीं जिन्दगी , धारण कर यह ज्ञान 

धारण कर यह ज्ञान  , समस्या जग की सुलझे
अगर चाहिए  नीर  , बचा जल उलझन उलझे

 भरे झील तालाब , देना खग पशु  दिलासा 

  खर्च हो बूँद बूँद,  नहीं हो कोई  प्यासा

धरती विकल अब वृक्ष बिन , मानव है नादान        2.      
बिना वृक्ष ऋतु बदल ता  , वन बहुत मूल्यवान

वन बहुत मूल्यवान ,पहुँचा न नुकसान इसे ।।
काट नहीं अब वृक्ष , चेतावनी मान इसे

सभी लगाना पेड़ , प्रकृति सम्मोहित रहती ।
अधर सजे मुस्कान , रहे हरी भरी  धरती

 सूना वन लग रहा है , हरियाली है लुप्त        3.
होते शिकार नित्य पशु , अनगिन जंतु विलुप्त ।

अनगिन जंतु विलुप्त  ,मनुज आखेट  लुभाते
मारे चीता शेर, खाल बेच धन कमाते ।।

 असुरक्षित वन जीव ,वनों की हानि दूना
 संरक्षण हो सृष्टि , बिना पौधे वन सूना  ।।

Thursday, 18 October 2018

मुरादें

विधा-ग़ज़ल
रदीफ -कब तलक

धीरज ने दामन छोड़ा खुशियाँ मिलेगी कब तलक
गमों से परेशान जिन्दगी आस दिलाएगी कब तलक

चाहत थी फूलों भरी राहों से जिन्दगी गुजरती रहे
लहूलुहान हुए पथ काँटे पग चुभाएगी कब तलक

अरमां की झोली किस्मत वालों की ही भरी रहती
न जाने अधूरी मुरादें हमको तरसाएगी कब तलक

इन्सान तो ईश्वर के कठपुतली वो जैसा चाहे वैसा करते
विश्वास की डोर आखिर टूटने से बचाएगी कब तलक

जितने ही ले वो इम्तहान एक न एक दिन आएगी बहार
पतझड़ के मौसम आकर बार बार रूलाएगी कब तलक

उषा झा  स्वरचित)
उत्तराखंड देहरादून)