Sunday, 9 June 2019

बोल मिश्री बोल

विधा- आधार छंद
16/11 (गाल)

लिपटे शब्द हो चाशनी में , हृदय सभी ले जीत
भाव भरे मधुरिम लफ्जों में, जग बन जाए मीत

नाद सृष्टि में है निहित यही,,, शब्द ब्रह्म है ओम
कटु बोल कोप के हैं कारण,, मधु बोल झरे सोम
शब्द शब्द के योग से बने  ,, सभी धर्म के ग्रंथ
अलग अलग है रूप शब्द के,,सबके अनेक अर्थ
कुटिल बोल से द्वेष बढ़े हैं ,,मिष्टी शब्द से प्रीत
भाव भरो मधुरिम....

मिश्री बोल जोड़ते दिलों को,,विष वाणी दे पीर
कड़वी भाषा व्यथित करे जब ,,नयन भरे तब नीर
मधुर वाणी शीतल छाँव दे ,,हृदय खिले फिर फूल
दुख हो या सुख सब मौसम में, मनुज रहे अनुकूल
घोल वचन में मिठास गाते,, रहें सब प्रेम गीत
भाव भरे हो मधुरिम..

शब्द शारदा की वीणा का , है अनुपम उपहार
मुरली की धुन में मुखरित है ,, शब्द प्रेम श्रृंगार
नाप तौल कर बोल मनुज यूँ ,निकले न भूल चूक
अज्ञान की पट्टी बाँध, कभी  ,, बैठ न बनकर मूक
घायल करे अंतर्मन,शब्द ,,   शस्त्र लगते प्रतीत
बहे ज्ञान गंगा वाणी में,,बदले जग की रीत

लिपटे शब्द हो चाशनी में, हृदय सभी ले जीत
भाव भरे मधुरिम लफ्जों में, जग बन जाए मीत

Saturday, 8 June 2019

अप्पन गाम

भाषा-- मैथिली

रहि रहि मोन पडैये
अप्पन मिथिला गाम
मिठगर बोली सुनैय
लेल कान ललाबैये

ओ आमक गाछी मे
 टिकोला चुननाय
आ सखी संग अंगने अंगने
छीछयौनाय सब मन परैये

ओ आमक बाड़ी मे
ओगरहवाक मचान
पर नून ब्लेडक संग
टिकोला क पतासी खेनाय
ओकरे घैयला सँ पानि पिनाय
सब किछु मन पडैया

सखी संग नैना में
गामक गली गली
दौडनाय मन पडैये
अंगने अंगने नवकनिया
 देखऽक उल्लास
माछक झोर,माझक चोखा
 बाड़ी क साग तिलोकडक
तरूआ लेल जी ललचैयये
अम्मट के स्वाद आब ओ कहाँ
गामक रस आब ओ कहाँ

पोखरी मे लऽ केराक डोर
 तैरय में सखी संग होड़
खेत खलिहानक
सरसों तिसीक फूल
देखि मन केतक
लुभा जायत छल
आययौ मन तरसैये

माटिक महादेव
दसमी में बनाबऽ
के कम्पीटीशन
कार्तिक मास मे
तुलसी लग दी
अनगिनत जरेनाय
समृति पटल पर
एखनौ सब किछु
 विद्यमान अछि

सामाचकेबाक गीत
गुनगुनाबऽक काल
दूई बूँद अश्रु आखिं सऽ
सब साल ढलकि जाययै

अप्पन संस्कार अक्षुण
एखनौ धरि राखनै छी
मुदा बच्चा सब के वो
पावैनक अनुराग
मूलभूत संस्कृति सऽ 
परिचय देबाक अकथ
प्रयत्न में समय बितैयये

उषा झा  (स्वरचित)
उत्तराखंड  (देहरादून)




 

Wednesday, 5 June 2019

कुपित पर्यावरण

दूषित न हो पर्यावरण  ,लगा मनु वृक्ष रोज ।
लील गए कंक्रीट वन, गया धरा का ओज   ।।

झील नदी  सूखीं सभी,,, वृक्ष कुपित बिन वारि ।
घन गरज के लौट गए,,,मनवा है बेजार  ।।

