Wednesday, 18 September 2019

दोहे (करुण रस)

क#...
जल, तिल-तिल नारी रही , सुरसा बनी दहेज ।
जुर्म अपनों का सहती, अश्रु बहाती सेज   ।।

निबटाते पितु ब्याह कर, बेटी बनती भार।
व्यथा कहे अपनी किसे , देता है दुख मार।

अन्याय के विरुद्ध वो , कर न सके प्रतिकार ।
संग नहीं कोई  खड़ा , खड़ी बीच मझधार ।।

रौनक  लाती  गेह    में,  नारी है आधार ।
सबको देती है खुशी, गम उसका संसार ।।

मुझको देवी मत कहो,बस दो थोड़ा मान ।
खुशी से न वंचित करो, नहीं करो अपमान ।।

ख #
वहशी कलि को नुँच गया , हुई लहूँ से लाल ।
लट खींच चोट बहु दिए, टूटी वो सम डाल ।।

चीख फिजाँ में गूँजती , देती उर को चीर ।
मातु छाती पीट रही , हो गई अब अधीर ।।

ढूंढ रही अपनी सुता, नहीं दिख रहीं आज ।
कलि देख हुई बावरी , गिरा उसी पे गाज ।।

बीच पथ में पड़ी रही, गुजरे मनु चुपचाप ।
बची दिल में दया नहीं,बनती कलि अभिशाप   ।।

सुकूँ छीन लेते सभी, जालिम के करतूत ।
बेटी कोख जनम न ले , हो जग ऐसे पूत ।।

सूखीं नदी

जल विहीन नदी अतृप्त मही,केवल रिक्त पाट है ।
विकास की ऐसी हवा चली , बादल रूठ गए हैं   ।।

दो बूँद नीर ही है जीवन, मानव व्यर्थ बहाए ।
पूर्वज की मेहनत बेकार , मनु वृक्ष क्यों कटाए ।
अब बरसे न बदरा धरा पर, जीव मुँह लटकाए ।
टुकुर टुकुर पशु पक्षी देखते, प्यास कैसे बुझाए ।
सूखीं नदी कृषक रोते , अस्तित्व लुट गए हैं ।
विकास की हवा.....

जल बिन धरा हुई जब बंजर , भूख सबको रुलाया ।
खुद ही आफत मनुज बुला दी, जलवायु बिगाड़ दिया,
जल संरक्षण फिजूल समझा, करनी मनुज भुगत रहे ।
कीमत वक्त की जो समझे , वो फिर मुस्कुरा रहे ।
पट्टी अब आँखों की खोलें , देख प्राण  घटु गए ।
विकास की हवा में ...

बनी रहे वसुधा दुल्हन सी, गुल से शृंगार करें ।
वृक्ष की कतारें लहराए, हम सभी प्रयत्न करें ।
कानन सजा फूल फल से हो,खग वृन्द मन हर्षाए ।
हरी भरी डाली किसलय से, दृग को बहुत लुभाए ।
फिर न रहे प्रदुषण, शुद्ध वायु,सबके जान बचाए ।

जल विहिन नदी अतृप्त मही ,केवल रिक्त पाट है ।
विकास की ऐसी हवा चली , बादल रूठ गए हैं ।।

Monday, 16 September 2019

दोहे ( रोद्र रस)

शिव ताण्डव  करने लगे ,
रूप हुआ  विकराल ।
राख सती जब हो गई
बने शिव  महाकाल ।।

दक्ष हुए भयभीत तब
रूप देख नटराज ।
थे आतंकित देव गण
प्रलय करे शिव आज।।

माँ के भक्त गणेश जी,
रोका शिव को,द्वार
किया अलग धड़ पूत का
क्रोधित हुए अपार।।

धूँ-धूँ लंका जल रही,न
दृश्य बड़ा विकराल।
करके रावण, सिय हरण
बुला लिया निज काल

दुर्गा माँ क्रोधित हुई ,
असुर करे आघात
महिषासुर को ,चीर कर,
किया बहु रक्त पात।

चीर द्रोपदी हरण से, बहे रक्त थे युद्ध ।

हुआ महाभारत फिर ,पाण्डव बहुत थे क्रुद्ध ।।

 पापी  शीश चक्र चले, कहे प्रभु मनुज भार

 जब मामा कंस बनते, श्री कृष्ण ले अवतार ।



दोहे (विभत्स)

लाल,लहूँ से थी धरा
मानव तन से राह ।
गुजर रहे बेफिक्र सब ,
नीची करे निगाह ।।

चिथड़ा चिथड़ा मांस था,
बदबू भरा शरीर ।
नर पिशाच था कौ'अधम
दिया मनुज को चीर ।।

मानव तन चिथडें पड़े,
बढ़ा रहे दुर्ग॔ध।
चील कौए नोंच रहे,
किए लोग दृग बंद ।।

चूस हाड़ कुत्ता  रहा ,
मक्खी चिपटी ल्हास।
गिद्ध फाड़ आँते रहे,
समझे भोजन खास ।।

आ गया वहाँ भेड़िया ,
लगा चबाने टांग ।
देख कैय करते सभी ,
गए मनुज सब भाग ।।

मुर्दा  सड़ता रह  गया ,
लगा न मानव हाथ ।
रे नर तू भी सोच ले ,
क्या जाएगा साथ?

