काफिया - ई
रदीफ - कर ली
विधा - गजल
2122 1212 22/112
मीत से थोड़ी' दिल्लगी कर ली ।
जिन्दगी यार फिर दुखी कर ली।
ठोकरों ने मुझे दिया हिम्मत ।
मंजिले हमसे दोस्ती' कर ली ।।
बात कोई अगर लगी दिल पर ।
जख्म पर फिर दवा तभी कर ली ।।
आरजू थी हसीन दिलबर हो ।।
जुस्तजू में 'आँखे नमी कर ली ।
शौक ऊँचे मकाम की थी' उसे ।
जब लगी चोट खुदकशी कर ली ।।
प्रेम नफरत स्वभाव में आया ।
सोच जैसी भी' जिस घडी कर ली ।।
ख्वाब पूरा नहीं किया रब ने ।
कुफ्र दिल में तभी घनी कर ली ।।
देश के संग क्यों किया धोखा ।
हसरते पाजी' क्यों बड़ी कर ली।
हाल देखो उषा जहाँ के अब ।
डूबती शाम सरवरी कर ली ।
*उषा की कलम से*
देहरादून
Thursday, 25 February 2021
Monday, 22 February 2021
मधुमय बसंत
विषय - बसंत
विधा गीत
दिन - सोमवार
दिनांक - 21.02.2021
उतर आया बसंत मोरे अँगना ।
कब घर आओगे परदेशी सजना ।
विरह वेदना भारी, छलके नयना ।।
घर पिछुआरे नित कूके कोयलिया ।
सबको मधुरिम गान सुनाती बगिया ।।
मुखरित है डाली डाली शुचि कलियाँ ।
लदे बोर पेड़ो में नव नव फलियाँ ।।
सौरभ पीकर बहके अलि तितलियाँ ।
पिय मग प्रीत छलकाती अखियाँ ।।
फिर से खिले सूर्ख गुलाब है अँगना ।
कब घर आओगे परदेशी सजना ।।
विरह वेदना भारी छलके नयना ...।
उतर आया बसंत ....
मधुबन रंग बिरंगे पुष्प निहारे
रोम रोम सुरभित कर रही बहारें ।।
लागे धरती पे यौवन खिला खिला ।
विषाद विहिन हृदय अब नहीं गिला ।
गेहूँ सरसों खेत करे गल बहियाँ ।
मदहोश भ्रमर छुपे देखो पँखुडियाँ ।।
चाहत सदैव उर प्रीतम पर मिटना
कब घर आओगे परदेशी सजना ।
विरह वेदना भारी छलके नयना ।
उतर आया बसंत म
बिहुँसकर चली मंद मंद पुरवैया ।
मलय संग ढलके सुधियों का आँचल।।
पिहू पिहू बोले पपिहरा बाग में ।
प्यासे नैन प्रियतम की बस लाग में ।।
राग रागिनी छेड़ रही मन वीणा ।
सजनी सजना के प्रेम चैन छीना ।।
घोल रहे बस जीवन में बहु रसना ।
कब घर आओगे परदेशी सजना ।
विरह वेदना भारी छलके नयना ।
उतर आया बसंत मोरे अँगना ।
शूल संग फिर भी गुलाब मुस्काता
मिटकर भी जगत में खुशबू लुटाता ।
हमें सीखना गुलाब सा प्रेम लुटाना ,
दो पल के जीवन से खुशी चुराना ।।
मधुमय यह मधुमास नहीं उर छलना
कब घर आओगे परदेशी सजना ।
विरह वेदना भारी छलके नयना ।
उतर आया बसंत मोरे अँगना ।
उषा की कलम से
देहरादून
विधा गीत
दिन - सोमवार
दिनांक - 21.02.2021
उतर आया बसंत मोरे अँगना ।
कब घर आओगे परदेशी सजना ।
विरह वेदना भारी, छलके नयना ।।
घर पिछुआरे नित कूके कोयलिया ।
सबको मधुरिम गान सुनाती बगिया ।।
मुखरित है डाली डाली शुचि कलियाँ ।
लदे बोर पेड़ो में नव नव फलियाँ ।।
सौरभ पीकर बहके अलि तितलियाँ ।
पिय मग प्रीत छलकाती अखियाँ ।।
फिर से खिले सूर्ख गुलाब है अँगना ।
कब घर आओगे परदेशी सजना ।।
विरह वेदना भारी छलके नयना ...।
उतर आया बसंत ....
