Thursday, 29 November 2018

विलग होना शरीर से आत्मा का

विधा-  सरसी छंद आधारित गीत

नूतन वस्त्र पहनकर आता , मनुज देह हर बार  ।
आत्मा  मुक्त जीवन मरण से  , नश्वर ये संसार   । 
    
                       ⚘⚘(1 )⚘⚘

मरती आत्मा कभी नहीं है ,,, बदल   लेती शरीर
कर्मों के अनुरुप होती है,,,, भाग्य की भी लकीर

हर योनियों का हिसाब ईश,,,करे सबका जरूर
किए कर्म जिसने जैसे फल,,, देते बनकर क्रूर

ओज खोया शरीर, छोड़ने ,,, को जग हो तैयार
आत्मा मुक्त जीवन मरण से,,, नश्वर  ये  संसार

                        ⚘⚘(2)⚘⚘
                
बुरे कर्म करके डरा नहीं ,  सोचा नहीं अंजाम
आत्मा ने तुझको समझाया, ली न फिर भी विराम

कितने ही किए हेरा फेरी,,,, कलुषित  तेरे  सोच
घायल किया दिलों को कितने ,,वचन में न था लोच

मिल जाते हैं  करनी के फल,,,, बोते हैं जो खार
आत्मा मुक्त जीवन मरण से ,,,, नश्वर  ये  संसार

                          ⚘⚘(3)⚘⚘

कर्मों के अनुरुप लिए जन्म ,,,मनुज  हुए  देवेष
सतयुग त्रेता द्वापर कलयुग,,, सब युग हुए विशेष

सतयुग सबसे पावन निर्मल  ,,,, करते देव निवास
सत्य व शांति की बोल बाला ,,, करे  प्रेम परिहास

त्रेता में था तमस आ घेरा ,,,, द्वापर पंच विकार
आत्मा मुक्त जन्म मरण से,,,,  नश्वर  ये   संसार

                        ⚘⚘(4 )⚘⚘

कलयुग के चरण पड़े जैसे , घेर लिए अति पाप 
मनुजों ने पहचान मिटाया  , सबके  सब हैं  बाप

योग तप करना हुआ मुश्किल, जपो नाम भगवान
भक्ति भाव से तू पूज प्रभु को ,  मिलता है वरदान

माया में  नश्वर  शरीर  के ,,,,  पड़ना  है  बेकार
आत्मा मुक्त  जीवन  मरण  से,,,नश्वर  ये  संसार

                      ⚘⚘(5)⚘⚘

जब  तक संभलता मनुष्य आ ,,, जाता यम का दूत
आत्मा मुक्त चले ही जाते ,,,,छोड़ चीर निंद्रा में धूत

अब तक तो नाम शोहरत ही ,, थी केवल पहचान
बन गया है मिट्टी का शरीर ,,,  छुट गए जब ही प्राण

मिट्टी के तन का यही मोल , कर लो सब स्वीकार
आत्मा मुक्त जीवन मरण से,,, नश्वर  ये   संसार

Monday, 26 November 2018

प्रतिक्षा

विधा-  कुन्डलियां

बने दो दिल एक जान ,,है जन्मों का साथ   1.            
मुदित मन हो रहा हर्षित ,,लिए हाथों में हाथ
लिए हाथों में हाथ,,,,,सब प्रेम का दीवाना
तन मन जलाते क्यों  ,लिखा नसीब से मिलना
इश्क तो इबादत है,,,, पूज ले दिल से अपने
दिल में तुम हो बसे , हर जनम प्रियतम बने

प्रेम प्रतिक्षा नैनन में ,,, खोल हृदय के पाट  2.
जिया डोले धड़क धडक,,देखे पी के बाट
देखे पी के बाट,,, मनवा में अगन लगाय
तड़प रहे बिन सजन , विरह शूल सहा न जाय
मचल रहा अरमान , पिघल रहा उर बन मोम
दो जां एक आत्मा, हर धड़कन में बस प्रेम 

