Saturday, 29 May 2021

जब बिसराया गाँव को

शहर की चका चौंध भायी, गाँव को छोड़ गए सारे ।
ऐश में गेह भूल जाते ,मातु पितु पंथ बस निहारे।।

जहाँ ने घाव दिया गहरा,उसे कण कण को तरसाया ।
दुखी वह रोटी कपड़ा से, मिली ठोकर घर को आया ।।
मलिन मुख आँख धँसी उनकी ,चेहरे बन गए छुहारे ।
शहर की चका चौंध भायी , गाँव को छोड़ गए सारे ।।

जिन्दगी भीख माँग कटती, आपदा लील गई खुशियाँ ।
रोग परिणाम भयावह है, हुई गम में घायल दुनिया।।
विकल बेमोल जिन्दगी है, झरे नैन से नित्य धारे ।
ऐश में गेह भूल जाते , मातु पितु पंथ बस निहारे ।।

घड़ी मनहूस जगत आई, छीन कर साँस दिल दुखाते ।
क्षुब्ध मन आशंकित रहता , डोर अपनों से छुट जाते।।
फँसे जब लोग आपदा में , छा रहे नैन अंधियारे ।।
शहर की चका चौंध भायी , गाँव को छोड़ गए सारे ।।

विवश एकांत वास को जग, हर्ष अरु विषाद वो भूले ।
मौन स्तब्ध जिन्दगी ठहरी , नहीं वो सावन के झूले ।
आह आई न जगत में इस, बार वो मृदुल सी बहारे।
ऐश में गाँव भूल जाते , मातु पितु पंथ बस निहारे ।।

खत्म प्रभु अब ये दौर करो,आस के बीज धरा बो दो
रोग महामारी से आतप मन, रोग बीज को ईश रों दो ।
द्वार पर अतिथि सत्कार हो,प्रेम से नित चरण पखारें
ऐश में गाँव भूल जाते , मातु पितु पंथ बस निहारे ।।



प्रो उषा झा देणु
देहरादून

Thursday, 27 May 2021

पीर नदी की


सागर से मिलने को बीहड़, डगर नदी बलखाती ।
सच करने को सपने वह तो, दर दर ठोकर खाती

राह कठिन संकल्प नदी हिय,उदधि मिलन बस मन में ।
पर्वत की बेटी शूल लिए ,बहती निर्जन वन में ।
बाँटे राही दुख सुख गर तो, खुश हो प्यास बुझाती ।।
सागर से मिलने को बीहड़ , डगर नदी बलखाती ।।

चोट शिला से जब जब खाती, शोर बहुत ही करती ।
पीर भरे उर गीत सुनाती,कल कल करती बहती ।।
सागर से मिलने के खातिर , हर दुख वह सह जाती ।
सच करने को सपने वह तो ,दर दर ठोकर खाती ।।

सींच खेत खलिहान मुदित वह , बिन नीर नदी रोती।
क्षुब्ध नदी दोहन से अपने ,अस्तित्व नित्य खोती ।।
प्रदुषित जल जलयान चलाया, बंधन बस तरसाती ।।
सच करने को सपने वह तो , दर- दर ठोकर खाती ।

अपने संग बहा ले जाती , पाप सभी के गंगा ।
घायल उर मल मूत्र डाल के ,लेते मानव पंगा ।
पन बिजली से सूखी नदिया, बूँद बूँद ललचाती ।
सागर से मिलने को बीहड़ , डगर नदी बलखाती

बाँध पोटली हिम्मत वाली, तटिनी चलती राहों में ।
बढ जाती परमार्थ कर पियु , सपन सजे बाँहों में ।।
ढोती संग जडी बूटी वह, सींच खेत हर्षाती।
सागर से मिलने को बीहड़ ,डगर नदी बलखाती ।।
*प्रो उषा झा रेणु*
देहरादून उत्तराखंड

रोम।रोम में राम विद्यमान हो

विथा - गीत

🌷रोम रोम में राम बस विद्यमान हो🌷

राम राज्य की कल्पना साकार हो,इस जगत में राम नाम का गुण गान हो ।
रोम रोम में राम बस विद्यमान हो, मेरे संग हर घडी कृपा निधान हो।।

राम सार्वभौम सृष्टि के वरदान है ।
राम अभिमान है महि के सम्मान है ।।
राम पुनीत प्रीति के बस आधार है ।
हर युग रघुकुल दिप्ति दीप दिनमान है ।
भक्ति निस्काम करूँ कर्म अपना करूँ ।
राम विनती सुनो उर शुचि भावना हो ।