जब बारिश होगी नहीं, जग में पड़े अकाल ।
खग पशु सब प्यास से, होते हैं बेहाल ।।

जब धरा से पेड़ कटे ,दरक गए फिर नींव ।
क्रुद्ध हैं सूरज इतने ,,जल रहे सभी जीव  ।।

पशु पक्षी बिन छाँव के,,बढ़ी फ्लेट की भीड़ ।
पंछी के झुण्ड भटके ,बने कहाँ अब नीड़  ।।

सुनो प्रकृति की चेतावनी, करते न व्यर्थ न नीर ।
जीव तरस जल बिन रहे ,खग, पशु हुए अधीर  ।।

डूब गए सब, स्वार्थ में, जग का हुआ विनाश ।
परिवर्तन जलवायु का, खतरा न बने काश ।।

कार्बन डाईक्साईड ,हो न खपत विशेष  ।
होगी फिर सृष्टि विलुप्त ,बचे न जीवन शेष ।।

जहरीली गैस घुलता ,गया मनुज के सांस  ।
है कमी आँक्सीजन की ,मृत्यु मुख के पास ।।

विकास के मोह में करे,वृक्ष काट कर भूल ।
होता प्राकृतिक आपदा ,ये ही कारण मूल  ।।

विलुप्त सौन्दर्य महि के ,बदले हैं जलवायु  ।
प्रकृति लील न कर कोई,लगा तरु सब शतायु ।।

रहे सुन्दर धरा तभी ,,  जल का करो बचाव ।
लगा पौधे यत्र तत्र ,, मिले सभी को छाँव ।।

पेड़ देता शुद्ध हवा ,,काट न वृक्ष अब क्रूर ।
प्रचुरता आँक्सीजन की , रखे रोग से दूर  ।।

हरी भरी वसुन्धरा में ,, गा रही नदी गीत  ।
पर्वत व कानन कुसुमित ,हृदय लिए हैं जीत ।।

परजीवी(मशक)

विधा - कविता

ओ परजीवी तुम हो बडें नटखट
कान में मेरे करते रहते खट पट
जहाँ भी जाती आ जाते झटपट

छुपा था मच्छर हरे भरे कानन में
मखमली घास में गुम थी सोच में
जाने कहाँ से आ गया घात करने
देख भी नहीं पाई छुप गया वस्र में
काट के उड़ जाते हरे घासों में फट
जहाँ भी जाती आ जाते तुम झटपट

मुग्ध मन,तृप्त नयन थे हरी भरी कूँज में
ढूँढ़ रहे थे खुद को इस व्यस्त जहांन में
निखट्टू मच्छर ने कर दिया मुझे परेशान
आ गई मैं अपने कुन्बे में उल्टे पाँव लौट
हुआ खिन्न मन चुभाया इतना दाँत जो दुष्ट
जहाँ भी जाती आ जाते हो तुम झटपट

खट्टा मन लेकर फिर चली गयी बिस्तर में
अधखूली पलके खोयी रंग भरे सपनों में
क्षण में नींद उचट गई भन भन के गूँज से
खून पी कर मच्छर तो मस्त गुनगुनाने में
क्रोध की ज्वाला में बोल रही मैं अंटशंट
जहाँ भी जाती आ जाते हो तुम झटपट

बिमार न हो कोई मन लीन आशंका में
लगी डी डी टी का छिड़काव कराने में
चिकनगुनियां टायफाइड टांग न पसारे
आस पास की सफाई करा रही थी झट
ओ परजीवी हो जाओ आज समूल नष्ट
जहाँ भी जाती आ जाते हो तुम झटपट

ओ परजीवी तुम हो बड़े नटखट
कान में मेरे करते रहते खट पट

रेत सी जिन्दगी

विधा--गीत

रेत  जिन्दगी भी फिसल गई
नदियाँ के तीर मैं तन्हा रह गई

पत्थरों व लहरों के द्वन्द में
बनता गया मेरा अस्तित्व
बरसों सागर के थेपेड़ो में
तलाश रही अपने मनमीत
पाँव तले सब क्यों गए  रौंद
दर्द मेरी रूह को तड़पा गई
तृष्कृत होके भी अचल रह गई
नदियाँ के तीर मैं तन्हा रह गई  ....