कंचन सा बदन तेरा ,छाया कितना नूर
मलय सी खुशबू तेरा,,,,बढ़ाते हैं सुरूर
बढ़ाते हैं सुरूर ,,, सुवासित हुआ जिन्दगी
छाया प्रेम का नशा ,,प्रीत की है प्यास जगी
मदमाती पुरवाई ,, मन को बहकाती सजन
 रूप सलोना लगे ,लुभा रहा काया कंचन

सच्चे प्रहरी

विधा- गीत

प्रभु जी तुम कितने ही गम दोगे 
कर्मों से अपने नसीब बदल देंगे

तन ढकने को हमें  वस्त्र नहीं
खाने को घर में मिले रोटी नहीं
अपने भाग्य को खुद बनाउगाँ
खुशियों से जीवन सजाऊँगा
हँसते हँसते ही गम को पी लेंगे
कर्मों से अपने नसीब बदल देंगे ...।।

करनी पड़े बचपन में मजदूरी
जिन्दगी में है कितनी मजबूरी ,
मुश्किल को धूल चटाऊँगा    ।
मै तो अपना फर्ज निभाऊँगा
जीवन की विसंगतियाँ भूला देंगे,
कर्मों से अपने नसीब बदल देंगे.. ।।

वंचित हूँ हर एक सुविधाओं से
सरकारी स्कूल में पढूँगा मन से,
शिक्षा का मशाल जलाऊँगा   ।
उँचे पद को हासिल कर लूँगा
करेंगे सब फक्र ऐसे चिराग बनेंगे,
कर्मों से अपने नसीब बदल देंगे   ।।

धनिकों का वर्चस्व मिटाकर
मेधा से जाऊँगा शीर्ष पर
जन जन होंगे गर्वित मुझपर  ।
ऐसे सच्चे प्रहरी बनूँगा
देश के हित में मर मिटेंगे ,
कर्मों से अपने नसीब बदल देंगे ।।

Sunday, 25 November 2018

काल के पद चाप

विधा-कुंडलियां   

आना शिशू का भूमि पर , भरे प्रेम उर भाव  3.
 लोग बधाई दे रहे  ,,,, पले  नेह  की  छाँव
पले नेह की छाँव ,     सभी अह्लादित होते
हँसकर सभी गुजार ,   यहाँ पर जीवन लेते,
 कठिन टालना मृत्यु  ,,,,,सत्य है जग से जाना
 कर चल ऐसे कर्म ,,,,, पड़े फिर लौट आना

मनुज पहन चोले नए  ,आता है संसार
निभा कर फर्ज अपना ,, जी लो तुम किरदार
जी लो तुम किरदार,,कर्तव्यों की राह पकड़
दया धर्म  है पूजा,,, लालसाओं में न जकड़
दो दिनों का मेला जग , जी लो खुशियों से आज
आ के धरा पर तुम , कर कुछ नए काम मनुज

रिश्ते में उलझा रहा ,   राग द्वेष में जीवन
दौलत में फंसा मन, माया न छोड़ रहा तन
माया न छोड़ रहा तन ,छोड़ अब सारे झंझट
सुन लो अब आ गए  ,  काल के पद चाप निकट
आत्मा कराह रही,,,,, मूढ़ क्यों मद में जीते
 विदा के पल भी ,,,,,, छुट  न  पाते  रिश्ते

ईमान (गजल)

रदीफ़-  नहीं होती
काफिया- ओती

 बिन प्यार के कभी आँखे ख्बाव बोती नहीं होती      
 जीवन के खूबसूरत लम्हों के ये मोती नहीं होती
 
  तेरे बैगैर कैसे जीते थे ये सोच के मन सिहर उठा
  तुम जुदाई के गम न देते तो आंखें रोती नहीं होती