रोम रोम में राम बस विद्यमान हो , मेरे संग हर घडी कृपा
निधान हो ....।

राम से सिर्फ आस और विश्वास है ।
दुखियों के भक्त वत्सल सदा दास है ।
राम नाम की महिमा अपरम्पार है ।
भक्तों पर नेह राम का कुछ खास है ।।
राम संस्कार में आचार अरु विचार में ।
हृदय में है आस्था पूर्ण साधना हो ।।

रोम रोम में राम बस विद्यमान हो , मेरे संग हर घड़ी कृपा निधान हो ।

राम सुर संगीत है मन के राग है ।
सबके उर में बसे प्रेम अनुराग है ।
राम नाम से ही पावन संसार है ।
राम जग बाग के मृदु पुष्प पराग है ।
उर उमंग उल्लास अरु अमृत धार है ।
नाम रटते रहो अधर पर मुस्कान हो ।

रोम रोम में राम बस विद्यमान हो , मेरे संग हर घडी कृपा
निधान हो ।

जग ज्योतिर्गमय राम दिव्य प्रकाश है ।
राम से समग्र वसुधा पर विलाश है।
विरक्त मोह से वह वैराग व त्याग है ।
पतझड जीवन में खिले गुल पलाश है ।।
राम कण कण में क्षण क्षण में व्याप्त दिखे ।
अधर पर सदैव राम शुभकामना हो

रोम रोम में राम बस विद्वमान हो , मेरे संग हर घडी कृपा
निधान हो ।

सत्य निष्ठा मर्यादा के प्रतिमान हैं ।
राम सद्भाव है सिर्फ क्षमादान है ।
जग जानते राम ईश के अवतार हैं ।।
सदियों से उर की बस यही याचना है।
राम राज्य की कल्पना साकार हो , राम का नित्य ही गुण गान हो ।

प्रो उषा झा रेणु
देहरादून 

सतरंगी सपने

विधा -छंद मुक्त
18/13
 दिवस पखेरू उड़ने को आतुर , देख मैं तो वहीं खड़ी ।
सोलह बरस की बाली उमर में, चितचोर से आँख लड़ी ।।

राग अनुराग हिय, प्रीत नयन में, सतरंगी सपने सजे ।
पोर पोर उमंग, लगी बहकने, मुदित निशि पियु देख लजे ।
चढा झील से नैनों का जादू ,धड़कन फिर बढ़ने लगी ।
छोड़ किताबें सजन पथ हेरती ,प्रेम अगन जलने लगी ।
तुम कहते पढ लिख बालिके चढो,उत्तुंग गिरि थाम छड़ी।
सोलह बरस की बाली उमर में, चितचोर से आँख लडी।

दिल का लगाना बड़ी बात नहीं, थाम कर जीवन भर ले,
हर प्रेमी को ये सामर्थ्य नहीं, शत प्रीत के पुष्प खिले ।
अधर मुस्कान मृदु सजन सजाये,सोच कर नयन गुलाबी ,
नैनों में वो मद भरी ख्वाहिशें, मुदित उर हुस्न शबाबी।
चाहत के रंग भरे जो उर में , लगी प्रीत की मृदु झड़ी ।।
सोलह बरस की बाली उमर में , चितचोर से आँख लड़ी ।

शनैः शनैः गुजर गए वक्त मृदुल,शुचित प्रेम हमारा है ।
देख मेंहदी कर में गाढ़ी है , सत्य प्यार तुम्हारा है।
स्मित स्नेहिल स्पर्श मुग्ध रोम रोम, सुरभित गात मेरा है।
युग युग से मिलने आती धरती, मन में आस तेरा है।
ख्वाबों की ताबीर लिए सूनी , सेज गुमसुम आज पड़ी ।
सोलह बरस की बाली उमर में , चितचोर से आँख लड़ी ।
प्रो उषा झा रेणु
देहरादून

Wednesday, 26 May 2021

सावन अगिन लगाए

हृदय प्रीत से भरा सखी री, मेरे प्रिय परदेश सिधाए ।
घनन घनन घन मेघा बरसे,बैरी सावन अगिन लगाए ।।

दमके दामिनी विकल निशीथ,मनुवा मोरा धड़क रहा है ।
आई कैसी रात सुहानी ,अंग अंग बस फड़क रहा है ।।
आओ सजन पास आ जाओ , कारी रैना मुझे डराए ।
घनन घनन घन मेघा बरसे ,बैरी सावन अगिन लगाए ।।

