Sunday, 30 September 2018

तन शूचि रहे

विधा- राधिका छंद

तुम हमें खुशी दो न प्रभु ! पीर दे देना      1.
राह जब भी मुश्किल लगे,धीर दे देना
बिखरे हैं हर ओर कंश ,रक्षा तू करना
दिल में चुभाते हैं दंश,नेह तुम करना

मेरी छुट गई पतवार, तुम प्रभु उबार     2.
खो गई है मंजिल मेरी,दे ख्वाब का घर
दुख दो मुझे कितने ही ,मन कभी भटके
वर देना हमें इतना ,  शीश रहे झुके

प्रभु जी कुछ ऐसा करूँ, ज्ञान मुझे मिले    3.
शब्द अलंकृत हो उर में, फिर छंद खिले
गीत गाऊ मीठा जिसे ,सुन के दिल खिले
होये फिर सफल जीवन, पहचान कुछ मिले

तन मन में प्रभु जी बसे, तन शूचि कर दे
हो मन आलोकित !कभी न,रैन काली दे
घमंड न छू सके हमको, कलुषित न उर हो
धर्म कर्म से वास्ता रहे , कभी अहित  न हो

Friday, 28 September 2018

सिद्धि

विधा- राधिका छंद

प्रीतम बिन कैसे जियूँ, शायद भूल गए    1.
कर रही हूँ याद तुम्हें ,  शूल क्यों दे गए
प्यार ने ही छीन लिया,  दिल के सब चैन
देख रही राह कब से,    धीर न धरे मन

जब मिली मुझको खुशियाँ, संभाल न सकी    2.
राह दिखाया मंजिल के, समझ भी न सकी
पग पग छलते हैं लोग, अकल भी न आई
सब कोई यहाँ परेशां ,क्यों न सकुन आई

किनारे रहके न थाह,    तू नदी के ले       3.
 चलो कठिन राह !दूरी,  तुम  ज्ञात कर ले
कंटक चाहे कितने ही,  मिले निकाल लो
दुख से घिरा हो जीवन , गम से निकल लो

लाख गम क्यों न मिले हो , तुम कभी न डरो
रखना जमीन पर कदम ,तुम न कभी गिरो
दर्द की दवा वही करे,  पीर दी जिसने
जिसे दे प्रभु आशीष , सिद्धि पाई उसने

Thursday, 27 September 2018

मुक्ति द्वार

विधा- पियूष वर्ष छंद
10 , 9  यति पर सृजन

प्रेम बिहिन जीवन , का न मोल कभी     1.
स्नेह संबंध का ,   नहीं तोल कभी
कर निसार जीवन,  सकूँ मिले तभी
निःस्वार्थ बलिदान , न हो व्यर्थ कभी

जब सब परेशान,,,,किससे क्या कहें
व्यथा अलग सबका,,पीर किससे कहें
राहें जुदा जुदा,,,,,सभी मस्त खुद में
दे न वक्त किसी को,व्यस्त अपने में

जग में आते सब , बंद कर मुट्ठी ।   2.
जाते मिलने को,  मात्र ही मिट्टी ।।
मोह है बेकार ,    दर्द यहाँ मिले ।
स्वार्थ से बंधे सब,  त्याग कहाँ मिले ।।

प्रभु संग प्रेम हो ,  मुक्ति द्वार  खुले ।   3.
पूज लो उन्हें तो ,  दुख न कभी मिले ।।
राग द्वेष से सदा ,    जब कष्ट मिले ।
मनुज क्यूँ न समझे,  दण्ड अवश्य मिले ।।

कर्म पथ से विमुख न,,,कर जीवन कभी    4.
कर इरादा पक्का,,,,डिगे न पग कभी
रखो मन पे अंकुश, बस चलते रहो
राह कठिन हो पर , तुम बढ़ते रहो

 
 