कुकर्म जो भी नर करे,
कालिख मुख दो पोत ।
तन उसके कीड़े पड़े ,
निकट न आवे मौत  ।।

Saturday, 14 September 2019

शिक्षा अज्ञानी कर में

विधा - राधिका छंद 13/ 9

अशिक्षित गुरु से न मिले , ज्ञान की भिक्षा ।
कई स्कूल भी खुल गए , कौन दे शिक्षा ।।
आज अर्जुन तरस रहे , मिले द्रोण नहीं ।
हुए समाज दिशा हीन , दिखे कृष्ण नहीं  ।।

दिखता एकलव्य नहीं ,कहाँ शिष्य वो ?
गुरु बिना धनुर्धर हुए ,मान दे गुरु को  ।।
गुरु शिष्य परंपरा खत्म , नहीं गुरु वैसा ।
वेतन से नाता सिर्फ  , दौर ये  कैसा  ।।

शिक्षा अनपढ़ के हाथ  ,भाड़ फोड़  रही ।
अगर हो कमजोर नींव , बने महल नहीं ।।
फर्जी डिग्री से चले , आज स्कूल सभी ।
नित्य खिचड़ी पका खाय, रहे गुरू अभी ।।

भले बच्चे पढ़े नहीं , अंक हो बढ़ियाँ  ।।
यही इच्छा लील गई , फिजुल की खुशियाँ ।।
कैसे शिक्षा की दशा,,देश की सुधरे ।
कोई तो सवाल करे , आह अब न भरे ।।

उषा झा (स्वरचित )
देहरादून( उत्तराखंड )

दोहे ( शृंगार रस)

तुम बिन जीना है सजा , कुछ पल बैठो पास ।
जां निसार तुझपर करूँ, मुझपर कर विश्वास ।।

बने प्यार से नीड़ में , खिले प्रीत के फूल ।
टूटे अब न ख्वाब कभी , तेरे उड़े दुकूल ।।

तन तेरे स्वेत धवला, हृदय भरती प्रकाश ।
अधर से शहद पटकते , रूप बहुत है खास ।।

उँचा कद खड़ी नासिका, लगती बड़ी कमाल ।।
ग्रीवा सुराही लगता , हिरणी सी है चाल  ।।

तेरे  नैना  सीप  से ,  मन  लेते  हैं   मोह ।
मुख बिखरे काली घटा, करते उर विद्रोह ।।

जूड़े में सजा गजरा , करती तू मदहोश ।
लुभा रूप तेरा रहा ,किसको दूँ मैं दोष  ?

बोली मिश्री सी लगे , नैन कटीले बैन ।
झुकाती जब हो पलकें ,छिनती मेरा चैन ।।

नैनों में अजीब नशा, बढा रहे उन्माद ।
चितवन देख दिल पिघले , प्रेम रहे आबाद।।

जीना मुश्किल एक पल , कभी न जाओ दूर ।
संग-संग जीवन कटे , तुम जीवन का नूर ।।

   

Thursday, 12 September 2019

विरह

विधे :-  गीत
रस :- श्रृंगार ( वियोग )
छंद/बहर :- विजात छंद

भरा आँगन जिया रोता,
हृदय प्रीतम बसा होता।

मलय अब तन जलाता है,
नयन भी जल बहाता है।
सभी से पीर बस पाऊँ,
पिया तुम बिन न मर जाऊँ।

नयन कजरा धुला होता,
भरा आँगन, जिया रोता।

सखी गजरा सजाती है,
अधर लाली लगाती है।
सजाया रूप मत वाला,
रहा फिर भी बदन काला।

सजन अब सेज ना सोता
भरा आँगन जिया रोता ।

जले है तन बदन देखो,
लगी मन में अगन देखो।
सजन सावन रुलाता है,
नहीं मन चैन पाता है।

सजन अब सेज ना सोता ,
भरा आँगन,जिया रोता।

बिना साथी तरस जाता,
अकेले कौन जी पाता।
सजन ये बोझ जीवन है,
ह्रदय में सिर्फ क्रन्दन है।

विरह के बीज ही बोता,
भरा आँगन जिया रोता।