 सच्चे मुहब्बत से महबूब का दिल भी संभल जाता
 दिलबर को अपनी कभी शिकायते ढोती नहीं होती

 आशिकी करनी और बात निभाना उतना मुश्किल
 बेवफा के दिल कभी पाकीजगी शोभती नहीं होती

  दुश्मन को भी कभी दिखाए न मुश्किल भरे दिन
  साथी हो संग तो साया भी साथ छोड़ती नहीं होती
  
  कोई किसी के जज्बातों के कदर न करते जहां में
  सभी स्वार्थ के शिकार अपना खोजती नहीं होती 

   ईमानदार सजन धोखा न देते अपने प्रियतम को
   परख लें उन्हें,साफगोयी हरदम बोलती नहीं होती

   मुहब्बत का वादा सच्चे प्रेमी ही निभाया करते हैं
   सचमुच झूठों के नैन ईमान की ज्योति नहीं होती

 पाक साफ मुहब्बत रब के रहमो करम से ही मिलता
  नशीब वालों की किस्मत कभी डोलती नहीं होती



 

Thursday, 22 November 2018

राखी (मुक्तक)

रहो तुम जिस देश भाई,हमेशा खुश रहना    ।
कभी भूलना न बहन को,जगह मन में देना  ।
बाँधना एक सूत हथेली पर मेरे ही नाम से   ।
रक्षा हो सभी बहनों का,बस ये लाज रखना  ।

एक ही माली थे,एक ही बगिया की फूल वो  ।
दूर भले हो गई सबसे याद करती हरदम वो  ।
वंचित न करना अपने प्यार दुलार से भाई   ।
भूल न पाती मायके सबके जीगर में रहती वो

माँ पिता की लाड़ली खुश रहती ससुराल   ।
बचपना छोड़ सब साँचे खुद को ली ढाल  ।
निभाती सभी रिश्ते दिल से मिली जो सीख  ।
रीत निभाना भाई राखी पर आना हर साल   ।

प्रहरी हैं सच्चे बाजी प्राणों के हँस के देते   ।
पहले भेजूँ उन्हें राखी, वचन वही निभाते   ।
वीर सैनिक भाई की कलाई कभी सूनी रहे  ।
सुरक्षित सभी उनसे,देश हीत में आहुति देते ।

वंचितो को बांधूँ राखी ,,,मुस्कान बनी रहे   ।
सबके भाई की कलाई,,,, हमेशा सजी रहे   ।
बहनें जिसे बांधे न राखी,,, बड़े हतभागी हैं  ।
अपने पराये के बीच भी,,, रिश्ते बनी रहे      ।

भ्रमित नव पीढ़ी

विधा- दिग्पाल छंद

 संग रहते भाई बहन , मात पिता खुश होते  ।
 बचपन में हरदम ही , नेह के बीज बोते  ।।
 बच्चे बने सब सभ्य , उन्होंने ही सिखाया ।
 मिल जुलकर प्यार बढ़े,सबको यही बताया ।।

बुरी संगत में पड़ कर,पथ भ्रष्ट बन जाते हैं
शर्म से गर्दन उनका,,,,  झुक जाया करते हैं  
अच्छी परवरिश से भी,,,, मार्ग से भटक जाते  ।
बीज उन्नत होकर न ,,, जाने क्यों सड़ जाते ।

 संस्कार जो दिए थे , ले सबके आशीसें     ।
 बड़े हो कर भूल गए , तोड़े सभी भरोसे  ।।
 पौध छायादार वृक्ष ,,,, बने आस में जीते  ।
 नेह से सींचकर भी,,,, खाली आँसू पीते ।

पा कर शोहरत आज,छोड़ दिया उन्हें ही ।
पेड़ पर बैठ कर क्यों, काट रहे जड़ को ही
अस्तित्व मिटेगा नव, पीढ़ी समझ न पाते   ।।
जड़ से पृथक हो पेड़, कभी जी कहाँ पाते   ।