Wednesday, 26 September 2018

योग्य डॉ

विधा-आलेख

डाॅ मतलब एक संवेदनशील,सहनशील व जिम्मेदार व्यक्ति । जिनके दिल में दया प्रेम और सहानुभूति भरे होते हैं ।
समाज के भेद भाव व जातिय संकीर्णता से बहुत उपर उठकर उनकी सोच होती है।
हर माँ पापा गोरवान्वित होते जब उनके बच्चे एक योग्य
डाॅ बनते । हलाॅकि डॉक्टरी की पढ़ाई मंहगी और बहुत लम्बी अवधि तक अनवरत शिक्षण कराने वाला कोर्स है,
फिर भी अगर दिल में जज्बा हो तो बच्चे इस क्षेत्र में अपना मुकाम बनाना चाहते हैं ।
डॉ बनने के लिए बारहवीं के बाद आठ साल ( छःसाल एम.बी .बी.एस और दो साल हाउसमेन शीप) तो नितांत आवश्यक है, उसके अतिरिक्त पी .जी.तीन साल (किसी विषय मे स्पेस्लाजेशन) हो तो अति उत्तम ।
डॉ बनके समाज सेवा का दायित्व निभाना और सभी
मरीज से मीठे स्वर में बिना क्रोधित हुए बोलना ,इसका पाठ उन्हें सर्वप्रथम दिया जाता है ।
डॉ बनने के लिए शर्म का त्याग करना बेहद जरूरी है 
ताकि वो अच्छे से सीख सके । खासकर एम .बी.बी.एस
तक उनको सभी विषयों की पढ़ाई करनी पड़ती है । मेडिसिन, सर्जरी गाइनि इत्यादि ।डिलीवरी भी करानी पड़ती है।
जब एक डॉक्टर मरीजों की चिकित्सा करने के लिए रात दिन खड़े होते, समाज के अधिक से अधिक लोगों को
अपनी चिकित्सा से लाभ पहुँचाते ,तो बदले में समाज भी
उन्हें बेहद सम्मान और प्रेम देते हैं ।
एक डॉ को आलस्य त्याग कर चौबीस घंटे में कभी भी अपनी सेवा देने के लिए खड़ा होना पड़ता हैं । मर्यादा
सीमा में रहकर अपनी पेशे को ऊँचाई देना हर डाॅक्टर के
कर्तव्य हैं, और वो ऐसा करते भी हैं । आखिर डाॅक्टर को लोग भगवान तक का दर्जा देते हैं... इसका निर्वहन उन्हें अवश्य करना चाहिए ।
परंतु डॉक्टर भगवान नहीं हैं इस बात से कभी भी इन्कार नहीं किया जा सकता । वो सिर्फ कोशिश कर सकते हैं  जान बचाने का काम तो ईश्वर के हाथ में है ये तो उपरवाले के उपर निर्भर है, ये तो वही जानते हैं ।
किसे जीना या मरना है इसका फैसला वही करते हैं ।
डॉ भी एक इसांन है उनकी भी जिन्दगी है ,वो भी
कभी अवकाश ले सकते हैं । गुस्से में आकर बात बात में डॉ के साथ हाथापाई करना या नुकसान पहुँचाने का हक कभी भी मरीजों को नहीं मिल सकता ।इस जघन्य अपराध से उन्हें बचना चाहिए ।
अभी दो साल पहले मेरे पति के मित्र को ड्यूटी के समय ही गोली मार दिया गया, सिर्फ इसलिए कि वो
उस हत्यारे के बेटा को बचा नहीं पाए थे ।
आज उनका परिवार उजड़ गया है । दोनों बेटे के साथ भाभीजी अकेली रह गई..... ।
     अपवाद हर क्षेत्र में है। कई डाॅक्टर इस पेशे को शर्मशार कर रहें हैं । रूपये के लालच के लिए कई ऐसे
कार्य कर रहे, जैसे मरीज से अधिक फीस लेना या शरीर अंगों को निकाल कर बेचना..ये बहुत ही शर्मनाक और निंदनीय कार्य है।जिसके लिए उनकी भर्त्सना करना जायज है । परंतु सभी डॉक्टर ऐसे नहीं होते हैं ।
   चिकित्सा जगत में झोला छाप डॉक्टर की संख्या
बढ़ती जा रही है, जो अधिक चिन्तनीय विषय है।भोले भाले लोग उनके चक्कर में फंसकर अपना नुकसान कर  लेते हैं ।सबको ऐसे फर्जी डिग्री धारक से बचना चाहिए ।
सरकार को भी ऐसे फर्जी डिग्री को निरस्त कर ,उनके
क्लिनिक को तत्काल बंद करने का उपाय करनी चाहिए ।
     मैं एक डाॅक्टर की पत्नी ,डॉ की माँ, डॉ की बहन और भाभी हूँ । वे सभी अच्छे से अपने पेशे का निर्वहन कर
रहे हैं । मुझे फक्र है कि मेरे सपने हकीकत के रूप में मेरे आँखों के सामने मौजूद है। पैसे ज्यादा हो न हो पर
सम्मानित  जिन्दगी हो ये हर किसी की ख्वाहिश होती है ,सो ईश्वर की कृपा से है,इसके लिए उपरवाले को लाखों शुक्रिया ।
हलाॅकि इसके लिए मुझे बहुत त्याग और तपस्या करनी
पडी है । डॉ साहब के गैर मौजूदगी में अकेले बहुत से कर्तव्यों को निभाना पड़ा । बच्चों के केरियर के वजह से एकाकी जीवन भी बितानी पड़ गई । अपनी नौकरी को बीच में ही छोड़ना पड़ा ....।
परंतु मुझे उनपर गर्व है... !!
मुझे याद है मेरे पापा जो खुद यूनिवर्सिटी प्रोफेसर (बाद में प्रिसिंपल) होने के बावजूद मेरी शादी डॉ से और बच्चों
को डॉ ही बनाना उनकी एकमात्र ख्वाहिश थी ,जो पूरी हुई....।
और अंत में मैं यही कहना चाहती कि किसी चिकित्सक
को किसी के जीवन से खेलने का कोई हक नहीं, जो उनके वश में न हो वो लालच किए बिना रोगी को उपयुक्त चिकित्सा के लिए अपने से अधिक अनुभवी डॉक्टर के
पास भेज दे। ताकि रोगी का जीवन और रूपये दोनों बर्बाद होने से बचे ।