बागों में कोयलिया कूके , जियरा सजन प्रणय में भूले ।
सखियाँ मिलके कजरी गावे, पिया संग सब पींगे झूले ।।
मिलन पिपासा नदिया बाढ़े, नैनन बरबस नीर बहाए ।
घनन घनन घन मेघा बरसे ,बैरी सावन अगिन लगाए ।।

गोरे कर मेंहदी रची है, शुचि शृंगार पिय को रिझावे ।
खो गया चैन मोर हिया के,तुम बिन मुझको नींद न आवे।
आस चकोरी मिलन सखी री,आकुल नैना भर भर आए।
घनन घनन घन मेघा बरसे,बैरी सावन अगिन लगाए ।।

जा रे बदरा अब जिय न जला,विरहा दंश लगे बहु भारी
ओ री पवन पियु को बुलाओ,किछु न भावे विरह की मारी।
आस हृदय के टूट रही है , मोर पिया घुरि देश न आए।
घनन घनन घन मेघा बरसे बैरी सावन अगिन लगाए

ज्यूँ ही पधारे पियु सखी री,मन आंगन में खुशियाँ बरसे ।।
सच हो सारे मोर सपनवां, प्रीत सुहावन उर में सरसे ।।
आलिंगन में सजन झुलाए ,उर के सारे दुख बिसराए ।
घनन घनन घन मेघा बरसे ,बैरी सावन अगिन लगाए ।।

*प्रो उषा झा रेणु*
मौलिक ( प्रकाशित )ऑ
देहरादून

Tuesday, 25 May 2021

सबरी उर रघुनंदन

विधा - मोदक छंद
विधान - 4 ×भगन
गणावली  211 /4
211   211   211  211

व्याकुल नैन करे नित बंदन।
थे शबरी उर में रघुनंदन ।।

राम सिया मुख दर्शन हो कब।
पंथ निहार रही शबरी  अब ।।
जीवन श्री चरणों पर अर्पित ।
हो तप पूरण वो नित सोचत ।।
जन्म सुपावन हो हरि दर्शन ।
व्याकुल नैन करे नित बंदन ..।

राम सिया दृग देख पधारत।
आस भरे उर हर्षित नाचत।
भाव भरे हिय बैर चखावत  ।
प्रेम अनूप लगे मन गावत ।।
पाप मिटे करते मुख दर्शन ।
व्याकुल नैन करे नित बंदन..।

राम सिया भव बंधन काटत ।
मुग्ध जिया बस आज निहारत।।  
मोदित है मन  नैन जुड़ावत ।
हर्ष भरे, मन नीर  छिपावत ।
 राह दिखावत हैं दुखभंजन ।।
व्याकुल नैन करे नित बंदन.. ।

श्यामल रूप लगे मन भावन ।
ईश धरे पग शबरी घर पावन ।।
राम सिया जप के कटते दिन ।।
जन्म सुकारथ है अब भीलन ।
ज्यूँ रघुवीर बसे दृग अंजन ।।
व्याकुल नैन करे नित बंदन ।।
*प्रो उषा झा रेणु*
देहरादून उत्तराखं

यादें सुनहरी

गीत

स्मृति पट पर है याद घनेरी
बीत गए वो वक्त सुनहरी ।।

श्वासों के सरगम महकाते ।।
ओ पलछीन कौन भुला पाते ।
क्षण में मुस्कान सजा जाते ।
सपनों में उर सहला जाते ।।
डर डर जीती निशा अँधेरी ।
स्मृति पट पर है याद घनेरी ।।

विरहा के दिन गिन गिन कटते ।
तुम बिन प्रियवर रैन न सजते ।।
भूल बता दो तुम हरजाई ।।
मेरे हिस्से क्यों तन्हाई ।।
धड़कन की बजती रण भेरी ।

देख रही हूँ राह तुम्हारी ।
देखो आकर दशा हमारी ।।
छुपकर बैठे कहाँ बिहारी ।
नैन बहे हैं नित गिरिधारी ।
विरह वेदना क्षण क्षण घेरी।

ख्वाबों सा वो दिन था अपना।
जीवन लगता हर पल सपना ।।
मनुहार बिना उदास रैना ।
भूल गए हो क्यों कर मैना ।।
विकल जिन्दगी तुम बिन मेरी

स्मृति पटल पर है याद घनेरी
बीत गए वो वक्त सुनहरी ।।


*उषा की कलम से*
देहरादून