बेजान समझ लोग अक्सर
मुट्ठी में कैद करना चाहे मुझे
पर फिसल जाती बिखर कर
आस दिलाते, छू लेते स्नेह से
कोई लिख लेते नाम मुझ पर
तृषित नयन मेरे मुग्ध हो गए
चीर मिलन पर अधूरी रह गई
नदियाँ के तीर मैं तन्हा रह गई  ....

ख्वाहिशों के मेरे भी लगते पर
प्रीत का चोखा रंग चढ़े मरु में
सोने सा मैं जाऊँ निखर निखर
अरूणिमा उषा की मन चुरा गई
मलय मदहोश कर उड़ा ले गए
क्षण में पर बिखर कर रह गई
रेत सी जिन्दगी भी फिसल गई..
 
कुन्दन बनूँ कर्म की भट्ठी तपकर 
बना दूँ घर ईंट गारे संग मिलकर
चाँद सितारे से जगमग करे छौना
सजा दूँ मैं घर संसार कोना कोना
नकाब उतारना लोगों का भा गई
भूल उनकी सदा माफ कर गई
रेत सी जिन्दगी भी फिसल गई
नदियाँ के तीर मैं तन्हा रह गई...

 

Sunday, 2 June 2019

अनमोल सीख

आसमां मद में चूर ताने सीना
दिए जो प्रकृति नौ ग्रह नगीना ।
रवि रश्मि सजाते हैं मेरे अंगना
मेरेअस्तित्व के आगे बहे पसीना   

सारे संसार का छतरी कहलाता
नीले बादल मेरा रूप निखराता
सूरज चंदा तारे रहते मेरी पनाह में
इन्द्रधनुष के रंग मन को लुभाता

देखकर पंछियों के जोड़े उड़ते
आसमान के हृदय बहु पिघलते
इतने निधियों को पाके वो उदास
बरबस हीं उनके दृग से बूंदे बरसते

बिन साथी जिया न जाता किसी से
रोज शाम मिलने चले आता धरा से
चकित कर जाता आसमां प्रकृति को
क्षितिज मुग्ध मिलन के बिहंगम दृश्यों से ..।

भ्रम ही सही मिले दो पल की खुशी
बादल की अटखेली लगे सबसे हँसी
घन गर्जन से आगोश में सहमी निशा
चमकते हैं वितान पर रवि और शशि

तरसी धरणी बिन नीर देखे कातर दृग से
भेज दे बादल को बूँदें लेकर जल्दी से
अंतहीन आकाश में जड़ चेतन समाया
पाके ऊँचाई दिग्भ्रमित न हो मनु कर्म से

जीवन की अनमोल सीख मिले व्योम से

Saturday, 1 June 2019

बबूल

विधा- दोहे

तपते रेगिस्तान में,,, मैं हूँ खड़ा बबूल  ।
जैसा भी मौसम रहे ,, सब है मुझे कबूल ।।

अंग-अंग काँटे भरे हैं ,,फिर भी न बहे नीर ।
परहित सोचूँ  हर घड़ी, सहकर खुद की पीर ।।

सावन या भादो रहे,,, करूँ न कोई शोर ।
इतनी भी नाजुक नहीं,,हो जाऊँ कमजोर ।।

जीवन चाहे दे मुझे ,,,,चाहे कितने शूल ।
फिर भी मैं देता रहूँ ,,,,पीले-पीले फूल ।।

माघ महिने सर्वप्रथम,,लगता फल वृक्ष शाख।
दस माह अंतराल पे ,,,पक जाता बैशाख ।।

जी लूँ रेत कंकड़ या ,,ताल, नदी के तीर
विरान में खड़ा रहकर ,,नहीं होता अधीर

लगाए जो बबूल, मत ,,, कर उस पर उपहास
हूँ बहुत काम का, करो,,,दिल से सब विश्वास

फूल पत्ते फल गोंद सब,,, औषधि का है खान
कण कण प्रयोग रोग में ,,,बबूल है वरदान

जख्म भरे,सब लगाओ,,, कूट कूट के छाल
दंत बनाते हैं सुदृढ़  ,,,, गुणकारी हैं डाल

लगा खेत के मेड़ पर ,,, रोक लो सब कटान
मरू में पशु का चारा ,,,  हूँ मैं उनकी जान

तुच्छ समझ न मनुज मुझे ,,सब कोई पहचान
 साक्षात निवास मुझ पे,,,करे, विष्णु भगवान