Tuesday, 25 September 2018

लैपटाप

बहुधा गाँव में मनोरजन की सुविधा नाम मात्र की होती है ।
सिनेमा हाल और मलटिप्लेक्स में चलचित्र देखने के सपने
तो अधूरे ही रह जाते । परंतु विज्ञान की प्रगति से अब कोई
वंचित नहीं रहते हैं मनोरंजन से ।
देश दुनियाँ की खबर से भी कोई अछूते न रहते.... ।
घर घर टी वी ,मोबाइल लैपटाप से सब अपने लैपटाम से अपने
मनपसंद फिल्म,धारावाहिक आदि घर पर ही देख लेते हैं ।
उस दिन सरिता अपनी ननद और देवरानी को नई फिल्म
 'तुम्हारी  सुलू' के बारे में बताया ,"सुना है! हम जैसी गृहिणी
  के लिए बहुत सुंदर फिल्म है ।"
आज कैसेट मंगवाती हूँ ,"फिर शाम को मिलकर हम लोग देखेंगे ...।"
सबने कहा जरूर मंगाना .....।
"शाम होते ही सरिता अपनी ननद आरती और जिठानी
सारिका को बुला लिया और  खुश हो कर सब लैपटाप पर
 फिल्म देखने लगी ...।"

Monday, 17 September 2018

भूख

विधा- कविता

आँखें भीतर धँसी हुई हैं ।
क्षुधा पेट की शांत करो  ।।
भूख से हम बिलख रहे  ।
प्रभु जी हम पे नजर करो ।।

जी रही हूँ कचरे चुनकर ।
तारों के छाँव में बिस्तर है।।
दिख रहे भविष्य अंधकार ।
कहीं नहीं अब मेरा ठौर है ।।

जाने मेरी कैसी किस्मत ।
राहों में मेरे बिछे हैं काँटे  ।।
लाड़ दुलार से रहते वंचित ।
मिले नहीं दो जून की रोटी  ।।

गरीबी है सबसे बड़ी बीमारी ।
सब कोई समझे हमें भिखारी ।।
किससे करूँ मदद की गुहार ।
गहरी नींद में डूबे हैं सरकार  ।।

सहानुभूति के हम नहीं हैं भूखे ।
सिर पे छत, भर पेट खाना मिले ।।
मिटा दूँ फिर भाग्य का लिखा ।
पढ़ने को हमें काॅपी कलम मिले ।।

बचपन में मिले हमें भी दुलार ।
अवसर मिले हम भी पढ़ें लिखें ।।
मेरे  दामन में भी खुशियाँ भरे  ।
नहीं चाहिए हमें दया की भीख ।।

Sunday, 16 September 2018

सोहबत

उनके नजर में न हो अहमियत क्या करते
हमारी कुर्बानी की न दे कीमत क्या करते

 दिल के खजाने के थे तुम नायाब कोहिनूर
 संभाल न पाई अपनी ही दौलत क्या करते

कर दिया था मैंने खुद को तुझ पे ही निसार
तुझे साथ रहने की न थी चाहत क्या करते

सोचा न था तुमसे जुदा हो के यूँ जीना पड़ेगा
तुम्हें थी ही नहीं कभी मेरी जरूरत क्या करते

 तुझपे हमने अपनी दुनिया ही लुटा दी थी
 तुम मुझसे करते न थे मुहब्बत क्या करते
 
 परवाह न उसकी जो मिल जाए आसानी से
 लुटा दो जां फिर भी दे न इज्जत क्या करते
   
  मुहब्बत का भूत जब  दिल से उतर जाता है
  कलई खोल दे सबके असलियत क्या करते

  किसी के वास्ते चाहे अपनी हस्ती ही मिटा दो
  बेवफा सनम की बदलती न आदत क्या करते

  वश में नहीं किसी के, इश्क के एहसास छुपाना
  हालात से ही बयां हो जाता हकीकत क्या करते

  सोचा था तेरे संग अपना जीवन संवारा करूँगी
  मेरे नसीब में पर तेरा न था सोहबत क्या करते

   एहसास न हो जब दिल में किसी के भी वास्ते
   प्रेम की उम्मीद बेकार है जज्बात क्या करते