मधुबन रंग बिरंगे पुष्प निहारे
रोम रोम सुरभित कर रही बहारें ।।
लागे धरती पे यौवन खिला खिला ।
विषाद विहिन हृदय अब नहीं गिला ।
गेहूँ सरसों खेत करे गल बहियाँ ।
मदहोश भ्रमर छुपे देखो पँखुडियाँ ।।
चाहत सदैव उर प्रीतम पर मिटना
कब घर आओगे परदेशी सजना ।
विरह वेदना भारी छलके नयना ।
उतर आया बसंत म
बिहुँसकर चली मंद मंद पुरवैया ।
मलय संग ढलके सुधियों का आँचल।।
पिहू पिहू बोले पपिहरा बाग में ।
प्यासे नैन प्रियतम की बस लाग में ।।
राग रागिनी छेड़ रही मन वीणा ।
सजनी सजना के प्रेम चैन छीना ।।
घोल रहे बस जीवन में बहु रसना ।
कब घर आओगे परदेशी सजना ।
विरह वेदना भारी छलके नयना ।
उतर आया बसंत मोरे अँगना ।
शूल संग फिर भी गुलाब मुस्काता
मिटकर भी जगत में खुशबू लुटाता ।
हमें सीखना गुलाब सा प्रेम लुटाना ,
दो पल के जीवन से खुशी चुराना ।।
मधुमय यह मधुमास नहीं उर छलना
कब घर आओगे परदेशी सजना ।
विरह वेदना भारी छलके नयना ।
उतर आया बसंत मोरे अँगना ।
उषा की कलम से
देहरादून
Sunday, 21 February 2021
मृदु राग अरु ज्ञान दे शारदे
दिग्पाल छंद मृदु गति
*शारदे वंदन
221 212 2 221 2122
हे हंसवाहिनी शुभफलदायिनी सुविमले ।
पद्मासना लिए पुस्तक शोभती सुकमले ।
संसार गह महाश्वेता रूप बुद्धि विद्या ।
जो शूर वीर पाते हैं शौर्य शक्ति आद्या ।
माँ हस्त शुचि कमंडलु ,गल हार काँचमणि है।
सौम्या निरन्जना से सौभाग्य भी अक्षुण है ।
सुरवंदिता विशालाक्षी हर गेह में पधारो ।
हे शास्त्ररूपिणी पद्माक्षी जगत सवारो ।।
माँ शारदा दया कर मम ज्ञान दो सुमाता ।
तेरी कृपा मिले तो सम्मान काव्य पाता ।।
है आस माँ तुम्हीं से बस लाज आप रखना।
आई शरण तुम्हारी बस नेह मातु करना ।।
वीणा जभी बजाती झंकृत हृदय सुरों से ।
करती अराधना माँ आशीष दो करों से ।।
भंडार प्यार का तो तुझमें भरा भवानी ।
संगीत सुर मयी दो वरदान आप दानी ।।
मृदु राग भर कलानिधि मम कंठ हो पुनीता ।
वागीश ने कृपा की वो रच सके सुगीता ।।
पदकंज आज दासी, ले आस माँ पड़ी है ।
माता पुकार सुन लो दृग नीर की लड़ी है ।
हो जीव मुक्त ईर्ष्या से ज्ञान चक्षु खोलो ।
दो विश्व भव्यता वीणा पाणि प्रीत घोलो ।।
आलोक दिव्य भर दो संसार आज विमला ।
ब्राह्मी महाभद्रा वाणी में विराज मृदुला ।।
*उषा की कलम से*
देहरादून
*शारदे वंदन
221 212 2 221 2122
हे हंसवाहिनी शुभफलदायिनी सुविमले ।
पद्मासना लिए पुस्तक शोभती सुकमले ।
संसार गह महाश्वेता रूप बुद्धि विद्या ।
जो शूर वीर पाते हैं शौर्य शक्ति आद्या ।
माँ हस्त शुचि कमंडलु ,गल हार काँचमणि है।
सौम्या निरन्जना से सौभाग्य भी अक्षुण है ।
सुरवंदिता विशालाक्षी हर गेह में पधारो ।
हे शास्त्ररूपिणी पद्माक्षी जगत सवारो ।।
माँ शारदा दया कर मम ज्ञान दो सुमाता ।
तेरी कृपा मिले तो सम्मान काव्य पाता ।।
है आस माँ तुम्हीं से बस लाज आप रखना।
आई शरण तुम्हारी बस नेह मातु करना ।।
वीणा जभी बजाती झंकृत हृदय सुरों से ।
करती अराधना माँ आशीष दो करों से ।।
भंडार प्यार का तो तुझमें भरा भवानी ।
संगीत सुर मयी दो वरदान आप दानी ।।
मृदु राग भर कलानिधि मम कंठ हो पुनीता ।
वागीश ने कृपा की वो रच सके सुगीता ।।
पदकंज आज दासी, ले आस माँ पड़ी है ।
माता पुकार सुन लो दृग नीर की लड़ी है ।
हो जीव मुक्त ईर्ष्या से ज्ञान चक्षु खोलो ।
दो विश्व भव्यता वीणा पाणि प्रीत घोलो ।।
आलोक दिव्य भर दो संसार आज विमला ।
ब्राह्मी महाभद्रा वाणी में विराज मृदुला ।।
*उषा की कलम से*
देहरादून
जिन्दगी फूल है शूलों से भरी रहती है
2122 1122 1122 22
काफिया - ई
रदीफ - रहती है
जिन्दगी फूल है शूलों से भरी रहती है ।
राह मुश्किल है मगर फिर भी खुशी रहती है ।।
जुल्म की खत्म हदें कत्ल हुआ रिश्तों का ।
पीर इतनी है कि अब नींद खुली रहती है।।
और इंसान परेशान हुआ जाये अब ।
कितने खतरों में घिरी अपनी गली रहती है ।।
ये निगाहें ही करें रोज ही छलनी उसको ।
घर में रहती है मगर फिर भी डरी रहती है ।।
शर्म बेची है निजी स्वार्थ हुआ है हावी।
क्यों बुराई ये तेरे दिल में घुसी रहती है ।।
हद से बाहर तू कभी भी नहीं होना जालिम ।
राख में भी तो कहीं आग छुपी रहती है।
ख्वाहिशें खुशियों' की रखते हैं जमाने में सब ।
पर उषा बेरुखी' से रोज़ दुखी रहती है ।
जिन्दगी फूल है शूलों से भरी रहती है
राह मुश्किल है मगर फिर भी खुशी रहती है
उषा झा देहरादून
काफिया - ई
रदीफ - रहती है
जिन्दगी फूल है शूलों से भरी रहती है ।
राह मुश्किल है मगर फिर भी खुशी रहती है ।।
जुल्म की खत्म हदें कत्ल हुआ रिश्तों का ।
पीर इतनी है कि अब नींद खुली रहती है।।
और इंसान परेशान हुआ जाये अब ।
कितने खतरों में घिरी अपनी गली रहती है ।।
ये निगाहें ही करें रोज ही छलनी उसको ।
घर में रहती है मगर फिर भी डरी रहती है ।।
शर्म बेची है निजी स्वार्थ हुआ है हावी।
क्यों बुराई ये तेरे दिल में घुसी रहती है ।।
हद से बाहर तू कभी भी नहीं होना जालिम ।
राख में भी तो कहीं आग छुपी रहती है।
ख्वाहिशें खुशियों' की रखते हैं जमाने में सब ।
पर उषा बेरुखी' से रोज़ दुखी रहती है ।
जिन्दगी फूल है शूलों से भरी रहती है
राह मुश्किल है मगर फिर भी खुशी रहती है
उषा झा देहरादून
Sunday, 14 February 2021
आह में मधुकर
आनंद छंद ये मात्रिक लय युक्त छंद है ।
2122 212
रात देखो चाँदनी।
नाचती है मोरनी ।।
झूमती कलि बाग में ।
आज भँवरे राग में ।।
चातकी सी नैन में ।
आस सजती रैन में
स्वर्ण किरणें भोर में
मोद मन आलोक में।
तितलियों की चाह में
भृंग सारे आह में ।
हो कली अब अंक में ।
रात मधुकर पंक में ।।
भ्रम का मन अंश हो ।
वेदना के दंश हो ।
मन वियोगी द्रोह में ।।
स्वप्न खोये शोर में
रात काली भी ढले
प्रेम सच्चे बस मिले
धीर धरते जो सदा
शूल दिल से हो जुदा
*उषा की कलम से
2122 212
रात देखो चाँदनी।
नाचती है मोरनी ।।
झूमती कलि बाग में ।
आज भँवरे राग में ।।
चातकी सी नैन में ।
आस सजती रैन में
स्वर्ण किरणें भोर में
मोद मन आलोक में।
तितलियों की चाह में
भृंग सारे आह में ।
हो कली अब अंक में ।
रात मधुकर पंक में ।।
भ्रम का मन अंश हो ।
वेदना के दंश हो ।
मन वियोगी द्रोह में ।।
स्वप्न खोये शोर में
रात काली भी ढले
प्रेम सच्चे बस मिले
धीर धरते जो सदा
शूल दिल से हो जुदा
*उषा की कलम से
Saturday, 13 February 2021
आ जाओ मनमीत
गीत
16/ 14
जम रही धूल अब सुधियों के,ले लो मुझे पनाहों में ।।
जल रही मनमीत सदियों से , दम निकले हैं आहों में ।।
जीवन दीया के मैं बाती ,,प्रियतम तुम घृत बन जाना ।।
आस न बुझने देना अपना, प्रेम दीपक इक जलाना ।।
मिलके सुख दुख सिर्फ बाँट लूँ ,हो नेह छाँव बस अँगना
निशि दिन सजन प्रतीक्षा तेरी, प्रेम सुधा मुझको चखना ।
चाहत दिल में बस यही चलूँ ,संग प्रीत के राहों में ।।
जम रही धूल अब सुधियों के ले लो मुझे पनाहों में ।।
प्रेम अगन में जलती निशि दिन,आँधी बुझा नहीं डाले ।
डरती दुनिया के नजरों से,, दिल जग में सबके काले।।
आ थाम एक दूजे के कर ,प्रणय धार में बह जाए ।।
विरह वेदना भारी दिल में , नैनन गगरी भर जाए ।।
तड़प रहा तन मन बरसों से, छलके पीर निगाहों में ।।
जल रही मनमीत सदियों से , दम निकले हैं आहों में।
नारी तो बाती होती है,, सदा पुरुष ज्वलन शक्ति है।
एक दूजे बिन हम अधूरे,,द्वय उर भरे आसक्ति है ।।
संग पिया हो चमके अपने, निशि दिन सितारे आसमां ।।
प्रीतम यादों को रौशन करना ,गिन रही तारे आसमाँ ।।
छोड़ गए जबसे साजन हो,नयन बहे इन माहों में ।।
जल रही मनमीत सदियों से ,दम निकले हैं आहो में ।
प्रेम सुधा नित झर झर झरते,शुचि नेह पथ प्रशस्त करे ।
नर बिना नारी है अधूरी,, बिन प्रिये दृग निर्झर झरे ।।
युग युग से प्रियतम भटक रही , तेरी करूँ बस प्रतीक्षा ।।
फैला कर आँचल माँग रही,प्रीत दान की अब भीक्षा ।
सत्य सृष्टि द्वय हृदय मिलन से,उर कली खिले बाँहों मे।
जम रही धूल अब सुधियों के , ले लो मुझे पनाहों में ।।
उषा की कलम से
देहरादून उत्तराखंड़
मैं उषा झा यह घोषणा करती हूँ कि यह मेरी स्वरचित, मौलिक ,
महि पर पधारो रघुवर
योग छंद
12/ 8 अंत 122 से अनिवार्य
हे रघुनंदन महि पर , आज पधारो ।
माँ बहनों की अब तो , लाज बचाओ ।
शत्रु घनेरे छलते , आज सुता को
रावण रूप बदल के ,हरे सिया को ।
दानव बने मनुज ये, शोणित पीते ।
संहार करो प्रभु ये, क्यों कर जीते ।।
जग को मर्यादा का , पाठ पढाओ ।
हे रघुनंदन महि पर, आज पधारो ।
माँ बहनों की अब तो,लाज बचाओ।
राम पिता की आज्ञा ,से वन धाये ।
ऐसे पूत कहाँ इस, जग पितु पाये ।।
तज गए कलयुगी , पूत प्यारे ।
वृद्धाआश्रम बैठे , बाँट निहारे ।।
बहते अश्रु मातु के, मान दिलाओ ।
माँ बहनों की अब तो,लाज बचाओ।
हे रघुनंदन आज महि पर,आज पधारो।
बनते बैरी भाई , रिश्ते भूले।
टूटी मन की शाखें ,कैसे फूले।।
छलते दीनों को ये, हुए अभागे ।
स्वार्थ हुआ हाबी ,नीति त्यागे ।।
रोते दीन हीन के, धीर बँधाओ ।
हे रघुनंदन महि पर , आज पधारो ।
माँ बहनों की अब तो , लाज बचाओ ।
*उषा की कलम से*
देहरादून
12/ 8 अंत 122 से अनिवार्य
हे रघुनंदन महि पर , आज पधारो ।
माँ बहनों की अब तो , लाज बचाओ ।
शत्रु घनेरे छलते , आज सुता को
रावण रूप बदल के ,हरे सिया को ।
दानव बने मनुज ये, शोणित पीते ।
संहार करो प्रभु ये, क्यों कर जीते ।।
जग को मर्यादा का , पाठ पढाओ ।
हे रघुनंदन महि पर, आज पधारो ।
माँ बहनों की अब तो,लाज बचाओ।
राम पिता की आज्ञा ,से वन धाये ।
ऐसे पूत कहाँ इस, जग पितु पाये ।।
तज गए कलयुगी , पूत प्यारे ।
वृद्धाआश्रम बैठे , बाँट निहारे ।।
बहते अश्रु मातु के, मान दिलाओ ।
माँ बहनों की अब तो,लाज बचाओ।
हे रघुनंदन आज महि पर,आज पधारो।
बनते बैरी भाई , रिश्ते भूले।
टूटी मन की शाखें ,कैसे फूले।।
छलते दीनों को ये, हुए अभागे ।
स्वार्थ हुआ हाबी ,नीति त्यागे ।।
रोते दीन हीन के, धीर बँधाओ ।
हे रघुनंदन महि पर , आज पधारो ।
माँ बहनों की अब तो , लाज बचाओ ।
*उषा की कलम से*
देहरादून
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